लोकसभा चुनाव 2019: बंगाल में किसका बेड़ा पार लगाएगी ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति?

मूर्तियों को बनवाने और तोड़ने दोनों का बिजनेस कर लेते हैं हमारे नेता, आंबेडकर की मूर्ति तोड़ने का जारी है अंतहीन सिलसिला

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 16, 2019, 4:06 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019: बंगाल में किसका बेड़ा पार लगाएगी ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति?
ईश्वर चंद्र विद्यासागर (file photo)
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 16, 2019, 4:06 PM IST
अंतिम चरण के लोकसभा चुनाव से पहले पूरे देश की नजरें पश्चिम बंगाल पर लगी हैं. जबकि बंगाल के लोगों का फोकस समाज सुधारक ईश्वर चंद विद्यासागर की मूर्ति पर हो गया है. जिसे मंगलवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा में उत्पातियों ने तोड़ दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया है कि उनकी सरकार उसी जगह पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर की पंचधातु की प्रतिमा स्थापित करके तृणमूल कांग्रेस के गुंडों को जवाब देगी. दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी पर ही मूर्ति तोड़ने का आरोप लगाया है.

ममता बनर्जी ने इसे बंगाली माटी और मानुष का मुद्दा बनाने की कोशिश की है. इसीलिए ममता बनर्जी सहित पार्टी के कई नेताओं ने अपने ट्विटर हैंडल पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर की फोटो लगा ली है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि बंगाल में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति किसका बेड़ा पार लगाएगी? सियासी जानकारों का कहना है कि मूर्तियां भले ही बेजान होती हैं लेकिन नेता हमेशा उसके जरिए अपनी राजनीति में जान डालने की कोशिश करते रहते हैं. यही काम ये दोनों पार्टियां भी कर रही हैं.( ये भी पढ़ें: Lok Sabha Election 2019: कौन तोड़ेगा चुनावी चक्रव्यूह का सातवां द्वार?)

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हमारे नेता मूर्तियों को बनवाने और तोड़ने दोनों का बिजनेस करते हैं. मार्च 2018 की घटनाओं को याद करिए. त्रिपुरा में वामपंथियों का किला ढहते ही उपद्रवियों ने लेनिन की मूर्ति तोड़ दी थी. इसके बाद पश्चिम बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त करके उप पर कालिख पोत दी गई. तमिलनाडु के वेल्लूर जिले में पेरियार ईवी रामास्वामी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था.

डॉ. बीआर आंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने का तो अंतहीन सिलसिला जारी है. यूपी में इनकी मूर्तियां शुरू से ही एक वर्ग के निशाने पर रही हैं. बदायूं में तो एक मूर्ति तोड़ी गई. फिर नई बनवाकर उस भगवा रंग चढ़ाया गया. जब बीएसपी कार्यकर्ताओं ने विरोध किया तो आनन-फानन में उसे नीले रंग में रंग दिया गया.

क्या वोट दिलाती हैं मूर्तियां?

बड़ा सवाल यही है कि क्या महापुरुषों की मूर्तियां वोट दिलाती हैं? मायावती ने अपनी सरकार में आंबेडकर और अन्य दलित चिंतकों की मूर्तियां स्थापित करवाईं तो इसके पीछे भी कोई न कोई वजह मानी जा सकती है. मायावती ने तो जीते जी अपनी मूर्ति भी बनवा ली हैं. सियासी जानकारों का कहना है कि राजनीतिक उत्कर्ष में मूर्तियों का बड़ा योगदान है. इसीलिए सियासी लोग मूर्तियां लगवाने, उन मूर्तियों के पास जाने, जयंती मनाने में भी वोटों का गणित लगा लेते हैं.राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं "मूर्ति बनाने से किसी समाज का भला नहीं होता उससे लगवाने वाले का भला जरूर हो जाता है. देवी-देवताओं के बाद देश में सबसे ज्यादा मूर्तियां महात्मा गांधी की बनी हुई हैं लेकिन अब वह वोटों में कन्वर्ट नहीं होती हैं. अब वोटों में कन्वर्ट होती है आंबेडकर, सरदार पटेल और दूसरे पुरोधाओं की मूर्तियां. हर मूर्ति के पीछे किसी न किसी दल, विचारधारा की सियासत छिपी ही होती है."

सबसे बड़ी मूर्तियां?

गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी पर वल्लभभाई पटेल की विशालकाय मूर्ति 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' बनवाई गई है. इसे बनवाने का एलान गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2013 को किया था. 182 मीटर ऊंची इस मूर्ति को बनाने में 2989 करोड़ रुपये लगे हैं.

मुंबई, अरब सागर में करीब 3500 करोड़ रुपये की लागत से छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मारक बनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में मेमोरियल के लिए जलपूजन किया था. इसमें शिवाजी की 192 मीटर ऊंची प्रतिमा होगी. बीजेपी की इस कोशिश को मराठा समाज में पैठ बनाने की कसरत के तौर पर देखा जा रहा है. यह 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' से बड़ी होगी.

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जाति, मूर्तियां और उनका शुद्धिकरण!

महापुरुषों की मूर्तियों के सहारे राजनीति को आगे बढ़ाने का मंत्र कोई नया नहीं है. सन् 1979 में तत्कालीन डिप्टी प्राइम मिनिस्टर जगजीवन राम ने बनारस में पूर्व मुख्यमंत्री संपूर्णानंद की मूर्ति का अनावरण किया था. बताते हैं कि कार्यक्रम के अगले दिन एक जाति विशेष के लोगों ने गंगाजल से मूर्ति धोई. वजह जगजीवन राम की जाति थी. दूसरा उदाहरण भी बनारस का ही है.

साल 2014 में नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने मदन मोहन मालवीय की मूर्ति पर फूल चढ़ाया था. तब मूर्ति को समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने गंगाजल से धोया. पिछले साल 14 अप्रैल को वडोदरा में केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने आंबेडकर की मूर्ति पर श्रद्धांजलि अर्पित की. इसके बाद दलित वर्ग के लोगों ने मूर्ति को दूध और पानी से धोकर शुद्ध किया.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार मूर्तियों और सियासत का रिश्ता कुछ इस तरह से जोड़ते हैं. "आस्था और पूजा पद्धति में मूर्तियों का विशेष महत्व है. यह किसी न किसी वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक होती हैं. इसलिए न सिर्फ मूर्तियां बनवाने बल्कि उसके सम्मान और अपमान तक से राजनीति लोग वोट पाने में कामयाब हो जाते हैं. नेता हर स्थिति में मूर्तियों के सहारे अपना बिजनेस कर लेता है.”

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