जमात-ए-इस्‍लामी हिंद ने की NRC से बाहर हुए लोगों को मुफ्त कानूनी मदद की पेशकश

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Updated: September 4, 2019, 7:24 PM IST
जमात-ए-इस्‍लामी हिंद ने की NRC से बाहर हुए लोगों को मुफ्त कानूनी मदद की पेशकश
जमात का कहना है कि काफी लोग दस्‍तावेजों में मामूली कमी के कारण एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए.

संगठन ने असम में 19 लाख से ज्‍यादा लोगों को एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर किए जाने पर चिंता जताई. साथ ही दूसरे राज्‍यों में भी एनआरसी की कवायद शुरू करने की मांग का कड़ा विरोध किया. जमात ने कहा कि संगठन क्षेत्र, जाति या धर्म बिना देखे लोगों को मुफ्त कानूनी मदद मुहैया कराएगा.

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जमात-ए-इस्‍लामी हिंद (JIH) ने असम (Assam) में 19 लाख से ज्‍यादा लोगों को नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटिजंस (NRC) की अंतिम सूची (Final List) से बाहर किए जाने पर चिंता जताई है. साथ ही दूसरे राज्‍यों में भी एनआरसी की कवायद शुरू करने की मांग का कड़ा विरोध किया है. दिल्‍ली में संगठन के उपाध्‍यक्ष एस. अमीनुल्‍ला हसन ने कहा, काफी लोग दस्‍तावेजों में मामूली कमी के कारण एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए. जमात ऐसे लोगों को धर्म, जाति या समुदाय बिना देखे मुफ्त कानूनी मदद मुहैया कराने की पेशकश करता है.

लिखित में बताया जाए अंतिम सूची शामिल नहीं करने का कारण
एस. अमीनुल्‍ला हसन ने कहा कि सरकार देश के दूसरे हिस्‍सों में भी एनआरसी लागू करने के बजाय जनकल्‍याण और विकास जैसे अहम मुद्दों पर ध्‍यान दे. 'द वीक' की रिपोर्ट के मुताबिक, जमात में समुदायिक मामलों के सचिव मलिक मोहतसिन खान ने कहा, एनआरसी की अंतिम सूची उन लोगों के लिए करारा जवाब है जो यह कह रहे थे कि असम में 40 लाख घुसपैठिए हैं. एनआरसी सूची असम के लोगों के लिए राहत लेकर आई है. हम सरकार से मांग करते हैं कि अंतिम सूची में शामिल नहीं होने वाले लोगों को लिखित में इसका कारण बताया जाए.

लाखों को राज्‍यविहीन छोड़ने पर भारत की दुनिया में बिगड़ेगी छवि

खान ने उम्‍मीद जताई कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अंतिम सूची से बाहर हुए असम के करीब 20 लाख लोगों को यूं ही राज्‍यविहीन नहीं छोड़ेगी. इससे अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय में भारत की छवि को बहुत नुकसान होगा. बता दें कि एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर हुए लोग राज्‍य में स्‍थापित 300 फॉरनर्स ट्रिब्‍यूनल (Foreigner’s Tribunal) में अपील कर सकते हैं. राज्‍य सरकार अगले तीन महीने में 200 नए फॉरनर्स ट्रिब्‍यूनल भी स्‍थापित करेगी. इसके बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं. ट्रिब्‍यूनल और हाईकोर्ट के फैसले से भी असंतुष्‍ट लोग सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं.

अनुच्‍छेद-370 हटने के बाद कश्‍मीर के हालात पर जताई चिंता
जमात के उपाध्‍यक्ष मोहम्‍मद जफर से जब कश्‍मीर के हालात के बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने कहा कि हम भी अनुच्‍छेद-370 हटाने के बाद वहां बनी स्थिति को लेकर चिंतित हैं. पूरे देश की निगाहें जम्‍मू-कश्‍मीर के हालात पर टिकी हैं. सरकार की जिम्‍मेदारी है कि आम कश्‍मीरियों के मानवाधिकार सुरक्षित रहें. जफर ने कहा कि सरकार को राज्‍य में जल्‍द से जल्‍द हालात सामान्‍य करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके लिए वहां तैनात सेना की तादाद को घटाना चाहिए. सरकार को संचार व्‍यवस्‍थाओं पर लगाई गई पाबंदी हटानी चाहिए. साथ ही वहां जल्‍द चुनाव कराने चाहिए.
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जमात-ए-इस्लामी की स्थापना एक इस्लामिक-राजनीतिक संगठन और सामाजिक रूढिवादी आंदोलन के तौर पर ब्रिटिश भारत में 1941 में की गई थी.


क्‍या है जमात ए इस्लामी, ऐसे जमाईं कश्मीर में अपनी जड़ें
जमात-ए-इस्लामी की स्थापना एक इस्लामिक-राजनीतिक संगठन और सामाजिक रूढिवादी आंदोलन के तौर पर ब्रिटिश भारत में 1941 में की गई थी. इसकी स्थापना अबुल अला मौदूदी ने की थी, जो एक इस्लामिक आलिम थे. मौदूदी इस बात का समर्थक था कि शरिया (इस्लामिक कानून) और इस्लामिक संस्कृति की रक्षा जरूरी है. 1947 में हुए भारत-पाक विभाजन के बाद जमात जमात-ए-इस्लामी हिंद और जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान के तौर पर दो अलग व स्वतंत्र संगठनों में बंट गया. 1947 से 1952 तक कई पढ़े-लिखे नौजवान और निचली और मध्यम स्तरीय सरकारी नौकरियों से जुड़े लोग जमात के कश्मीरी नेतृत्व की ओर आकर्षित हुए, जो कश्मीर के पाकिस्तान में विलय के समर्थक थे.

जम्‍मू-कश्‍मीर में यह संगठन पांच साल के लिए है प्रतिबंधित
1952 में कश्मीर विवाद के चलते जमात-ए-इस्लामी हिंद का एक धड़ा उससे अलग हो गया. मौलाना अहरार और गुलाम रसूल अब्दुल्लाह कश्मीर में जमात के दो बड़े नेता थे. नवंबर, 1953 में इसके संविधान के मसौदे को स्वीकार कर लिया गया. एक साल बाद अक्टूबर, 1954 में श्रीनगर के रहने वाले सादुद्दीन तरबली को संगठन का प्रमुख चुना गया. तरबली 1985 तक इसी पद पर रहा. उसने अपने भाषणों के जरिये जमात की विचारधारा को पहले दक्षिणी कश्मीर के शोपियां और इसके बाद आस-पास के दूसरे इलाकों में फैलाना शुरू किया. जमात-ए-इस्‍लामी हिंद जहांं सशस्‍त्र विद्रोह से दूर रहता है. वहीं, जमात-ए-इस्‍लामी जम्‍मू-कश्‍मीर आतंक को बढ़ावा देता है. पुलवामा हमले के बाद इसे पांच साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है.

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First published: September 4, 2019, 5:53 PM IST
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