क्या है संविधान की धारा 497, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बताया असंवैधानिक

क्या है संविधान की धारा 497, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बताया असंवैधानिक
प्रतीकात्मक तस्वीर

जस्टिस मिश्रा ने कहा, मूलभूत अधिकारों में महिलाओं के अधिकारों को भी शामिल किया जाना चाहिए. एक व्यक्ति का सम्मान समाज की पवित्रता से अधिक जरूरी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2018, 12:48 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने 150 साल पुराने एडल्टरी कानून को असंवैधानिक बताया है. पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने एकमत से कहा कि यह कानून पुरुष को महिला का मास्टर मानता है जो कि बराबरी के अधिकार के खिलाफ है. कोर्ट ने कहा कि एडल्टरी तलाक का आधार हो सकता है लेकिन अपराध नहीं है.

एडल्टरी यानी शादी से बाहर संबंध को अपराध बनाने वाली धारा 497 के खिलाफ लगी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है.

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भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र से यह सवाल किया था. केंद्र ने संविधान बेंच से कहा था कि एडल्टरी अपराध है, क्योंकि इससे विवाह और परिवार बर्बाद होते हैं.



क्या है धारा 497?
धारा 497 केवल उस पुरुष को अपराधी मानती है, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं. पत्नी को इसमें अपराधी नहीं माना जाता. जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ता है. कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है, तो उसे पांच साल तक के जेल की सज़ा हो सकती है. लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है, तो उसे अपने पत्नी की सहमति की कोई जरुरत नहीं है.

क्या कहा गया था याचिका में?
याचिका में कहा गया था कि एडल्टरी पितृसत्तात्मक समाज पर आधारित है. इसमें महिला के साथ भेदभाव किया जाता है. यह महिला को पुरुष की संपत्ति मानता है, क्योंकि अगर महिला के पति की सहमति मिल जाती है, तो इसे अपराध नहीं माना जाता.

क्या है स्वीकृति का अर्थ?
केस की सुनवाई के दौरान एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठा था कि क्या सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को अपराध की श्रेणी में रखना चाहिए. उस वक्त चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पत्नी के साथ ज़बरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे रेप का दोषी माना जाएगा. फिर एडल्टरी के लिए तलाक जैसी सिविल रेमेडी भी है.

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अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने यह कहते हुए केंद्र की ओर से बहस शुरू की थी कि विवाह की एक संस्था के रूप में पवित्रता को ध्यान में रखते हुए ही एडल्टरी को अपराध की श्रेणी में रखा गया है. उन्होंने कहा कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करने संबंधी विदेशी फैसले पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए और भारत में प्रचलित सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये वर्तमान मामले में फैसला करना होगा.
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