तलाक, तलाक, तलाक से नहीं बननी चाहिए मुस्लिमों की पहचान: आरिफ मोहम्मद खान

अफसर अहमद | News18Hindi
Updated: May 29, 2019, 6:08 PM IST
तलाक, तलाक, तलाक से नहीं बननी चाहिए मुस्लिमों की पहचान: आरिफ मोहम्मद खान
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने तल्ख टिप्पणियां की हैं!

शाह बानो मामले में केंद्रीय मंत्री होते हुए भी राजीव सरकार से सीधे लोहा लेने वाले आरिफ मोहम्मद खान मुस्लिम संगठनों की चुनाव के दौरान भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

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शाहबानो केस में अपनी ही सरकार के खिलाफ विरोध की आवाज बुलंद करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने हालिया आम चुनावों में कुछ मुस्लिम संगठनों की भूमिका को लेकर तल्ख टिप्पणियां की हैं. न्यूज18 हिंदी से खास बातचीत में आरिफ़ ने उन मुस्लिम संगठनों पर निशाना साधा है जिन्होंने चुनावों के दौरान एक पार्टी विशेष को वोट न देने की अपील की और जब बीजेपी सत्ता में आ गई तो मुस्लिम समुदाय को सतर्क रहने का संदेश जारी किया.

आरिफ़ ने ऐसे मुस्लिम संगठनों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इन संस्थाओं ने चुनाव के बीच में भी एक दल विशेष को हराने के लिये एकजुट होकर वोट करने के संदेश दिए थे. चुनाव ख़त्म होने के बाद एक दल विशेष को हराने के लिये कौन से वज़ीफ़े सुबह सहरी से पहले पढ़ने हैं, ऐसे संदेश भी जारी किए थे. आरिफ़ कहते हैं कि उनके व्यवहार से ऐसा लगता है जैसे धर्म का मक़सद नैतिक और आध्यात्मिक विकास न होकर सिर्फ राजनीति और राजसत्ता हासिल करना है. मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी सैकुलरिज़्म और सोशलिज़्म को कुफ़्र कहती है. ख़ुद हिन्दुस्तान में उनका संविधान एक इस्लामी हुक़ूमत की बात करता है लेकिन इस चुनाव में वो सैकुलरिज़्म को बचाने के लिए एक दल विशेष को हराने का आव्हान कर रहे थे. (ये भी पढ़ें: यादवों और मुस्लिम मतदाताओं ने भी दिया नरेंद्र मोदी को वोट, ये रहा बीजेपी का गणित!)

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आरिफ़ के मुताबिक़ जब यह कहा जाता है कि एक दल विशेष को हराने के लिये दूसरे दलों में जो आगे नज़र आये उसको वोट कर दें तो यह आव्हान धर्म के नाम पर किया जाता है. ऐसे में समाज में धर्म के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण व वैमनस्य पैदा होना स्वभाविक है. यह काम साधारण नागरिक नहीं करता बल्कि यह काम वो लोग करते हैं जो अपने आप को धार्मिक समुदाय का नेता होने का दावा करते हैं. उनके संदेश और आव्हान के कारण जो नतीजे पैदा हुए हैं तो लोगों को उनसे सवाल करने का हक़ है कि तुम्हारा नेतृत्व कैसा है जो बार-बार समाज में इतनी नफ़रत और कौम के लिए मुश्किलें पैदा करता है. इस आलोचना से बचने के लिये वो अब सतर्कता संदेश दे रहे हैं.

मुस्लिम सांसदों की कम संख्या के लिए आरिफ़ ने मुस्लिम संगठनों को ही जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा जब पर्सनल लॉ बोर्ड ने अस्सी के दशक में अलग पहचान का नारा लगाया था तब लोकसभा में 54 सांसद थे जो मुस्लिम समुदाय के थे और इनमें वह लोग थे जो ऐसे क्षेत्रों से जीतकर आए थे जहां 5 फीसदी से भी कम मुसलमान मतदाता थे लेकिन अलग पहचान की मांग को स्वीकार कराने के बाद अर्थात सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदलवाने के बाद यह तादाद तेज़ी से घटकर नीचे आ गई. हर इंसान को अपने कर्मों का नतीजा झेलना पड़ता है. हम जो बोएंगे वो काटेंगे.

गलत था शाहबानो केस में मुस्लिम संगठनों का अलग पहचान की बात करना

शाहबानो केस के ख़िलाफ़ चलने वाले आंदोलन में यह नहीं कहा गया कि इस फ़ैसले से धर्म के किसी सिद्धांत को आघात पहुंचेगा बल्कि ज़ोर इस पर था कि इससे हमारा ‘मिल्ली तशख़्ख़ुस’ ख़त्म हो जाएगा. हमने अलग पहचान की मांग की, हम अलग-थलग हो गये अब आपकी बात मान ली गई तो ख़ुश होइए. परेशान होने की बात क्या है.
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सिखों व ईसाई समुदाय से सीखें मुस्लिम

मुस्लिम समुदाय में लीडरशिप की कमी पर आरिफ़ ने कहा- लीडरशिप के लिए सेवा और त्याग की ज़रूरत होती है. हदीस में कहा गया हैः سيد القوم خادمهم यानी जो लोगों की ख़िदमत करता है वो उनका लीडर है और क़ुरान में कहा गया है किः كنتم خير امة اخرجت للناس तुम्हें एक बेहतरीन समुदाय बनाया गया है लोगों के लिए. एक दूसरी हदीस में कहा गया हैः خيركم من ينفع الناس कि तुममें बेहतर वो है जो लोगों को नफ़ा पहुंचाता है. हमें अपने आप से सवाल करने की ज़रूरत है कि इनमें से कौन सी शर्त हम पूरा कर रहे हैं. भारत में एक छोटा सा संप्रदाय है ईसाइयों का. उनकी पहचान यह है कि उन्होंने पूरे देश में स्कूल के स्तर पर सबसे बेहतर शिक्षा देने का काम सभी के लिए किया है. एक दूसरा छोटा समुदाय है हमारे सिख भाइयों का. देश में कहीं कोई संकट कोई आपदा आए वो राहत देने के लिए पहुंच जाते हैं और सबसे पहले प्रभावित लोगों के खाने की व्यवस्था करते हैं. यह काम वह केवल भारतीयों के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए करते हैं अभी पिछले साल जब रोहिंग्या शर्णार्थी भारत आए तो हमारी संस्थाओं ने केवल बयान दिए और हमारे सिख भाइयों ने उनके लिये खाने की व्यवस्था की.

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माइनोरिटी शब्द का इस्तेमाल बेमानी

आरिफ़ ने कहा कि अंग्रेज़ों के दौर में हर चीज़ को हिन्दू-मुस्लिम के दृष्टिकोण से देखा जाता था. सांवैधानिक प्रावधान और सरकारी नीतियां 'बांटो और राज करो' के उपनिवेशी सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग होती थीं. आज़ादी के बाद नए संविधान में हिन्दू-मुस्लिम या जाति और लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध घोषित कर दिया गया तो उस बंटवारे की मानसिकता ने अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. अगर आप संविधान का ग़ौर से अध्ययन करें तो पाएंगे कि संविधान ने कहीं भी इस शब्द को परिभाषित नहीं किया है बल्कि केवल इतना कहा है कि भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को शिक्षण संस्थाएं बनाने का अधिकार होगा जिसे मदद करने में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. यहां अल्पसंख्यक के नाम पर अपने संसाधन लगाकर समाज को कुछ देने की बात की जा रही है उसके नाम पर विशेषाधिकार मांगने की नहीं. लेकिन विडंबना यह है कि इस शब्द का प्रयोग समाज में धर्म के नाम पर अलग पहचान बनाने के लिए किया गया. किसी व्यक्ति या समुदाय की पहचान उसके कर्मों से बनती है, सेवाभाव से बनती है, त्याग से बनती है. पहचान इससे नहीं बनती कि आप कितनी महिलाओं से शादी कर सकते हैं या अपनी पत्नी को तीन बार तलाक़ शब्द कहकर घर से बाहर निकाल सकते हैं.

यह चुनाव किसी समुदाय का नहीं सबका

चुनाव लोकसभा के लिए हुए हैं ताकि देश में संविधान के अनुसार अगले पांच साल के लिए सरकार का गठन हो सके. आरिफ़ ने कहा कि चुनाव भारत के मतदाताओं द्वारा किया जाता है धार्मिक समुदायों द्वारा नहीं. सरकार पूरे देशवासियों के लिए बनती है किसी समुदाय के लिये नहीं. इसी तरह सरकार सबके लिए काम करती है किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं. अगर देश में शिक्षास्तर सुधरेगा, स्वास्थ सुविधाएं बढ़ेंगी तो इसका फ़ायदा सबको होगा किसी एक समुदाय को नहीं. चुनावों को किसी एक समुदाय के दृष्टिकोण से देखना अपने आप में आपत्तिजनक है. ऐसा करना भारतीय संविधान की आत्मा के विरुद्ध है और यह बंटवारे की मानसिकता का प्रतीक है जो उपनिवेशी युग में हमारे दिमागों में कूट-कूटकर भरी गई थी. देश की ग़ुलामी ख़त्म हो गई लेकिन यह मानस आज भी कहीं न कहीं ज़िंदा है और हमें हर चीज़ को सांप्रदायिक चश्मे से देखने के लिए लुभाता है.

विरोध तो सर सैय्यद का भी किया गया

1947 के विभाजन के बाद जब मुसलमानों में ज़बरदस्त मायूसी और ख़ुदशिकस्तगी का माहौल था तब मौलाना आज़ाद ने दिल्ली में जामा मस्जिद की सीढ़ियों से अपनी तक़रीर में यही बात कही थी. लेकिन हमने तारीख़ी शऊर को ज़माना हुआ उठाकर ताक़ पर रख दिया है और अक़्ल के बजाय जोश और जज़्बे से काम लेते हैं और फिर हर 30 साल बाद उस चीज़ को क़ुबूल कर लेते हैं जिसको पहले ग़ैरइस्लामी बताते हैं. हमने सर सय्यद के साथ क्या किया, मौलाना आज़ाद के साथ क्या किया यह सब तारीख़ में महफ़ूज़ है और अगर हम आज भी उससे सबक़ लेना चाहें तो जिस बदालव की ज़रूरत है उसमें हमारी मदद कर सके.

लिंचिंग अफसोसनाक पर ये घटनाएं 2014 से पहले भी हुई हैं

आरिफ़ ने कहा-लिन्चिंग के जितने मामले हुए हैं वह निहायत अफसोसनाक और बड़ी ट्रेजडी हैं लेकिन यह कहना कि यह घटनाएं पहली बार 2014 के बाद हुई हैं तथ्यों को नकारना है. अभी पिछले साल शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब का लेख इन्डियन एक्सप्रेस में छपा था, जहां बताया गया था कि 1950 की दहाई में उनके वालिद पर जो इन्सपैक्टर ऑफ़ स्कूल थे किस तरह एक स्कूल में हमला किया गया जिसके दौरे पर वो गए थे. इस हमले में उनकी कई हड्डियां टूट गईं थी और लोग उनको मुर्दा समझकर छोड़ गए थे. यह सब इसलिए हुआ था क्योंकि उस दिन गांव में यह अफ़वाह फैल गई थी कि बराबर के किसी गांव में गाय के एक बछड़े का किसी ने वध कर दिया है. उस समय फ़ारूक़ी साहब के नाना यूपी में विधायक थे उन्होंने विभाग के बड़े अफ़सरों से मिलकर अनुरोध किया कि फ़ारूक़ी साहब की हालत को देखते हुए उन्हें फ़ील्ड से हटाकर कहीं आफ़िस मे लगा दिया जाय लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई.

लिन्चिंग हो या कोई और घटना किसी एक मासूम इंसान की जान लेना संविधान और इंसानियत के ख़िलाफ़ अपराध है इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिन हर अपराधिक कार्रवाई के लिए सरकार को ज़िम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता. हां, सरकार से यह अपेक्षा कि वह अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई करके अपना संवैधानिक दायित्व अदा करे सर्वथा उचित है लेकिन बाज़ वक़्त बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई हो बल्कि दिलचस्पी इसमें है कि कैसे हर मौक़े का इस्तेमाल सरकार की निन्दा करने के लिए हो.

आरिफ़ मोहम्मद का कहना है कि लिन्चिंग की घटनाओं के विरुद्ध बोलना और अपराधियों पर कार्रवाई की मांग बिल्कुल उचित है लेकिन उसके साथ यह भी स्वीकार करना चाहिए कि पिछले पांच साल में पूरे देश में एक भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ है. अगर भारत दंगा मुक्त हो जाता है तो फिर उन राजनीतिक दलों का अस्तित्व ख़तरे में आ जायेगा जो एक वर्ग को दंगों का डर दिखाकर उन्हें वोट ब्लॉक बनाते हैं. हमें लिन्चिंग के ख़िलाफ़ बोलना चाहिए लेकिन साथ ही सरकार को भारत को दंगा मुक्त बनाने की शुरुआत करने का श्रेय देने में भी कंजूसी नहीं करनी चाहिए फिर हम यह कह सकेंगे कि हमारी आलोचना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं है.

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तीन तलाक पर स्टैंड ठीक

तीन तलाक पर आरिफ़ ने मोदी सरकार के स्टैंड का पुरज़ोर समर्थन किया साथ ही कहा कि इस मुद्दे को मैं बीते 30 सालों से लगातार उठआता रहा हूं.

मुस्लिमों के हालात पर

आरिफ़ ने कहा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि हर व्यक्ति को अपने आमाल का फल भोगना पड़ता है. अगर हमें नाकामियों और समस्याओं का सामना है तो अपना मुहासिबा करना होगा और दूसरों पर इल्ज़ाम लगाने के बजाय अपने अन्दर बदलाव लाना होगा.

मोदी की जीत पर

आरिफ़ ने कहा कि यह देश की जनता का फ़ैसला है. लोकतंत्र में आप चुनाव के ज़रिए सरकार बदल सकते हैं लेकिन जनता को नहीं बदला जा सकता. इस फ़ैसले को पूरे देश को सहर्षता से स्वीकर करना चाहिए और विरोधियों को सस्ती ग़ैरसंसदीय भाषा के इस्तेमाल की जगह रचनात्मक विरोध की कला सीखनी चाहिए.

मुस्लिमों ने बीजेपी को वोट दिया

मुस्लिमों के बीजेपी को वोट देने के सवाल पर आरिफ़ ने कहा कि मेरे पास यह जानने का कोई आला नहीं है कि किस संप्रदाय के कितने लोगों ने किसे वोट दिया लेकिन मैं ज़ाती तौर पर ऐसे बहुत से मुसलमानों को जानता हूं जिन्होंने खुलकर बीजेपी को वोट दिया है.

गौरतलब है कि आरिफ मोहम्मद खान मुस्लिम मामलों को लेकर प्रगतिशील विचारों के माने जाते रहे हैं. तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार के दौरान चर्चा में आए शाहबानो केस में आरिफ मोहम्मद खान ने अपनी ही सरकार के खिलाफ स्टैंड लिया था. आरिफ ने सरकार की मुस्लिम संगठनों के दबाव में आने की आलोचना की थी. तलाक को लेकर 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया गया उनका भाषण काफी मशहूर भी हुआ.

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First published: May 29, 2019, 5:52 AM IST
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