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अमेरिकी सेना के 'जल्दबाजी' में अफगान छोड़ने से बढ़ेगी भारत की चिंता! छूटे हथियार पैदा कर सकते हैं मुश्किलें

अमेरिकी सेना के 'जल्दबाजी' में अफगान छोड़ने से बढ़ेगी भारत की चिंता! छूटे हथियार पैदा कर सकते हैं मुश्किलें

अफगानिस्तान से जाते वक्त अमेरिका लाखों की संख्या में हथियार और साजो सामान छोड़ गए. (तस्वीर: AP)

अफगानिस्तान से जाते वक्त अमेरिका लाखों की संख्या में हथियार और साजो सामान छोड़ गए. (तस्वीर: AP)

Afghanistan Crisis: अफगानिस्तान में पिछले बीस साल के ऑपरेशन में अमेरिका ने अफगानिस्तान को अरबों डॉलर के हथियार दिए, जिसके जरिए अफगान बल अल-कायदा (Al-Qaida) और तालिबान के साथ जंग लड़ते रहे. अब वही हथियार भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए चिंता का कारण बनते दिख रहे हैं.

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नई दिल्ली. अफगानिस्तान में करीब 20 सालों के बाद अमेरिकी ‘दौर’ का अंत हो गया. अमेरिकी सैनिकों (US Troops) की आखिरी टुकड़ी भी काबुल छोड़ कर चली है. ऐसे में अफगान बलों को दशकों से मिल रही अमेरिकी सहायता अब भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समूह के लिए परेशानी का सबब बन सकती है. खबरें आई थीं कि अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद कई अत्याधुनिक हथियार और सैन्य उपकरण तालिबान (Taliban) के हाथ लग गए हैं.

मौजूदा हालात देखें, तो चीन को रिवर्स इंजीनियरिंग का मास्टर माना जाता है. फाइटर एयरक्राफ्ट से लेकर एयरक्राफ्ट कैरियर तक, टैंक से लेकर यूएवी तक सभी दूसरे देशों की तकनीक चुराकर चीन दुनिया के सबसे ताकतवर देश का तमगा हासिल करना चाहता है. ऐसे में अमेरिकी हथियारों की तकनीक के लिए चीन की लंबी जेद्दोजेहद अब खत्म होता नजर आ रही है. चीन के इंटरनेट हैकर दुनिया भर के हथियार निर्माता कंपनियों में की तकनीक हैकिंग के जरिए हासिल कर रहे हैं, लेकिन अब अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद अब चीन को अमेरीक तकनीक हासिल करने में कोई मुश्किल नहीं होगी.

अफगानिस्तान में पिछले बीस साल के ऑपरेशन में अमेरिका ने अफगानिस्तान को अरबों डॉलर के हथियार दिए, जिसके जरिए अफगान बल अल-कायदा और तालिबान के साथ जंग लड़ते रहे. अमेरिकी प्रशासन के सैनिकों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने के फैसले के बाद इन हथियारों को अफगानिस्तान की सेना इस्तेमाल में लाने वाली थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अफगानिस्तान की सेना ने चंद रोज में ही तालिबान के सामने अपने घुटने टेक दिए और अमेरिका के सबसे आधुनिक हथियार तालिबान के हाथों लग गए. अमेरिका रिपब्लिकिन पार्टी के एक सांसद ने जो दावे किए उसने दुनिया भरे के होश उड़ा दिए.

अरबों डॉलर के अत्याधुनिक हथियार तालिबान के हाथ
अमेरिका, अफगानिस्तान से जाते वक्त लाखों की संख्या में हथियार और साजो सामान छोड़ गए. जिनमें हमवी, टैक्टिकल व्हिकल, आर्मर्ड व्हिकल समेत 85 हजार से ज्यादा वाहन हैं. साथ ही 200 से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जिनमें हैलिकॉप्टर, ट्रांसपोर्ट, अटैक सर्वेलांस विमान शामिल हैं. रायफल, मशीन गन, पिस्टल, ग्रेनेड लॉन्चर और आरपीजी जैसे 6 लाख से ज्यादा तो छोटे हथियार हैं. इसके अलावा जासूसी उपकरण, रेडियो सिस्टम, ड्रोन नाईट विजन गॉगल्स भी इन सब में शामिल हैं. ऐसे में चीन अपने सुविधा के हिसाब से जो भी चाहे हथियार , एयरक्राफ्ट और अन्य साजो सामान हासिल कर सकता है. ये अमेरिका के लिए भी सबसे चिंता की बात है और भारत के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है.

चीन की चोरी आदत से अमेरिका भी है वाकिफ
अमेरिका भी चीन की इस महारत से भली भांती वाकिफ था और ये ही वजह थी कि एबटाबाद में लादेन को ढेर करने वाले ऑपरेशन के दौरान नेवी सील का एक ब्लैक हॉक हैलिकॉप्टर क्रैश हो गया था. चूंकि ब्लैक हॉक की तकनीक पाकिस्तान के जरिए चीन तक न पहुंच जाए इसी चलते उस क्रैश हैलिकॉप्टर को नष्ट कर दिया, लेकिन अब वही सुपर सीक्रेट स्टील्थ ब्लैक हैलिकॉप्टर उड़ते हालात में या फिर उसके कलपुर्जे चीन को आसानी से मिल सकते हैं.

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तकनीक चुराने में माहिर चीन
कुछ एसे ही रिवर्स इंजीनियरिंग हथियारों पर जारी रिपोर्ट की बात करें, तो अमेरिकी F-35 का क्लोन शेनयांग J-31 और X-47B अनमैंड कॉम्बेट एयर व्हीकल का हूबहू दिखने वाले लिजिआन शार्प स्वार्ड अनमैंड कॉम्बेट एयर व्हीकल चीन ने तैयार किया है. अमेरिका को तो ये भी लगता है कि जिन भी मित्र देशों को वह एयरक्राफ्ट या फिर आधुनिक सैन्य सामान बेचता है, चीन बैक डोर चैनल के माध्यम से उसकी तकनीक हासिल कर लेता है.

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने तो ये फैसला भी लिया है कि लॉकहेड मार्टेन F-22 रैप्टर स्टील्थ फाइटर को किसी दूसरे देशों को नहीं बेचेगा. अमेरिका की तरह रूस भी चीन की तकनीक चोरी से भली भांती वाकिफ है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएसएसआर के विघटन के बाद जब रूस को पैसों की जरूरत हुई तो सुखोई 27 को चीन को बेचने का फैसला लिया था. चीन ने दो दर्जन सुखोई 27 भी लिए बाद में रूस पर लाइसेंस और कुछ कंपोनेंट को रूस से लेकर चीन में ही बनाने का दबाव बनाया, लेकिन कुछ साल बाद ही चीन ने ये कहकर सौदे को रद्द कर दिया कि सुखोई 27 उनकी जरूरतों को पूरा नहीं करते और कुछ समय बाद ही सुखाई 27 जैसा दिखाने वाला शेंयॉग J-11 B फाइटर तैयार कर लिया.

रूस का एंटोनोव AN-12 ट्रांसपोर्ट विमान का क्लोन चीन ने तैयार किया, जिसे नाम दिया शांनह्वी Y-9. अमेरिकी अनमैंड हैलिकॉप्टर MQ-8 फायर का क्लोन SVU -200 फ्लांइंग टाइगर, अमेरिकी MQ प्रीडियोटर ड्रोन का चीनी मॉडल चेंगदु विंगलूंग चीनी सेना में शामिल है. रूस का 2S19 Msta-S सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्सर का डुप्लिकेट का नाम चीन ने PLZ-05 सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्सर है. अमेरीकि हमवी लाइट ट्रेक का क्लोन डॉन्गफेंग EQ2050 ब्रेव सोल्जर के नाम से चीनी सेना में मिल जाएगा.

चीन ने तो रूस के मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर BM-30 स्मर्च की तकनीक से PHL03 नाम से मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर तैयार कर लिया था. रूसी बीएमपी-1 एमफीबियस इंफैंट्री फाइटिंग व्हीकल की हूबहू नकल कर WZ-501 एमफीबियस इंफैंट्री फाइटिंग व्हीकल तैयार कर लिया. ऐसी क्लोनिंग या कहें रिवर्स इंजीनियरिंग या कहें चोरी की तकनीक से तैयार किए गए हथियारों और साजो-सामानों की लिस्ट बहुत लंबी है.

अब बारी अमेरिकी ब्लैक हॉक हैलिकॉप्टर की है. सेना से रिटायर्ड मेजर जनरल संजय सोई के मुताबिक, ऐसे हथियार जो पाकिस्तान और आतंकी संगठनों के हाथों में लग गए हैं और उनका आने वाले दिनों में कश्मीर में आतंकी वारदातों में इसेतमाल धड़ल्ले से किया जाएगा. इससे पहले भी आतंकियों से भारतीय सेना ने अमेरिकी हथियार बरामद किए हैं. ऐस में यह भारत के लिए चिंता का विषय है.

तालिबान के साथ जैश, लश्कर के आतंकी भी लड़ रहे थे और आईएसआई भी पूरा साथ दे रही थी. अब ये हथियार पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के हाथ लग सकते हैं क्योंकि अफगानिस्तान में कोई सरकार नही और न ही है कोई कमांड और कंट्रोल. चिंता यही खत्म नहीं होती जो हथियार तालीबान ऑपरेट नहीं कर सकेगा, तो उसका उपयोग चीन कर सकता है. पैसे की कमी को पूरा करने के लिए तालिबान ब्लैक हॉक के उपकरण और कलपुर्जे बेच सकता है और फिर रिवर्स इंजीनियरिंग कर के वो इसका इस्तेमाल लाईन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर कर सकता है. लिहाजा अमेरिका के हथियारों का तालिबान के हाथ लगना भारत के लिए चिंता वाली बात है.

Tags: Afghanistan, Taliban, US Weapons, US Withdrawal

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