जम्मू-कश्मीर में चुनाव की आहट, अक्टूबर-नवंबर तक कराए जा सकते हैं विधान सभा इलेक्शन

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववादियों पर शिकंजा कसने के बाद अब दिल्ली में मंगलवार को बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में तय होगी अगली रणनीति

अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 6:46 PM IST
जम्मू-कश्मीर में चुनाव की आहट, अक्टूबर-नवंबर तक कराए जा सकते हैं विधान सभा इलेक्शन
जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने के लिए इस वक्त को हर तरह से अच्छा माना जा रहा है
अमिताभ सिन्हा
अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 6:46 PM IST
पिछले कुछ दिनों से कश्मीर में अफवाहों का बाजार गरम है. कोई अधिक सुरक्षा बल घाटी में भेजे जाने को लेकर चौकस हो रहा है तो कोई आ़र्टिकल 35 ए को हटाने के अंदेशे से कश्मीर घाटी में विस्फोट होने की बात कर रहा है. कहीं इमरान खान के साथ बैठे राष्ट्रपति ट्रम्प मध्यस्थता की बातें कर रहे हैं. इन सब से परे राज्य में विधान सभा चुनावों की सुगबुगाहाट है. बीजेपी आलाकमान ने कश्मीर के बीजेपी कोर ग्रुप को बैठक के लिए बुलाकर सीधा संकेत दे दिया है कि कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रहेगी. मंगलवार को दिल्ली में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक बुलाई गई है, जिसमें पार्टी के शीर्ष नेता हिस्सा लेंगे और कश्मीर के चुनावों को लेकर रणनीति बनेगी. यानी आने वाले समय में बाकी राज्यों के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव कराए जाने के आसार हैं. 17वीं लोकसभा के पहले सत्र में ही जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन बढाया गया था.

आतंकियों और अलगाववादियों पर कसा शिकंजा
दरअसल कश्मीर में केंद्र सरकार की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति कारगर साबित हुई है. सुरक्षा बलों ने चुन-चुन कर आतंकी सरगनाओं को ठिकाने लगाया है. सीमा पर भी सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने आतंकियों का आना कम किया है. कश्मीर घाटी में उनके शुभचिंतकों पर भी शिकंजा कसा गया है. हुरियत के नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई है और विदेशों में रहने वाले उनके अपने बच्चों की पूरी लिस्ट जनता के सामने लाकर ये साबित किया है कि अलगाववादी नेता सिर्फ कश्मीर के युवाओं को भड़का रहे है. उन्हें कश्मीर के युवाओं की चिंता नहीं बल्कि अपने बच्चों का खयाल ज्यादा है तभी तो वो उन्हें विदेश भेजकर कश्मीर के युवाओं को भड़का रहे हैं ताकि वो मुख्यधारा में आ ही न सकें. कश्मीर में अलगाववादी नेताओं के घर आयकर और ईडी के छापों ने भी साफ कर दिया है कि राज्य में चला आ रहा भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह


आलम ये है कि आम तौर पर हर गृह मंत्री के कश्मीर दौरे पर बंद का आह्वान करने वाले अलगाववादी इस बार अमित शाह के घाटी दौरे पर खामोश रहे. न ही कोई बंद का कॉल आया और न ही कोई हिंसा हुई. इसलिए आलाकमान ने साफ कर दिया है कि आयरन हैंड से आतंकियों को सबक सिखाने का काम जारी रहेगा. दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने राज्य के मौजुदा नेतृत्व पर भी सवालिया निशान खड़े करना शुरू किया है. ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है कि राज्य में अब तक सत्ता चलाने वाली पार्टियों को सिर्फ अपने परिवार और भ्रष्टाचार से मतलब रहा है. इन तमाम कदमों का असर ये हुआ है कि पत्थरबाजी की घटनाएं धीरे कम से कम होती जा रहीं हैं.

अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान
सरकारी सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान पिछले कुछ महीनों से आतंकियों को भेजने से लेकर कश्मीर के स्थानीय आतंकियों को मदद पहुंचाने से कतरा रहा है. इसका कारण है अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उनका अलग थलग पड़ना. एक ओर उसे आतंकी मसूद अजहर को गिरफ्तार करना पड़ा है तो दूसरी ओर प्रतिबंधों को डर से इस बात से भी इंकार करना पड़ रहा है कि वो आतंकियों को बढ़ावा दे रहा है. पाकिस्तान को इस बात की भी चिंता है कि कहीं अमेरिका उन्हें अफगानिस्तान को लेकर चल रही बातचीत से अलग न कर दे. इसलिए आतंक को पनाह देने वाला देश फिलहाल नहीं बनना चाह रहा. और सबसे महत्वपूर्ण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. तभी तो पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ भी फिलहाल नहीं के बराबर ही चल रही है. हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प के मध्यस्थता वाले बयान ने खलबली मचायी तो जरूर लेकिन अमेरिका पीछे हट गया. इसलिए केंद्र सरकार के पास भी घाटी को देश की मुख्यधारा मे लाने का मौका मिला है जिसमें वो पीछे नहीं रहना चाहता.
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राज्य में नए नेतृत्व को आगे लाने की कोशिश
कश्मीर घाटी में तमाम बंद, हिंसा और बहिष्कार के कॉल के बावजूद जब स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न हुए तो साफ था कि केंद्र का मकसद सिर्फ गांव के स्तर तक लोगों को विकास की ताकत देने से ज्यादा नए नेतृत्व को आगे लाना भी था. आला सूत्र बताते हैं कि राज्य के मौजूदा नेतृत्व के कारण जिले और कस्बे और गांव के स्तर पर नेतृत्व आगे नही आ रहा था. कश्मीर की पार्टियों में परिवारवाद को ही बढ़ावा मिल रहा था. सूत्र मानते हैं तमाम अड़चनों के बावजूद स्थानीय निकायों के चुनावों ने जमीनी स्तर पर नेताओं को खड़ा कर दिया है. इसका फायदा आने वाले चुनावों में होगा.

भारतीय सेना (प्रतीकात्मक फोटो)


युवाओं को मुख्यधारा में जोड़ने की केंद्र सरकार की कवायद
केंद्र सरकार ने अपनी योजनाओं में कश्मीर के युवाओं को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. कश्मीर के युवाओं को देश भर के विश्वविद्यालयों में दाखिले की सुविधा मिल रही है, उनके लिए छात्रवृत्ति योजनाएं शुरु की गई हैं, कश्मीर के युवा अब आइएएस की परीक्षाओं में अव्वल आने लगे है. कश्मीर का युवा अब राष्ट्रीय़ स्तर पर खेल कूद में भाग लेने लगा है. कश्मीर में भी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं का आयोजन होने लगा है. संदेश साफ है कि हिंसा की राजनीति से निकल कर युवा देश की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है.

बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक
मंगलवार यानी जुलाई 30 को होने वाली बीजेपी की कश्मीर के कोर ग्रुप की बैठक में आखिर क्या संदेश छिपा है. संदेश यही है कि अब कश्मीर में चुनावी प्रक्रिया शुरु होने वाली है. बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा इस बैठक में रहेंगे जिसमें पार्टी के कश्मीर के नेता भी शामिल होंगे. संकेत ये भी हैं कि बीजेपी के दूसरे शीर्ष नेता भी इस बैठक में शामिल हो सकते हैं. कश्मीर में ज्यादा सुरक्षा बल भेजा जाना, घाटी में हिंसा और बंद जैसे कारनामों पर लगाम लगना, अलगाववादियों का मनोबल टूटना जैसे अनेक मुद्दे हैं जिसके कारण बीजेपी आलाकमान को जल्दी ही चुनाव कराने का मन बना रहा है. चुनाव आयोग पहले ही कह चुका है कि वो चुनाव कराने को तैयार है इसलिए इस बैठक में बीजेपी अपनी तैयारियों को लेकर माथापच्ची करेगी.

पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह


सूत्र बताते हैं इस बार बीजेपी की कोशिश जम्मू-कश्मीर में अपने दम पर सरकार बनाने की है. कुल 87 सीटों में 46 कश्मीर घाटी में हैं, 37 जम्मू इलाके में और 4 विधानसभा सीटें लद्दाख में हैं. यानी जो भी पार्टी कश्मीर घाटी में आगे रही इसकी सरकार अब तक बनती आई है. बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनावों मे इस परंपरा को तोड़ा था जब 25 सीटें लाकर उन्होंने पीडीपी के साथ सरकार बनाई थी. ये बात और है कि तनातनी के कारण ये सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी. जम्मू की इन्ही 37 सीटों पर बीजेपी की नजर है. सूत्रों के मुताबिक अभी की लहर में अगर 30 से ज्यादा सीटें निकल जाती हैं तो कश्मीर में कुछ छोटे सहयोगी दलों और निर्दलियों की सहायता से बीजेपी की सरकार बन सकती है. और राज्य में बीजेपी का मुख्यमंत्री देने का सपना भी पूरा हो सकता है. इसलिए बीजेपी आलाकमान की तैयारी है पूरी ताकत झोंकने की.

जहां तक ऑर्टिकल 35ए और 370 हटाने का सवाल है, फिलहाल केंद्र सरकार ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. सूत्र बताते हैं कि भेदभाव करने वाली 35ए को लेकर केंद्र सरकार के पास तैयारी पूरी है लेकिन तलाश है सही मौके की. फिलहाल 370 को लेकर बहुत ज्यादा माथापच्ची नहीं चल रही है लेकिन संघ और बीजेपी की विचारधारा से जुड़े भावनानात्मक मुद्दे तो ये हैं ही. कुल मिला कर संदेश यही है कि शांति की तरफ बढ़ते माहौल में अगर चुनी हुई सरकार कश्मीर में सत्ता में रहती है तो कश्मीर के साथ-साथ दुनिया भर में संदेश जाएगा ही कि कश्मीर भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही एक अभिन्न हिस्सा है.

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First published: July 29, 2019, 4:37 PM IST
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