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क्या वैश्विक नेताओं के लिए शिखर बैठकों में दिखावे और आडंबर छोड़ने का समय आ गया है?

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत की यात्रा पर आने वाले हैं (फाइल फोटो)

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत की यात्रा पर आने वाले हैं (फाइल फोटो)

ऐसे समय में जब सरकारों (Governments) के काम-काज पहले से ज़्यादा जटिल हो गए हैं, जहां तकनीक (Technology) की वजह से तत्काल और सुरक्षित संवाद संभव हो गया है, शिखर बैठकों (Summit Meetings) से किसी देश का राष्ट्रीय हित नहीं सधता है.

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    (प्रवीण स्वामी)

    नई दिल्ली. ऐसे समय में जब सरकारों (Governments) के काम-काज पहले से ज़्यादा जटिल हो गए हैं, जहां तकनीक की वजह से तत्काल और सुरक्षित संवाद (Immediate and secure communication) संभव हो गया है, शिखर बैठकों ( Summits) से किसी देश का राष्ट्रीय हित नहीं सधता है.

    जिस वजह से विश्व के नेतागण (Politicians) शिखर बैठकों के प्रति लालायित रहते हैं उसको समझना मुश्किल नहीं है. यह मीडिया (Media) का आकर्षण है जो ये लोग इन बैठकों के साथ जुड़े हुए हैं.

    तिलसित की संधि है उदाहरण
    औस्टरलिट्ज और जेना में अपनी सेना की जीत से ख़ुश फ़्रांस का बादशाह नेपोलियन बोनापार्ट (French Emperor Napoleon Bonaparte) 1807 की गर्मी में अपने पराजित दुश्मनों के साथ यूरोप को एक नया आकार देने के लिए एक जहाज़ की ओर चल पड़ा जो तिलसित की नीमन नदी में रुका हुआ था. इस जहाज़ पर दो बड़े उजले टेंट लगे हुए थे जिनमें से एक पर फ़्रांस के बादशाह के लिए ‘N’ लिखा था और दूसरे पर ‘A’ लिखा था जो रूस के ज़ार अलेक्सांद्र पाव्लोविच के लिए था. प्रशा के राजनयिक ने कड़वाहट के साथ यह ग़ौर किया कि उनके राजा फ़्रेड्रिक विलियम III के लिए वहां कोई टेंट नहीं था.

    शांति की ओर बढ़ते इस क़दम से क़दम मिलाने के लिए मनोरंजन और भोज के पुख़्ता इंतज़ाम किए गए थे. नेपोलियन और अलेक्सांद्र नियमित रूप से एक साथ खा-पी रहे थे और अंधेरे के बाद लंबी चहलक़दमी करते थे. एक पत्र में, नेपोलियन ने अपनी पत्नी से शरारती अन्दाज़ में इस ख़बर का ज़िक्र किया कि वह प्रशा की (Queen of Prussia) रानी डचिस लूईज़ ऑफ़ मेकलेनबर्ग-स्ट्रेलिट्ज़ के साथ इश्कबाज़ी कर रहा है.

    इसके बाद, “दुनिया में सुख और शांति सुनिश्चित करने के लिए” एक समझौता हुआ, दो नव-घनिष्ठ-मित्र (New Fast Friends) ने तिलसित को अलविदा कहा और तुरंत बाद एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंपने की तैयारी करने लगे.

    मोदी-ट्रम्प मुलाक़ात
    इस सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (President Donald Trump) के बीच मुलाक़ात होनेवाली है और यह पूछने का अच्छा मौक़ा है कि यह सब क्या हो रहा है. भारत-अमरीका के बीच मुक्त व्यापार समझौता गतिरोध में फंसा हुआ है; भारतीय सूचना तकनीक कर्मियों के लिए वीज़ा को लेकर आशा की कोई किरण भी नहीं दिख रही है. भारत $3.5 अरब के जिस सैनिक साजोसामान की ख़रीद की घोषणा करनेवाला है उसमें दोनों नेताओं के हस्तक्षेप की कोई ज़रूरत नहीं है; इस बात की भी उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान पर भारत और अमरीका अचानक एक दूसरे से आंखों में आंखें डालकर बात करने लगेंगे.

    दिखावे और शोर-शराबें को अगर छोड़ दिया जाए तो इस शिखर बैठक (Summit Meeting) में देखने लायक़ कुछ भी नहीं होगा. और दुनिया भर में नेताओं के बीच होनेवाले शिखर बैठकों की भी सच्चाई यही होती है. तिलसित की संधि का दुखांत हमें यह सिखाता है कि नेताओं के आपसी रिश्ते और करिश्मा से किसी देश का ज़्यादा भला नहीं होता.

    पिछले कुछ सालों में शिखर बैठकों के परिणाम बिल्कुल खास नहीं रहे
    पिछले कुछ साल शिखर बैठकों के परिणाम की दृष्टि से काफ़ी उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रम्प और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग-युन के बीच 2019 की शिखर बैठक विफल रही. 2018 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ट्रम्प की शिखर बैठक से हुई आमद नकारात्मक रही और अमरीकी अख़बारों ने इस बैठक की धज्जियां उड़ा दी. और प्रधानमंत्री मोदी की प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ (Prime Minister Nawaz Sharif) के साथ 2015 की चौंकानेवाली शिखर बैठक की परिणति इस रूप में हुई कि शरीफ़ के अपने ही सैनिक अधिकारियों ने उन्हें गद्दी से उतार दिया.

    अंतरराष्ट्रीय संबंध संभालने की जिम्मेदारी पेशेवरों की होती थी, राजनीतिकज्ञों की नहीं
    यह समझना ज़रूरी है कि शिखर बैठक तकनीक की एक कलात्मक कृति (Artistic Work) है. इतिहास इस बात का गवाह है कि दूरी की वजह से शासकों का मिलना बमुश्किल ही हो पाता था सो राजनयिक ज़िम्मेदारी पेशेवरों को सौंप दी जाती थी. पेशेवर दूतों के संदेश ज़बरन वसूली करनेवाले पेशेवरों से बहुत अलग नहीं होते थे. “सूर्योदय से सूर्यास्त तक, पूरी दुनिया हमारी है”, इलखान के बादशाह अबाक़ा खान ने सुल्तान रुक्न अल-दिन बैबर्स को 1266 में लिखा. “आपको निश्चित रूप से समर्पण कर देना चाहिए”.

    एल्मर प्लिस्चके ने लिखा है कि फ़्रैंक्लिन डेलानो रूज़वेल्ट, जो 1933-1945 तक अमरीका के राष्ट्रपति रहे, के समय तक उनके सिर्फ़ पांच पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों (Former Presidents) ने ही विदेशी धरती पर क़दम रखा था. अधिकांश समय, अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों की ज़िम्मेदारी पेशेवर ही संभालते थे, राजनीतिज्ञ नहीं.

    पिछली सदी से ठीक से शुरू हुई वैश्विक नेताओं के बीच आपसी बातचीत
    पिछली सदी की शुरुआत में, यद्यपि राष्ट्र-राज्यों के आपसी संबंध काफ़ी जटिल हो गए, नेताओं ने निजी करिश्मे को नौकरशाही (Bureaucracy) के प्रतिरोध को भोथरा करने के लिए एक साधन के रूप में आज़माना शुरू कर दिया ताकि लंबे समय से लटके चले आ रहे समस्याओं को हल किया जा सके. “अगर आप किसी बात को सुलझाना चाहते हैं, तो आप अपने विरोधी से मिलिए और उसके साथ बातचीत से इसे निपटा लीजिए”, यह कहना था डेविड लॉयड-जॉर्ज का जो 1916-1922 के बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. “पत्र लिखना अंतिम उपाय है”.

    यह शीघ्र ही पता चल गया कि बातचीत हमेशा ही बुद्धिमानी भरा क़दम नहीं होता. 1939 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री (British PM) नेविल चैंबेरलेन को जर्मनी के फ़्युरर ने धोखा दिया - दोनों ने 1939 में जिस समझौते पर हस्ताक्षर किया था उसे “दोनों देश की जनता का एक दूसरे के ख़िलाफ़ फिर कभी लड़ाई नहीं करने की इच्छा” का सबूत बताया.

    पर राजनय का इतिहास बताता है कि कटु अनुभव राजनीतिक नेताओं के अहंकार को कम नहीं कर पाता है. 1945 के पॉट्स्डैम सम्मेलन तक आते-आते, जिसमें सोवियत संघ, अमेरिका (America) और ग्रेट ब्रिटेन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के यूरोप की संरचना का फ़ैसला लिया, विश्व के नेताओं के बीच शिखर बैठक आम बात हो गई थी. एक नए तरह के राजनय की आधारशिला रखी जा चुकी थी जिसके केंद्र में तमाशा करना था.

    राजनीतिक नेताओं के अहंकार
    तिलसित के जंगलों में अंतरंग चहलक़दमी के बाद नेपोलियन और अलेक्सांद्र तुरंत ही अपनी राजनीतिक उद्देश्यों और हितों को साधने की बात सोचने लगे. फ़्रांसीसी राजा ने बाल्कन्स में रूसी हितों के रास्ते में रोड़े अटका दिए. इसके बदले, दबाव झेल रहे अपने ख़ज़ाने को राहत दिलाने के लिए अलेक्सांद्र ने उस नाकेबंदी को समाप्त कर दिया जो ब्रिटेन के बाल्टिक और रूसी व्यापार (Russian Business) को अवरुद्ध करने के लिए था. अंततः, 1812 में नेपोलियन ने रूस के साथ एक विनाशकारी लड़ाई छेड़ दिया जिसमें उसकी सेना का सफ़ाया हो गया और अलेक्सांद्र ने दो साल बाद पेरिस के दरवाज़े को ज़बरन खोल दिया.

    इसके बावजूद कि शिखर बैठकों का ऐतिहासिक अनुभव, ज़्यादा से ज़्यादा, मिश्रित रहा है, आधुनिक नेताओं (Modern Politicians) का आज भी अपने व्यक्तित्व की ताक़त पर भरोसा क़ायम है.

    इसके परिणाम काफ़ी अप्रत्याशित रहे. राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी का सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव के साथ 1961 की विएना शिखर बैठक दोनों के बीच आपसी संदेह को और बढ़ा दिया. प्रधानमंत्री हैरल्ड मैकमिलन का अपने करिश्माई व्यक्तित्व में विश्वास का अंजाम यह हुआ कि उन्होंने 1962 में चार्ल्ज़ द गॉल के साथ शिखर बैठक में दुभाषिये की मदद नहीं ली. इस बैठक के बाद दोनों के बीच जो ग़लतफ़हमी पैदा हुई उसके कारण फ़्रांस ने यूरोपीय समुदाय में ब्रिटेन (Britain) के शामिल होने के पहले आवेदन को वीटो कर दिया.

    डिप्लोमेसी में शिखर वार्ता से बनती है सतही-समझ
    राजनय के इतिहासकार पीटर वेलमन ने कहा है कि शिखर वार्ता-निर्देशित राजनय से अमूमन “सतही समझ बनती है जो आगे चलकर मनमुटावों को और गंभीर बना देता है. राष्ट्र प्रमुख (Head of Nations) हथियारों के नियंत्रण, व्यापार या बैठक के अन्य जटिल मुद्दों के बारे में विशेषज्ञता नहीं रखते”.

    इसके उलट, पेशेवर राजनयिक परामर्श के कारण राष्ट्रपति केनेडी और चेयरमैन ख्रुश्चेव 1963 में क्यूबा मिसाइल कॉन्फ्रेंस को सुलझा सके और दुनिया के सिर पर मंडरा रहा एक परमाणु युद्ध (Nuclear War) का संकट टल पाया और इसके लिए नेताओं को एक बार भी आमने-सामने बैठकर बात करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. और राष्ट्रपति निक्सन की चीन के माओ जेडोंग के साथ 1973 की बैठक में स्पष्ट सफलता सिर्फ़ इसलिए मिली क्योंकि उसमें रणनीतिक हितों का मिलान हुआ न कि नेताओं की आपसी निजी गर्माहट की कोई भूमिका थी.

    शिखर बैठकों में जाने से नेताओं को मिलते हैं चुनावी और राजनीतिक फायदे
    जिस वजह से विश्व के नेतागण शिखर बैठकों के प्रति लालायित रहते हैं उसको समझना मुश्किल नहीं है. यह है मीडिया का आकर्षण जो इन बैठकों के साथ जुड़े हुए हैं. बहादुर वैश्विक नेताओं का लंबे समय से चली आ रही समस्याओं से जूझते हुए दिखने का मजमा; स्टेटस और प्रतिष्ठा-लोकप्रियता हासिल करने के इस युग में इनसे चुनावी और राजनीतिक फ़ायदे (Political Benifit) मिलते हैं.

    जान मेलिसेन ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए लिखा है, “विफलता से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (Presidents and Prime Ministers) बैठकों के प्रति अपने मोह को त्याग नहीं पाते हैं. कई सारे राजनीतिक व्यक्तियों के लिए शिखर बैठकों में भाग लेना नशीली दवा की आदत पड़ने जैसा हो गया है”.

    ऐसे समय में जब सरकारों के काम-काज पहले से ज़्यादा जटिल हो गए हैं, जहां तकनीक की वजह से तत्काल और सुरक्षित संवाद संभव हो गया है, शिखर बैठकों से किसी देश का राष्ट्रीय हित नहीं सधता है. भले ही इसका वास्तविक महत्व कुछ नहीं हो, पर कुछ ऐसे वैश्विक नेता हैं जो नक़ली, कर चुकानेवालों (Tax payers) के पैसे से ख़रीदी जानेवाली इस प्रतिष्ठा को छोड़ना चाहते हैं जो दिखावे और आडंबर से आते हैं.

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