अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने के बाद महाशक्ति बन जाएगा भारत, होंगे ये फायदे

भारत लगातार अंतरिक्ष की बड़ी शक्तियों में शुमार होने के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान पर पैसे खर्च कर रहा है. इसरो चीफ ने बताया कि गगनयान मिशन पर इसरो 1.43 अरब डॉलर की रकम खर्च करेगा. इस मिशन के तहत सात दिनों के लिए तीन यात्री अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे.

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Updated: June 13, 2019, 8:35 PM IST
अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने के बाद महाशक्ति बन जाएगा भारत, होंगे ये फायदे
खुद का स्पेस स्टेशन होने से अंतरिक्ष में कई सारी संभावनाओं के रास्ते भारत के लिए खुल जाएंगे (फाइल फोटो)
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Updated: June 13, 2019, 8:35 PM IST
भारत अंतरिक्ष में हर मायने में दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में शुमार होता जा रहा है. इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इसरो प्रमुख के सिवान ने गुरुवार को अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने की योजना की जानकारी दी. इस प्रोजेक्ट को उन्होंने भारत के 'गगनयान मिशन' का ही विस्तार बताया है. अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन इसलिए बनाए जाते हैं ताकि वैज्ञानिक ज्यादा वक्त तक अंतरिक्ष में रहकर उसके बारे में रिसर्च कर सकें.

भारत का गगनयान मिशन अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने की योजना है. इसी का विस्तार करते हुए अब इसरो ने सिर्फ मानव को अंतरिक्ष में भेजने की बात की बजाए इसके विस्तार के तौर पर पूरा का पूरा स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में स्थापित करने की बात कही है. गगनयान मिशन के तहत 2022 में अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा. पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान इसकी घोषणा की थी. इस मिशन के तहत भारत पहली बार अपने अंतरिक्ष विमान के जरिए अंतरिक्ष में अपने यात्री भेजेगा.



इस वक्त अंतरिक्ष में कितने स्पेस स्टेशन हैं?
अभी तक अंतरिक्ष में दो ही स्पेस स्टेशन हैं, जो धरती का चक्कर लगा रहे हैं. इनमें से एक है कई देशों के सहयोग से बना इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और दूसरा है चीन का तियानगॉन्ग-2. इनमें से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन काम कर रहा है और इस स्पेस स्टेशन में कोई न कोई हमेशा रहता है. वहीं चीन का तियानगॉन्ग-2 स्पेस स्टेशन काम तो कर रहा है लेकिन यहां हमेशा अंतरिक्षयात्री मौजूद नहीं रहते हैं.

पहले भी अंतरिक्ष में एल्मस और सोयुत सीरीज के कुछ अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किए जा चुके हैं. इसके अलावा स्काईलैब और तियानगॉन्ग-1 नाम के स्पेस स्टेशन भी रहे हैं.

नासा की खींची हुई इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की एक तस्वीर (फाइल फोटो)


क्यों बनाए जाते हैं स्पेस स्टेशन?
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स्पेस स्टेशन इसलिए बनाए जाते हैं ताकि अंतरिक्ष यात्री ज्यादा देर अंतरिक्ष में रहकर रिसर्च कर सकें. दरअसल से बड़े बड़े-बड़े स्पेसक्राफ्ट होते हैं जो अंतरिक्ष में तैरते रहते हैं. यह एक तरह की साइंस लैब होते हैं. कई बार कई देश मिलकर भी एक स्पेस स्टेशन को अंतरिक्ष में स्थापित करते हैं ताकि सारे मिलकर उनका उपयोग कर सकें.

कैसे बनाए जाते हैं स्पेस स्टेशन?
आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जिन चीजों को जोड़कर एक बड़े स्पेस स्टेशन की रचना की जाती है वे बारी-बारी से अंतरिक्षयात्रियों के जरिए अंतरिक्ष में ले जाई जाती हैं. ये स्पेस स्टेशन धरती से 250 मील ऊपर की कक्षा में स्थापित किए जाते हैं. नासा अपने स्पेस स्टेशन का प्रयोग अंतरिक्ष में रहने और काम करने से जुड़े शोधों के लिए करता है. यहां रहकर उसके वैज्ञानिक अंतरिक्ष के बारे में कई सारी जानकारियां भी जुटाते हैं. हालांकि स्पेस स्टेशन कई बार धरती के बारे में जानकारियां जुटाने के काम भी आते हैं. इसके जरिए धरती के ऊपर मौजूद वायुमंडल के बारे में भी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं.

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अभी तक सबसे बड़ा स्पेस स्टेशन कौन सा है?
अंतरिक्ष में बनाया गया अब तक का सबसे बड़ा स्पेस स्टेशन इंटरनेशनल स्पेश स्टेशन है. 20 नवंबर, 1998 को इसका पहला हिस्सा रूस ने अंतरिक्ष में भेजा था. इस स्टेशन को बनाने में दो साल का वक्त लगा था. 2 नंबर, 2000 से इसने काम करना शुरू कर दिया था. तबसे अभी तक यह लगातार काम कर रहा है. इसमें ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए कई सारे सोलर पैनल लगे होते हैं. यह स्पेस स्टेशन कितना बड़ा होगा, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसका कुल वजन 3,91,000 किलोग्राम है. इस स्पेस स्टेशन में 6 एस्ट्रोनॉट यानि अंतरिक्षयात्री रह सकते हैं. जबकि एक अंतरिक्षयात्री यहां 6 महीने का वक्त गुजार सकता है.

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर स्काईवॉक करता एक एस्ट्रोनॉट (फोटो क्रेडिट- नासा)


धरती से भी देखा जा सकता है
यह अंतरिक्ष स्टेशन 28,000 किमी/घंटे की स्पीड से धरती का चक्कर भी लगाता है. इस तरह से वह धरती का एक चक्कर हर 90 मिनट में पूरा कर लेता है. इसे अंतरिक्ष में आसानी से देखा जा सकता है. यह शुक्र ग्रह जैसा दिखता है.

इस स्पेस स्टेशन को यूरोपीय देशों, अमेरिका, जापान, कनाडा और रूस के सहयोग से बनाया गया है. इसे दुनिया के सबसे बड़े संयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम के तौर पर भी जाना जाता है.

अभी तक 18 देशों के 230 लोग इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में जा चुके हैं. इन यात्रियों में भारतीय मूल की दो अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स भी शामिल हैं.

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मल-मूत्र के जरिए बनाया जाता है पानी
अंतरिक्ष यात्री पेगी वाटसन ने 2 सितंबर, 2017 को यहां पर लगातार 665 दिन गुजारकर सबसे लंबे वक्त तक अंतरिक्ष में रहने का रिकॉर्ड बना दिया था. उस पूरे स्पेस स्टेशन पर मात्र दो बाथरूम हैं. जिनमें जमा हुआ मल-मूत्र दोबारा लैब के जरिए पानी में बदल दिया जाता है, जिससे स्पेस स्टेशन पर पानी की कमी नहीं होती.

इस स्पेस स्टेशन पर ऑक्सीजन की सप्लाई इलेक्टोलिसिस की प्रक्रिया के जरिए होती है. जब एस्ट्रोनॉट स्टेशन से निकलकर अंतरिक्ष की यात्रा पर निकलते हैं तो इस प्रक्रिया को स्पेसवॉक कहा जाता है. एलेक्स लेओनोव नाम के अंतरिक्ष यात्री ने पहली बार 18 मार्च, 1965 को स्पेसवॉक की थी.

चीनी स्पेस स्टेशन में मौजूद एक चीनी एस्ट्रोनॉट (फाइल फोटो)


ऐसा है चीनी स्पेस स्टेशन का हाल
चीन के स्पेस स्टेशन को 'स्वर्ग का महल' के उपनाम से भी जाना जाता है. इस तियानगॉन्ग- 2 नाम के स्पेस स्टेशन को 2018 में स्थापित किया गया था. यह हालांकि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के मुकाबले छोटा है और मात्र 10.4 मीटर लंबा है. इसे चीन ने 2011 में स्थापित किया था. चीन के पहले की स्पेस स्टेशन तियानगॉन्ग-1 का चीन की स्पेस एजेंसी चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन से 2016 में कॉन्टेक्ट कट गया था.

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इसके लिए तय किया गया है 1.43 अरब डॉलर का बजट
इसरो चीफ ने यह भी बताया कि इस मिशन पर इसरो 1.43 अरब डॉलर की रकम खर्च करेगा. इस मिशन के तहत सात दिनों के लिए तीन यात्री अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे. माना जा रहा है कि यह लॉन्चिंग दिसबंर, 2020 तक हो जाएगी. इसरो को अभी इस मिशन पर जाने के लिए यात्रियों का चयन करना है, जिन्हें वायुसेना मिशन के लिए प्रशिक्षित करेगी.

स्पेस स्टेशन स्थापित करने से भारत को क्या फायदे होंगे?
भारत लगातार अंतरिक्ष की बड़ी शक्तियों में शुमार होने के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान पर पैसे खर्च कर रहा है. दरअसल माना जाने लगा है कि परमाणु बम की अधिकांश देशों के पास उपलब्धता और इसकी बड़ी संख्या में इंसानों को मारने की क्षमता के चलते आगे बड़ी शक्तियां परमाणु बम का प्रयोग करने से बचेंगीं.

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अंतरिक्ष रणक्षेत्र बना तो भारत होगा महाशक्ति
ऐसे में अंतरिक्ष अगला रणक्षेत्र हो सकता है. इसलिए भारत भी इस मामले में अपने बढ़ते कद के चलते पीछे नहीं रहना चाहता है. चीन अकेला ऐसा देश है जिसने अकेले स्पेस सेंटर स्थापित कर रखा है. भारत इस क्रम में दूसरा होगा. इसके अलावा आगे दूसरे ग्रहों पर बसने की संभावना के बारे में लगातार विचार चल रहा है. भारत भी ऐसे किसी प्रयोग में अन्य ताकतों के मुकाबले पीछे नहीं रहना चाहता है. यह भी इस कदम के पीछे एक बड़ी वजह है.

भारतीय स्पेस एजेंसी कमा सकती है अच्छे पैसे
इतना ही नहीं आने वाले दिनों में दुनिया भर में अंतरिक्ष टूरिज्म का क्रेज भी बढ़ेगा. अंतरिक्ष यात्रा सस्ती होने के साथ ही लोग बड़ी संख्या में अंतरिक्ष में जाना चाहेंगे. ऐसे में भारत इस दिशा में भी अपनी संभावनाएं देख सकता है और विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों की बजाए, कम पैसे में लोगों को अंतरिक्ष की सैर कराके भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) अच्छे पैसे कमा सकती है.

लगातार अंतरिक्ष में मजबूत हो रहा है भारत
भारत ने इससे पहले मार्च में अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने का कारनामा कर दिखाया था. इस मिशन को मिशन शक्ति नाम दिया गया था. इस मिशन की कामयाबी के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया था, जिनके पास मिसाइल को अंतरिक्ष में मार गिराने की तकनीक है. अब तक यह क्षमता मात्र अमेरिका, चीन और रूस के पास थी. पीएम मोदी ने खुद इस मिशन की सफलता की जानकारी देशवासियों को दी थी.

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