Love Story: इंदिरा ने जब झुंझलाकर कहा, पीवी ने लक्ष्मी से सिर्फ फ्लर्ट किया

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 17, 2017, 11:15 AM IST
Love Story: इंदिरा ने जब झुंझलाकर कहा, पीवी ने लक्ष्मी से सिर्फ फ्लर्ट किया
इंदिरा गांधी के साथ पीवी नरसिंहा राव
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 17, 2017, 11:15 AM IST
इंदिरा गांधी बुरी तरह झुंझलाई हुई थीं. उन्होंने कहा, पीवी ने लक्ष्मीकांता अम्मा के साथ फ्लर्ट करने के अलावा कुछ नहीं किया. मैं परेशान हो गई हूं. मुझे उनके बेटे पर दया आती है.

कांग्रेस के सीनियर लीडर और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वेंगल राव ने अपनी ऑटोबॉयोग्राफी "ना जीविता कथा" (माई लाइफ स्टोरी) में दावा किया कि वह इंदिरा जी ने मुलाकात के दौरान उनसे ये कहा था. इंदिरा बुरी तरह झुंझलाई हुईं थीं. पीवी नरसिम्हाराव का नाम लेते ही फट पड़ीं. वेंगल राव ने किताब में लिखा, "उन्होंने इंदिरा जी को पार्टी के किसी वरिष्ठ मंत्री पर इस तरह झुंझलाते हुए कम देखा था. इंदिरा जी ने कहा- मैं उम्मीद नहीं करती थी कि वह इतने चरित्रहीन होंगे. जबकि उनके इतने बड़े बच्चे हैं".

राव जब प्रधानमंत्री बने
पीवी नरसिम्हाराव बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. अपने कार्यकाल के दौरान कई ऐतिहासिक काम किए. उसी दौरान अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा तो 90 के दशक से ही देश में उस आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई, जिसने देश और विकास की पूरी तस्वीर ही बदल दी. उन पर आरोप लगने लगा कि वह कांग्रेस को नेहरू-गांधी के रास्तों से अलग दिशा में ले जा रहे हैं.

मौनी बाबा की प्रेम कथा
मौनी बाबा कहे जाने वाले राव के बारे में कौन सोच सकता है कि वह रोमांटिक रहे होंगे. उनकी भी अपनी प्रेम कहानी है. जो कांग्रेस और राजनीति के गलियारों में खुलेआम भले नहीं कही गई हो लेकिन पुराने नेता अक्सर अंतरंग गोष्ठियों में इस पर रस ले लेते थे.



लक्ष्मी और नरसिम्हाराव साथ बने थे विधायक
वर्ष 1957 में एक महिला खम्मम से जीतकर आंध्र प्रदेश के विधानसभा में पहुंची. राजनीति से उसका ज्यादा लेना-देना नहीं था लेकिन उसने कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ में सेंध लगाकर चुनाव जीता था. नाम था लक्ष्मी कांताम्मा. लंबी,  छरहरी, आकर्षक, वाकपटु, तेज तर्रार और पढ़ी लिखी. आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के नामी रेड्डी जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली. बौद्धिक तौर पर प्रखर. लक्ष्मी जब विधानसभा में पहुंची तब उनकी उम्र थी 33 साल. उसी विधानसभा में 36 साल के पीवी नरसिम्हाराव भी पहली बार मंथनी से जीतकर पहुंचे थे.

होने लगी थीं नजदीकियां
राव और लक्ष्मी में विधानसभा सत्रों के दौरान मुलाकातें होना स्वाभाविक था. दोनों की पृष्ठभूमि में जमीन-आसमान का अंतर. एक खाते-पीते और बेहद समृद्ध परिवार की और राव बेहद साधारण और अभाव से गुजरकर आए हुए. विधानसभा में बहुत कम समय में नरसिम्हाराव की विद्धता और समझ-बूझ की धाक जम गई. लक्ष्मी उनकी ओर आकर्षित होने लगीं. 1962 में जब लक्ष्मी ने लोकसभा का चुनाव लड़ा तो राव ने उनकी भरपूर मदद की. वह उनके करीबी और राजनीतिक गुरु बन चुके थे.

नरसिंह राव की उपेक्षित पत्नी
लक्ष्मी लोकसभा में पहुंचीं. नरसिम्हाराव आंध्र के तेज-तर्रार नेताओं में गिने जाने लगे. जल्द मंत्री बन गए. लक्ष्मी से नजदीकियां बढ़ती रहीं. राव की पहचान केंद्रीय नेतृत्व तक बन गई थी. नेहरू और इंदिरा उन्हें पसंद करते थे. इसी वजह से इंदिरा ने प्रधानमंत्री बनते ही 1970 में राव को मुख्यमंत्री बनने में मदद की.

पीवी विवाहित थे. दस साल की उम्र में ही सत्यम्मा से विवाह हो चुका था. तीन बेटों और पांच बेटियों के पिता बन चुके थे. सत्यम्मा पढ़ी लिखी नहीं थीं. उनका जीवन घर तक सीमित था.



प्राइवेट लाइफ
60 के दशक के आखिर तक नरसिम्हाराव और लक्ष्मी कांताम्मा का रिश्ता समय के साथ और मजबूती ले चुका था. हालांकि दोनों ने इसे गुप्त रखने की कोशिश की. लक्ष्मी संसद में प्रखर वक्ता के रूप में पहचान बना चुकी थीं. विजय सीतापति ने अपनी चर्चित किताब "द हाफ लॉयन" में यूं तो नरसिम्हाराव की तारीफ में काफी कसीदे पढ़े हैं, लेकिन उनकी प्राइवेट लाइफ पर निगाह डालने में भी कोताही नहीं बरती. उन्होंने किताब में लिखा, सत्यम्मा का जीवन पति की उपेक्षा और इसी वजह से मिले अकेलेपन से भरा था. उनका 1970 में निधन हो गया. इसके बाद लक्ष्मी से रोमांटिक रिलेशनशिप में ज्यादा स्वेच्छाचारिता आ गई.

इंदिरा आजिज आ गईं
लेखक के अनुसार, राव के रिश्ते और भी कई महिलाओं से थे लेकिन छोटे-छोटे टुकड़ों में और लक्ष्मी कांताम्मा की तरह प्रगाढ़ नहीं. कांताम्मा 1977 तक लगातार सांसद चुनी जाती रहीं. आंध्र में जब 1970 में नरसिम्हाराव मुख्यमंत्री बने तो विरोधी भी सक्रिय हो गए. इंदिरा जी के पास उन्हीं लोगों ने लक्ष्मी से उनके विवाहेत्तर संबंधों और प्रगाढ़ता की चर्चाओं को मसाला लगाकर पहुंचाया. इंदिरा जी इतनी आजिज आ गईं कि उनकी सीएम की कुर्सी तीन साल में ही चली गई. वेंगल राव उनके बाद मुख्यमंत्री बने. वेंगल ने अपनी आत्मकथा में लिखा, नरसिम्हाराव के बड़े बेटे पीवी रंगाराव अक्सर अपने पिता के अफेयर की शिकायत को लेकर दिल्ली पहुंचते थे.

फिर सचेत हुए
नरसिम्हाराव को जब आंध्र प्रदेश में झटका लगा तो वह कुछ सचेत तो हुए लेकिन लक्ष्मी से उनके संबंध कभी खत्म नहीं हुए. हालांकि तब जरूर पसोपेश की स्थिति बन गई जब आपातकाल के दौरान लक्ष्मी कांतम्मा इंदिरा के विरोध पर उतर आईं. जनता पार्टी में चली गईं. 1977 में चुनाव भी जनता पार्टी के टिकट पर लड़ा. "हाफ लॉयन" में लेखक विजय सीतापति ने लिखा है कि नरसिम्हाराव से लक्ष्मी के रिश्ते 1962 से लेकर 1975 तक चले. लेकिन वह राव के साथ जब तक रहीं, तब तक पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध.

लक्ष्मी साध्वी बन गईं
बाद में लक्ष्मी ने राजनीति से अपने सारे संपर्क काटकर आध्यात्म की ओर कूच किया. साध्वी बन गईं. वह गुरु श्रीशिवा बालयोगी महाराज के शरण में चली गईं. उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा धर्मार्थ कामों में दे दिया. कहा जाता है कि उन्होंने नरसिम्हाराव को भी राजनीति छोड़ साथ आने को प्रेरित किया. 1991 में राव बोरिया बिस्तर और किताबें बांधकर संन्यास की ओर ही जाने वाले थे लेकिन राजीव गांधी की हत्या ने उनके भाग्य को पूरी तरह बदल दिया.



"इनसाइडर" में संबंधों की ओर इशारा
राव ने प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखा-"इनसाइडर", जिसे पेंग्विन ने प्रकाशित किया. इस किताब को लिखने के लिए राव को उस जमाने में बतौर एडवांस एक लाख रुपए मिले थे. इस किताब में उन्होंने संकेतों, इशारों और परोक्ष तौर पर अपने कुछ संबंधों पर इशारा किया है. हालांकि उनके सहयोगी कहते हैं कि जब वह प्रधानमंत्री थे, तब अपनी कैबिनेट की एक जूनियर महिला मंत्री पर मेहरबान थे. इसका लोगों ने अलग-अलग तरीके से अर्थ लगाया.
First published: September 17, 2017
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