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OPINION: 'महाराष्ट्र पर अदालती फैसले में किसी की हार-जीत देखना ठीक नहीं'

Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 1:38 PM IST
OPINION: 'महाराष्ट्र पर अदालती फैसले में किसी की हार-जीत देखना ठीक नहीं'
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार.

महाराष्ट्र (Maharashtra) में सत्ता के लिए जबर्दस्त संग्राम चल रहा है. सवाल ये है कि कल शाम पांच बजे तक होने वाले फ्लोर टेस्ट से सबकुछ थम जाएगा या महाराष्ट्र राजनीति के इतिहास में कई पन्ने और लिखे जाएंगे?

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  • Last Updated: November 26, 2019, 1:38 PM IST
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महाराष्ट्र कांड पर सुप्रीमकोर्ट का फैसला बिल्कुल साफ है. हालांकि विधायिका के मामलों में न्यायपालिका आमतौर पर दखल देने में परहेज़ दिखाती है. लेकिन संविधान की रक्षा करना उसका काम है सो उसे विधायिका के मामले सुनने पड़ते हैं और अपना फैसला देना ही पड़ता है. इसीलिए अदालत ने सुना और ऐसा फैसला दिया कि जो काम विधानसभा में होता है वह वहां ही होगा.  इस मामले में एक विवाद सदन में बहुमत परीक्षण के समय को लेकर भी था. सो नजीरों के मुताबिक यह तय किया गया कि तीस घंटे के भीतर बहुमत परीक्षण कराया जाए. ये बात करना फिजूल है कि फैसला किस के पक्ष में है और किसके खिलाफ है. क्योंकि बहुमत पर फैसला तो सदन में होना है. फिर भी इतना जरूर कहा जा सकता है कि अदालत ने डेढ़ दिन के भीतर परीक्षण का निर्देश देकर तमाम अनैतिकताओं की संभावनाओं को कम या खत्म कर दिया है.

चूंकि अदालतों से ऐसे निर्देश पहले भी दिए जा चुके हैं. सो इस तरह का फैसला करने में ज्यादा अड़चन भी नहीं आई होगी. बहुमत परीक्षण होना ही है. इसलिए अब सारा जोर परीक्षण की प्रक्रिया पर है. इसके लिए प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति का मसला अहम है. जैसी परिस्थितियां इस बार महाराष्ट में हैं वैसी स्थिति कर्नाटक में भी बन चुकी है. सो नजीरों की बिना पर इस काम को निपटाने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं आनी चाहिए.  सुप्रीमकोर्ट के फैसले में सदन की कार्यवाही की सीधा प्रसारण करने का निर्देश भी है. सुनने में यह कोई खास बात नहीं लगती. लेकिन महाराष्ट्र कांड का अब तक का घटनाचक्र कई सनसनियों से भरा रहा है. इसके मद्देनज़र अदालत की यह सतर्कता किसी अफेदफे के अंदेशे को कम जरूर करती है. बेशक पारदर्शिता को भ्रष्ट आचारों को रोकने का एक उपाय माना जाता है. आखिरी नुक्ता व्हिप का है. यह मसला अदालत के सामने नहीं था. यही वह मसला है जो बहुमत परीक्षण के समय व्हिप के उल्लंघन को लेकर विधायकों की अयोग्यता को तय कर सकता है.


अगर इस तरह की कोई झंझट आई तो उसके बाद ही संवैधानिकता का सवाल उठेगा. लेकिन इस समय इस बारे में कोई बात किया जाना फिजूल है. यह भांपना मुश्किल काम है कि इस मामले में क्या स्थितियां बन सकती हैं. इतना जरूर कहा जा सकता है कि अदालती फैसला मुख्य रूप से बहुमत परीक्षण के समय को लेकर है. ज्यादा गौर से देखें तो तीस घंटे के भीतर परीक्षण की प्रक्रिया निपटाने के निर्देश ने एक पक्ष को राहत और दूसरे पक्ष को झटका जरूर दिया है. राहत और झटके की बात कहने का आधार यह है कि दोनों पक्ष इस बात पर अपने तर्क दे रहे थे. सो यह टिप्पणी करने में संकोच दिखाने की जरूरत नहीं है कि भाजपा और अजित पवार की रणनीति पर इसका बड़ा असर पड़ेगा.

उधर दूसरे पक्ष को अपने विधायकों को कई तरह की बलाओं से बचाने के लिए उन्हें इधर से उधर करने की जो झंझटयाऊ कवायद करनी पड़ रही थी वह अब ज्यादा देर तक नहीं करनी पड़ेगी. उसके लिए यह बड़ी राहत है. हर कथा का पटाक्षेप होता ही है. सो कुछ विश्लेषक समझ रहे हैं कि महाराष्ट्र कांड का कल पांच बजे पटाक्षेप हो जाएगा. लेकिन यह कांड कथा साहित्य का नहीं बल्कि बड़ी खुरदरी राजनीति का मामला है. राजनीति को आगे भी चलना है. इस आधार पर यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि कल सबकुछ समाप्त हो जाएगा. यह महाराष्ट्र है. राजनीतिक तौर पर उप्र के बाद दूसरे नंबर की हैसियत का प्रदेश. आर्थिक हैसियत में तो वह देश में नंबर एक पर है. देश की राजनीति पर असर डालने वाले ऐसे राज्य की सत्ता के लिए घमासान यूं ही खत्म थोड़े ही हो जाएगा.

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First published: November 26, 2019, 1:05 PM IST
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