पार्टी हाशिए पर, अपने हितों को साधने की लड़ाई लड़ रहे कांग्रेस के कई नेता

राजस्थान से लेकर हरियाणा और मध्य प्रदेश तक...पढ़िए कांग्रेस की कलह कथा
राजस्थान से लेकर हरियाणा और मध्य प्रदेश तक...पढ़िए कांग्रेस की कलह कथा

आपसी लड़ाई में हरियाणा खोया, मध्य प्रदेश में जीती बाजी हार गई कांग्रेस, राजस्थान की जंग जारी, महाराष्ट्र में कम नहीं है कलह, आखिर घर की लड़ाई से क्यों नहीं उबर पा रही कांग्रेस?

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नई दिल्ली. कांग्रेस सिर्फ राजस्थान (Rajasthan) में ही आंतरिक कलह से नहीं जूझ रही बल्कि उसे कई राज्यों में ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ रहा है. कांग्रेस (Congress) के क्षत्रप संकट काल में भी पार्टी को उबारने की बजाय अपनी महत्वाकांक्षा को उपर रख रहे हैं. वे पार्टी से ज्यादा अपने राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसलिए कांग्रेस नेतृत्व इन दिनों बीजेपी से लड़ने की बजाय अपने ही नेताओं के झगड़ों और व्यूहरचना में उलझा हुआ है. इसका सीधा फायदा बीजेपी (BJP) को हो रहा है. कांग्रेस के इस असंतोष में खाद पानी डालकर और बड़ा करने की कोशिश जारी है ताकि देश की सबसे पुरानी पार्टी जीती बाजी भी हार जाए. हरियाणा और मध्य प्रदेश इसके बड़े उदाहरण हैं.

खींचतान में हाथ से निकला हरियाणा

हरियाणा में बीते विधानसभा चुनाव की वोटिंग 21 और मतगणना 24 अक्टूबर को हुई थी. जबकि काफी आंतरिक घमासान के बाद 4 सितंबर को भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupinder Singh Hooda) को कमान दी गई थी. राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के करीबी माने जाने वाले डॉ. अशोक तंवर को पार्टी से बाहर जाना पड़ा और सोनिया गांधी के नजदीक माने जाने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा को लंबी दुविधा के बाद विधायक दल का नेता बनाने की घोषणा की गई. मतलब हुड्डा को पूरा चुनाव लड़ने के लिए सिर्फ डेढ़ महीने का वक्त मिला.



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internal conflict of congress
कांग्रेस के उसके अपने ही उसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं


इतने कम वक्त में उन्होंने ऐसा जाल बिछाया कि 90 सीटों में से 65 पार का नारा देने वाली बीजेपी महारथियों के प्रचार के बाद भी महज 40 पर सिमट गई. कांग्रेस 30 सीट पर आ गई. जबकि वो चुनाव से दो माह पहले मैदान में दिखाई नहीं दे रही थी. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर कांग्रेस आलाकमान हु्ड्डा को छह महीने पहले भी कमान देता तो शायद राज्य में दोबारा बीजेपी सरकार नहीं बनती. लेकिन वो हुड्डा, कुमारी सैलजा, अशोक तंवर और रणदीप सुरजेवाला जैसे ग्रुपों के झगड़े में उलझी रहा और नतीजा यह हुआ कि जनता में मनोहरलाल खट्टर के खिलाफ गुस्से के बावजूद सरकार बीजेपी की ही बनी.

कहानी मध्य प्रदेश कांग्रेस की

साल 2018 में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले और काफी समय बाद तक कमलनाथ (Kamal Nath), दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया (jyotiraditya scindia) के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी. कांग्रेस ने इन नेताओं की आपसी प्रतिद्वंदिता और गुटबाजी की वजह से वहां पर जीती हुई बाजी भी गंवा दी. दिग्विजय सिंह ने चुनाव से पहले पार्टी नेतृत्व को अपनी ताकत दिखाने के लिए नर्मदा यात्रा निकाली. फिर भी उनसे कमलनाथ को वैसी चुनौती नहीं थी जैसी सिंधिया से. सिंधिया प्रदेश अध्यक्ष पद और मुख्यमंत्री पद दोनों के दावेदार थे.

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सिंधिया और कमलनाथ की लड़ाई में चली गई मध्य प्रदेश की सत्ता


इस झगड़े के बावजूद कमलनाथ पार्टी को अपनी बात समझाने में कामयाब हो गए. चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनने और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने की बाजी कमलनाथ के हाथ लगी. इसलिए उनके सीएम बनने के बाद असंतोष की आग में ज्योतिरादित्य सिंधिया जलने लगे. वो अपनी चाल चलने लग गए. मार्च 2020 आते-आते सिंधिया के गुस्से का गुबार फूट गया और उन्होंने अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया. ऐसे में कमलनाथ को कुर्सी गंवानी पड़ी. कांग्रेस को इस संकट काल में भी एक बड़ा राज्य आपसी अंतर्कलह से बीजेपी को सौंपना पड़ा.

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महाराष्ट्र की कलह कथा

मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके संजय निरुपम और पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के बीच रार चलती रहती है. इसके अलावा मिलिंद देवड़ा और प्रिया दत्त भी अलग-अलग गुटों के क्षत्रप हैं. गुटबाजी के चलते ही अलग-अलग बहाने बनाकर पूर्व मंत्री कृपाशंकर सिंह व नारायण राणे सहित कई नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं. कांग्रेस आपसी खींचतान से उत्तराखंड में भी उबर नहीं पाई है.

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पायलट और गहलोत की जंग में राजस्थान सरकार पर मंडरा रहे संकट के बादल (File Photo PTI)


राजस्थान में कब तक चलेगी गहलोत की जादूगरी?

रही बात राजस्थान की तो यहां अभी अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और सचिन पायलट (Sachin Pilot)  में सिर फुटव्वल जारी है. पार्टी में असंतोष के बीज बो दिए गए हैं. संकट में दिख रही सरकार को कांग्रेस के सियासी जादूगर गहलोत फिलहाल तो बचाते नजर आ रहे हैं लेकिन खींचतान के बीच वो कब तक इस कुर्सी पर कायम रहेंगे कहा नहीं जा सकता.

गुटबाजी तो हर पार्टी में है, नेतृत्व की दुविधा से बढ़ रहा संकट

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया का कहना है कि गुटबाजी तो हर पार्टी में होती है. जिस पार्टी में  नेतृत्व मजबूत होता है उसमें असंतोष की आवाजें दब जाती हैं. लेकिन जहां पर पार्टी नेतृत्व में ही स्पष्टता नहीं है वहां पर वो खुलकर सामने आती है. जैसे इन दिनों कांग्रेस का हाल है. पता नहीं चलता कि कांग्रेस कौन चला रहा है. किसके लोगों की चल रही है. केंद्रीय नेतृत्व से लेकर राज्यों तक में दुविधा ही दुविधा है.





भदौरिया कहते हैं कि अगर पार्टियों के पास राज्यों में मठाधीश नेता नहीं होंगे तो काम कैसे चलेगा. किसी भी पार्टी को आगे बढ़ने के लिए कई क्षत्रप तो होने ही चाहिए लेकिन उनके बीच कलह न हो और उससे पार्टी को नुकसान न हो इसका शक्ति संतुलन बैठाना आलाकमान का काम होता है. कांग्रेस में इसी के अभाव में मजबूत नेताओं के बावजूद काम खराब हो रहा है.

भाजपा में भी अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लेकर कुछ नेताओं में असंतोष है. लेकिन पार्टी पर शीर्ष नेतृत्व की पकड़ और स्पष्टता के कारण विरोध की कोई आवाज खुलकर बाहर नहीं आती.
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