• Home
  • »
  • News
  • »
  • nation
  • »
  • पुरुषों के मुकाबले भारतीय महिलाओं ने ज्यादा झेली कोरोना की विभीषिका : स्टडी

पुरुषों के मुकाबले भारतीय महिलाओं ने ज्यादा झेली कोरोना की विभीषिका : स्टडी

एक नए सर्वे में ये नतीजे सामने आए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

एक नए सर्वे में ये नतीजे सामने आए हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

पिछले साल मार्च और अक्टूबर के दौरान के कोविड काल (Covid Time) के दौरान तैयार की गई रिपोर्ट के लिए किए गए सर्वे में पाया गया कि हर दसवीं महिला ने कहा कि उसे कम खाने को मिला.

  • Share this:
    नई दिल्ली. कंसल्टिंग फर्म डेलबर्ग (Dalberg Consulting) के अध्ययन के मुताबिक भारत के कम आय वाले घरों में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा नौकरियां गंवाईं. महिलाओं के खाने और आराम में भी कटौती हुई. कोविड -19 की दूसरी लहर के बाद उन्हें दोबारा काम पर लिए जाने में भी वक्त लगा. पिछले साल मार्च और अक्टूबर के दौरान कोविड काल के दौरान तैयार की गई रिपोर्ट के लिए किए गए सर्वे में पाया गया कि हर दसवीं महिला ने कहा कि उन्हें कम खाने को मिला और खाने की कमी रही. वहीं 16 फीसद महिलाओं ने बताया कि उन्हें माहवारी के दौरान पैड्स नहीं मिल पाए. और 33 फीसद शादीशुदा महिलाओं ने बताया कि महामारी के दौरान जनस्वास्थ्य केंद्र में गर्भनिरोधक की उपलब्धता नहीं हो सकी.

    दूसरी लहर के दौरान पिछले कुछ महीनों में भारत ने बहुत खराब हालात देखे, दुनिया के सबसे तेजी से फैलने वाले कोविड वेरिएंट के प्रकोप में अस्पताल से लेकर श्मशान घाट तक सिर्फ और सिर्फ मारामारी देखने को मिली. अध्ययन में पाया गया कि महमारी के खत्म होने से पहले भारत में क्या हाल थे, इससे ये पता चलता है पोषण से लेकर स्वास्थ्य, रोजगार तक हर क्षेत्र में यहां तक कि जब घरेलू खर्चों को कम करने की बात होती है तो किस तरह महिलाएं प्रभावित होती हैं. डेलबर्ग की सलाहकार और रिपोर्ट की लेखक श्वेता तोतापल्ली ने कहा कि जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं ने बताया कि पहली लहर में जो असर हमें दिखा, दूसरी लहर ने उसी के असर को बढ़ा दिया.

    बाल विवाह
    तोतापल्ली के मुताबिक महामारी के दौरान अगर ज्यादा महिलाओं को काम से बाहर किया जाता है तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी, परिवार ज्यादा कर्ज में डूबेगा, ज्यादा गरीबी बढ़ेगी, ज्यादा लड़कियां स्कूल छोड़ने पर मजबूर होंगी जिसकी वजह से ज्यादा बाल विवाह होने की आशंका है.

    15 हजार महिलाओं पर स्टडी
    अध्ययन में कुछ और जानकारियां मिली हैं. इसमें 10 राज्यों में कम आय वाले घरों की करीब 15 हजार महिलाओं और 2300 पुरुषों का सर्वेक्षण किया गया. महामारी से पहले कुल वर्कफोर्स में करीब 24 फीसद महिलाएं काम कर रही थीं. इनमें से 28 फीसद को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी और 43 फीसद को अभी तक अपने किए काम का पैसा नहीं मिला. पुरुषों के 43 फीसद के मुकाबले में 47 फीसद महिलाओं ने अपनी नौकरी गंवाई और वहीं 41 फीसद महिलाओं को बगैर भुगातान के काम करना पड़ा वहीं पुरुषों में ये आंकड़ा 37 फीसद था.

    27 फीसद महिलाओं ने बताया कि उन्हें महामारी के दौरान कम आराम मिला वहीं पुरुषों में ये संख्या 18 फीसद थी. मुस्लिम, प्रवासी, अकेली और अलग हुई या तलाकशुदा महिलाओं में ये हाल और बुरे थे. रिपोर्ट में महिलाओं को ध्यान में रखकर सरकार की ग्रामीण रोजगार योजना में भर्ती मुहिम पर जोर दिया गया है. सरकार द्वारा मुफ्त खाना वितरण कार्यक्रम के साथ माहवारी के लिए पैड्स मुहैया करवाने से इस योजना में महिलाओं की पहुंच बढ़ेगी. बिना वेतन वाले काम के बोझ के बढ़ने का बड़ा नुकसान ये है कि औपचारिक श्रम-बल में महिलाओं की भागीदारी कम हो गई है और इसे ठीक करना मुश्किल है.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज