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Opinion : जल जीवन मिशन: नल से जल तक ही नहीं, महिला सश्क्तिकरण का भी हल

Opinion : जल जीवन मिशन: नल से जल तक ही नहीं, महिला सश्क्तिकरण का भी हल

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं खुद से पानी की गुणवत्‍ता की जांच करके उसे जल जीवन मिशन पोर्टल पर उसे अपडेट करती हैं. (Pic- Special Arrangement)

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं खुद से पानी की गुणवत्‍ता की जांच करके उसे जल जीवन मिशन पोर्टल पर उसे अपडेट करती हैं. (Pic- Special Arrangement)

Jal Jeevan Mission: ये बात किसी से छिपी नहीं है कि परिवार में पानी की कमी का सबसे गहरा असर महिलाओं पर पड़ता है. भारत की महिलाएं हर साल औसतन 15 करोड़ काम के दिन पानी लाने में खर्च करती है, जिसका इस्तेमाल उनकी शिक्षा, हुनर विकास या किसी मानसिक और शारीरिक विकास में हो सकता है.

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    माधुरी शुक्ला

    नई दिल्‍ली. महिलाओं के लिए सामाजिक अधिकार एक लंबी और कठिन प्रक्रिया रही है. हालांकि स्वच्छ जल जैसे बुनियादी अधिकार के लिए मीलों दूर का सफर तय करने वाली महिलाओं (Women Empowerment) के लिए यही स्वच्छ जल दूर की कौड़ी नहीं रही है.

    जब हम ये कहते हैं कि जल ही जीवन है, तो वो यूं ही कहने वाली बात नहीं होती है. बगैर पानी के चाहे उद्योग हों, खेती हो, प्यास हो, स्वच्छता हो, सफाई हो किसी भी जरूरत की तरफ एक कदम नहीं बढ़ाया जा सकता है. इसलिए आज भी भारत के कई इलाकों में महिलाएं एक मटका पानी के लिए हजारों कदमों का सफर रोज़ तय करती हैं. पानी की पहुंच की महत्ता को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के तहत साफ जल और स्वच्छता (लक्ष्य 6.1 और 6.2 ) और सभी तक पानी की समान पहुंच को सुनिश्चित करने पर जोर दिया है.

    ये बात किसी से छिपी नहीं है कि परिवार में पानी की कमी का सबसे गहरा असर महिलाओं पर पड़ता है. भारत की महिलाएं हर साल औसतन 15 करोड़ काम के दिन पानी लाने में खर्च करती है, जिसका इस्तेमाल उनकी शिक्षा, हुनर विकास या किसी मानसिक और शारीरिक विकास में हो सकता है.

    पिछले दो दशकों में दुनियाभर में हुए कई अध्ययनों के बाद ये निष्कर्ष निकला है कि महिलाओं की ना के बराबर ये बिल्कुल भी भागीदारी नहीं होने की तुलना में अगर महिलाएं और पुरुष समान रूप से शामिल होते हैं, तो जल आपूर्ति की निरंतरता, पारदर्शिता और नेतृत्व में पर्याप्त सुधार देखने को मिलता है. विश्व बैंक के एक आकलन से पता चलता है कि महिलाओं के बिल्कुल भी शामिल नहीं होने की तुलना में उनके साधारण रूप से शामिल हो जाने पर ही जल परियोजनाओं पर 6 से 7 गुना असर बढ़ जाता है.

    15 अगस्त 2019 तक कुल 19.18 करोड़ परिवारों में से केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण घरों में ही नल से जल आने की व्यवस्था थी. आधिकारिक डाटा के मुताबिक जल जीवन मिशन के तहत आज तक करीब 43 फीसद परिवारों तक नल से जल पहुंचाने की व्यवस्था हो चुकी है और छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 100 फीसद पानी की आपूर्ति सुलभ हो चुकी है.

    हालांकि, इस मिशन का व्यापक उद्देश्य महज नलों की संख्या बढ़ाना नहीं है बल्कि जल जीवन मिशन उद्देश्य महिलाओं के जरिए एक ऐसी माहौल खड़ा करने है जिससे समुदायों खासकर महिलाओं को और सशक्त बनाने के लिए एक विकेंद्रीकृत तंत्र तैयार हो सके. जहां वह अपनी पानी की चिंता खुद जाहिर कर पाएं. आज ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं पीढ़ियों से चली आ रही सोच को बदल रही हैं और परंपरागत तौर ऐसे काम जो पुरुषों के ही माने जाते रहे हैं, जैसे प्लंबर, मिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन उनमें भी हाथ आजमा रहीं हैं. यही नहीं वे पानी की गुणवत्ता की जांच करके परिणामों को पोर्टल पर डालने का काम भी कर रही है.

    जल जीवन मिशन पानी की जांच और कार्यात्मकता के जरिए पानी की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान दे रहा है. जल आपूर्ति की निगरानी, स्वच्छ और सुरक्षित जल की जांच, बीमारी की जांच, प्रमाणीकरण प्रक्रिया और रोकथाम के तरीकों को प्राथमिकता दी जा रही है. जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए दिशानिर्देशों के मुताबिक इसकी जिम्मेदारी संबंधित क्षेत्र के ग्रामीण समुदाय की होती है.

    परियोजना सेवा का संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओपीएस) जल शक्ति मंत्रालय के साथ मिलकर जल जीवन मिशन पर वर्तमान में उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के 11 जिलों, विंध्य और प्रयागराज क्षेत्र में काम कर रहा है. उत्तर प्रदेश के ग्रामीणांचलों में पानी की पर्याप्त मात्रा होने के बावजूद पानी की गुणवत्ता हमेशा ही मुद्दा रहा है.
    पानी को संदूषित करने के लिए जिम्मेदार स्रोतों में प्राकृतिक रूप से धरती की अंदरूनी परत में मिलने वाले खनिज और रसायान ( जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, यूरेनियम आदि) स्थानीय स्तर पर जमीन में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ जैसे रासायनिक खाद, पेस्टिसाइड, पशुधन आदि, निर्माण प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले भारी धातु, सायनाइड, पेय जल स्रोतों के पास लगे हुए अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली जैसे सेप्टिक टैंक और ट्विन पिट शौचालय का खराब होना और सूक्ष्मजीवों को संदूषण का अपशिष्ट जल का पेय जल वितरण प्रणाली के साथ मिलना, शामिल है.

    जल गुणवत्ता के मुद्दे से निपटने के लिए यूएनओपीएस ने कम्युनिटी लेड एक्शन फॉर सेनिटरी सर्विलांस (क्लास) नाम की पहल की शुरूआत की है. क्लास की प्रक्रिया की शुरुआत समुदाय के सदस्यों के साथ संबंध स्थापित करके होती है. आगे समुदाय की पांच महिलाओं का चयन किया जाता है और उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है. उनका काम फील्ड टेस्ट किट के जरिए पेयजल स्रोतों में रासायनिक और सुक्ष्मजीवी संदूषण की जांच करना होता है. इसके नतीजों को संबंधित पोर्टल पर डाला जाता है जिससे एक बड़े वर्ग को इसकी जानकारी मिल सके और सुरक्षित और असुरक्षित जल स्रोतों के बारे में समुदाय को पता चल सके.

    अगर बैक्टीरिया से जुड़ा संदूषण मिलता है जो कि उत्तर प्रदेश में आम बात है. तो इससे अंदाजा लग जाता है कि संबंधित क्षेत्र के लोगों के पेय जल के साथ अपशिष्ट जल मिल रहा है. ऐसे में वहां के लोग तुरंत कार्यवाही कर सकते हैं और उबला पानी पीना, पानी में क्लोरीन और ब्लीचिंग पाउडर मिलाने जैसे सुरक्षा के उपाय अपनाते हैं. अगर रासायनिक संदूषण मिलता है तो पानी के सैंपल को जांच के लिए जिला प्रशासन और ब्लॉक स्तर पर भेजा जाता है. जिससे उचित कार्यवाही का जा सके.

    जिन महिलाओं को काम के लिए चयनित किया जाता है, धीरे धीर वो मिशन की पूरी जिम्मेदारी ले रही हैं. ये सदस्य अलग अलग संगठनों से आते हैं जिनमें एसएचजी, ग्रामीण और जल स्वच्छता समीति, आशा के साथ साथ सामुदायिक स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी जैसे एएनएम, शिक्षक है.

    इस विचार की सबसे बडी खासियत ये है कि समुदाय से बाहर का समन्वयक कभी भी समुदाय को कुछ करने के लिए दबाव नहीं डालता है, बल्कि इसे संगठन के काम की तरह लिया जाता है, जहां समुदाये के हर सदस्य अपने जल स्रोतों की रक्षा के लिए खुद फैसला लेते हैं. इस तरह ये काम से ज्यादा कर्तव्य बन जाता है.

    जल गुणवत्ता की निगरानी का कार्यभार महिलाओं को सौंप कर जहां महिलाओं को सशक्त किया जा रहा है, जल शक्ति मंत्रालय ने इन परिणामों को प्रबंधित करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के साझेदारी में जल गुणवत्ता प्रबंधन सूचना तंत्र नाम से समर्पित डैशबोर्ड तैयार किया है. जल गुणवत्ता से जुड़ा तमाम डाटा पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है. इस एप में प्रयोगशालाओं की संख्या, करीबी प्रयोगशला, वॉटर सेंपल और जांच के तरीके की विस्तार से जानकारी भी उपलब्ध है. जल संकट हमेशा ही महिलाओं से जुड़ा रहा है. जल जीवन मिशन ने इसके समाधान को भी महिलाओं से ही जोड़ा है. ( डिसक्लेमर – लेखिका यूएन ऑफिस फॉर प्रोजक्ट्स में कॉम्यूनिकेशन कंसल्टेंट हैं और ये उनके निजी विचार हैं.

    Tags: Jal Jeevan Mission, Water

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