स्क्रीन टाइम ने विश्व में खराब आंखों के मामले में भारत को पहुंचाया अव्वल

2020 में एक भारतीय का औसत स्क्रीन टाइम 6 घंटा 36 मिनिट था, कई देशों के मुकाबले काफी कम था लेकिन इतनी बड़ी आबादी पर व्यापक असर के लिये काफी है.

Screen Time: रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन, शारीरिक दूरी, और लोगों के घरों में लंबे समय तक कैद रहने ने स्क्रीन टाइम की बढोतरी में अहम भूमिका निभाई है.

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    नई दिल्ली. कोरोनावायरस (Coronavirus) ने हमें सिर्फ घरों तक सीमित करके नहीं रखा बल्कि, पढ़ाई, काम, और मनोरंजन सब कुछ ऑनलाइन पर निर्भर हो गया है. अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं. भारत के लोगों में आंखो की रोशनी कम होने और नज़र खराब होने की शिकायत के मामले में सामने आ रहे हैं, और भारत इस मामले में दुनिया की सूची में सबसे ऊपर पहुंच गया है. करीब 27.5 करोड़ भारतीय यानि आबादी का करीब 23 फीसद हिस्सा बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम की वजह से आंखों की रोशनी की कमजोरी से जूझ रहा है. हालांकि अन्य कारण जिनमें मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, उम्र की वजह से होने वाला मेक्यूलर भी नज़र पर असर डालते हैं. लेकिन इसके साथ लगातार बढ़ते स्क्रीन टाइम ने इस परेशानी को और उग्र कर दिया है.

    2020 में एक भारतीय का औसत स्क्रीन टाइम 6 घंटा 36 मिनिट था, कई देशों के मुकाबले काफी कम था लेकिन इतनी बड़ी आबादी पर व्यापक असर के लिये काफी है. वहीं रोज़ का औसत स्क्रीन टाइम करीब दो दर्जन देशों से कहीं ज्यादा था, इन देशों में फिलिपींस (14.3), दक्षिण अफ्रीका (21.6), थाइलैंड (15.2), चीन (14.1) मलेशिया (14.4) इंडोनेशिया ( 15.5) के मुकाबले भारत का औसत (22.7) है. दरअसल आबादी के हिसाब से भारत में ये ज्यादा व्यापक तौर पर फैला हुआ ऩज़र आता है.

    रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन, शारीरिक दूरी, और लोगों के घरों में लंबे समय तक कैद रहने ने स्क्रीन टाइम की बढोतरी में अहम भूमिका निभाई है. यूके के फीलगुड कॉन्टेक्ट जिसने ये डाटा एकत्रित किया है उनके मुताबिक भारत में स्क्रीन टाइम की बढोतरी और नज़र की कमजोरी में गहरा संबंध देखा गया है. कॉन्टेक्ट ने ये डाटा इकट्ठा करने के लिए कई स्रोतों का सहयोग लिया है, जिसमें लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, डब्ल्यूएचओ, और स्क्रीनटाइम ट्रेकर डाटा रिपोर्टल भी शामिल है.

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    आबादी और उनका घनत्व (यानि प्रति वर्गकिलोमीटर में रहने वाले लोग) से इस पर ज्यादा असर दिखता है, मसलन चीन जो स्क्रीन टाइम के मामले में काफी पीछे हैं, यहां प्रति व्यक्ति औसत स्क्रीन टाइम महज़ 05.22 घंटा है लेकिन नज़र की खराबी के मामले में यहां का औसत 14.1 है. ये दरअसल ज्यादा आबादी की वजह से है. क्योंकि प्रति व्यक्ति 05.22 घंटे औसत का मतलब करीब 27.4 करोड़ लोगों पर इसका असर होना जो आबादी का 14.1 फीसद है.

    भारत में कितना खर्च होता है डेटा
    भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले 2020 में प्रतिमाह 14.6 जीबी डाटा का उपयोग कर रहे थे. जबकि यही आंकड़ा 2019 में 13 जीबी प्रतिमाह था. डाटा इस्तेमाल करने के मामले में ये दुनियाभर में दूसरा स्थान है. ऐसा अनुमान है कि 2026 तक ये आंकड़ा 40 जीबी प्रति व्यक्त प्रति माह तक पहुंच जाएगा.

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