हिरासत में मौत का मामला, बर्खास्त IPS संजीव भट्ट को उम्रकैद

हिरासत में मौत मामले में गुजरात की जामनगर कोर्ट ने बर्खास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और उनके सहयोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है.

News18Hindi
Updated: June 20, 2019, 2:45 PM IST
हिरासत में मौत का मामला, बर्खास्त IPS संजीव भट्ट को उम्रकैद
आईपीएस संजीव भट्ट और सहयोगी को कोर्ट ने सुनवाई उम्रकैद की सजा
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Updated: June 20, 2019, 2:45 PM IST
हिरासत में मौत के मामले में गुजरात की जामनगर कोर्ट ने बर्खास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और उनके सहयोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है. साल 1990 में जामनगर में भारत बंद के दौरान हिंसा हो गई थी. उस दौरान संजीव भट्ट जामनकर के एएसपी थे. हिंसा के दौरान 133 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

बताया जाता है हिरासत में एक आरोपी की मौत हो गई थी. उस वक्त भट्ट और उनके साथियों पर आरोपी के साथ मारपीट करने का आरोप लगा था. हिरासत में मौत के इस मामले में संजीव भट्ट और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया गया था.

क्या था पूरा मामला?
नवंबर 1990 में प्रभुदास माधवजी वैश्नानी नाम के एक शख्स की कथित तौर पर हिरासत के दौरान प्रताड़ना की वजह से मौत हो गई थी. उस समय संजीव भट्ट जामनगर में सहायक पुलिस अधीक्षक थे, जिन्होंने अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर भारत बंद के दौरान दंगा करने के मामले में 133 लोगों को हिरासत में लिया था. इनमें से एक शख्स प्रभुदास माधवजी वैश्नानी थे.

वैश्नानी को नौ दिन तक पुलिस हिरासत में रखा गया था. जमानत पर रिहा होने के बाद दसवें दिन उनकी मौत हो गई. मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार, गुर्दो फेल हो जाने की वजह से मौत हुई थी.

भट्ट के खिलाफ केस दर्ज

भट्ट और अन्य अधिकारियों के खिलाफ हिरासत में प्रताड़ना के आरोप में केस दर्ज किया गया. साल 1995 में मजिस्ट्रेट द्वारा इस मामले का संज्ञान लिया गया था. हालांकि 2011 तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी.
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12 जून को सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था. भट्ट ने याचिका में अपने खिलाफ हिरासत में हुई मौत के मामले में गवाहों की नए सिरे से जांच की मांग की थी. संजीव भट्ट गुजरात के बर्खास्त आईपीएस अफसर हैं. भट्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

इस घटना के दौरान गुजरात सरकार ने उन पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी थी. 2011 में राज्य सरकार ने भट्ट के खिलाफ ट्रायल की अनुमति दे दी.



साल 2015 में बर्खास्त किए गए आईपीए अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि मामले में 300 गवाहों के बयान लिए जाने थे लेकिन कई महत्वपूर्ण गवाहों को छोड़कर सिर्फ 32 गवाहों का ही परीक्षण किया गया. भट्ट ने कहा, मामले की जांच करने वाले तीन पुलिस अधिकारियों और अन्य गवाह जिन्होंने कहा कि हिरासत में कोई प्रताड़ना नहीं हुई थी, उन लोगों के बयान नहीं लिए गए.
First published: June 20, 2019, 12:12 PM IST
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