तमिलनाडु में निकला फरमानः जल्लीकट्टू खेलना है तो दिखाओ आधार

पिछले काफी समय से विवादों में रहा दक्षिण भारत को खेल जल्लीकट्टू एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार सरकार ने इस खेल में भाग लेने वालों के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया है. पिछले साल इस खेल को लेकर एक आंदोलन भी हुआ है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 16, 2019, 10:20 AM IST
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पिछले काफी समय से विवादों में रहा दक्षिण भारतीय खेल जल्लीकट्टू एक बार फिर चर्चा में हैं. लेकिन इस बार कारण विवाद नहीं तमिलनाडु सरकार का विचित्र फरमान है. दरअसल तमिलनाडु सरकार ने इस खेल को खेलने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया है. यानी अब मोबाइल, बैंक अकाउंट और इनकम टैक्स के साथ-साथ जल्लीकट्टू जैसे पारंपरिक खेल के लिए भी आधार दिखाना होगा.



मदुरै ज़िला प्रशासन  ने कहा है कि जल्लीकट्टू में भाग लेने के इच्छुक व्यक्ति के लिए आधार कार्ड दिखाना अनिवार्य होगा. इस खेल का आयोजन 14 से 16 जनवरी के बीच पोंगल के दौरान किया जाएगा जिसमें हज़ारों लोगों के हिस्सा लेने की संभावना है.



यह खेल तमिलनाडु के मदुरै और दक्षिणी जिलों में मुख्य रूप से खेला जाता है. इस खेल को 20 से 40 साल के युवक ही खेल सकेंगे. आधार को लेकर इस नए फैसले से लोगों को हैरानी भी हो रही है और वह अपनी नाराजगी भी जता रहे हैं.





जल्लीकट्टू क्या है?
दरअसल, फसल कटाई के मौके पर तमिलनाडु में चार दिन का पोंगल उत्सव मनाया जाता है जिसमें तीसरा दिन मवेशियों के लिए होता है. तमिल में जली का अर्थ है सिक्के की थैली और कट्टू का अर्थ है बैल का सिंग. जल्लीकट्टू को तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक माना जाता है. इस खेल की परंपरा 2500 साल पुरानी बताई जाती है. पोंगल उत्सव के दौरान होने वाले इस खेल में परंपरा के अनुसार शुरुआत में तीन बैलों को छोड़ा जाता है जिन्हें कोई नहीं पकड़ता.



सिक्कों की थैली बैलों के सिंगों पर बांधी जाती है. फिर उन्हें भड़काकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है, ताकि लोग उन्हें पकड़कर सिक्कों की थैली हासिल कर सकें. इस खेल में बैलों पर काबू पाने वाले लोगों को इनाम भी दिया जाता है. इस खेल के लिए बैल को खूंटे से बांधकर उसे उकसाने की प्रैक्टिस करवाई जाती है.



इस खेल में रोमांच लाने के लिए बैलों को भड़काया जाता है इसके लिए उन्हें शराब पिलाने, नुकीली चीजों से दागने, उनपर सट्टा लगाने से लेकर उनकी आंखों में मिर्च डाला जाता है और उनकी पूंछों को मरोड़ा तक जाता है, ताकि वे तेज दौड़ सकें.



 क्या है विवाद

पशु कल्याण संगठनों के प्रयास के बाद साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों के साथ हिंसक बर्ताव को देखते हुए इस खेल को बैन कर दिया था. जिसके बाद तमिलनाडु में इस बैन के खिलाफ काफी प्रदर्शन हुआ, इस खेल को अपनी सांस्कृतिक विरासत बताते हुए रजनीकांत, कमल हासन जैसे कई सितारे भी इसके समर्थन में सामने आए. लगातार हो रहे प्रदर्शन के बीच केंद्र सरकार ने जनवरी 2016 में अधिसूचना जारी कर इस खेल की अनुमति दे दी. हालांकि इस खेल को जानवरों के साथ ज्यादती मानते हुए इसके खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई हैं. यह खेल सांस्कृतिक अधिकार है या नहीं इस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच सुनवाई करने वाली है.



 
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