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कश्मीर में लगातार 58वें दिन बाजार बंद रहे, सड़कों से सार्वजनिक वाहन रहे नदारद

कश्मीर में लगातार 58वें दिन बाजार बंद रहे, सड़कों से सार्वजनिक वाहन रहे नदारद

जम्‍मू कश्‍मीर के अधिकारियों ने बताया कि हंदवाड़ा और कुपवाड़ा को छोड़कर कश्‍मीर में मोबाइल सेवाएं निलंबित हैं.

जम्‍मू कश्‍मीर के अधिकारियों ने बताया कि हंदवाड़ा और कुपवाड़ा को छोड़कर कश्‍मीर में मोबाइल सेवाएं निलंबित हैं.

जम्‍मू कश्‍मीर (Jammu Kashmir) में बाजार बंद चल रहे हैं और सार्वजनिक वाहन अभी भी सड़कों पर नहीं दिख रहे हैं. मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं (Mobile And Internet Services) अभी भी निलंबित चल रही हैं.

    श्रीनगर. जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) में अनुच्छेद-370 (Article-370) के अधिकतर प्रावधान निरस्त किए जाने के बाद सोमवार को लगातार 58वें दिन भी बाजार बंद रहने और सार्वजनिक वाहनों के सड़कों से नदारद रहने से घाटी में जनजीवन प्रभावित रहा. इस बीच अधिकारियों ने कहा कि हंदवाड़ा और कुपवाड़ा (Handwara, Kupwara) इलाकों को छोड़ कर कश्मीर (Kashmir) में मोबाइल सेवाएं हर जगह निलंबित हैं. घाटी में चार अगस्त की रात से ही सभी इंटरनेट सेवाएं बंद हैं.

    अधिकारियों ने बताया कि हालात के आकलन के बाद उचित समय पर सेवाओं को बहाल करने का फैसला लिया जाएगा. उन्होंने बताया कि मंगलवार को 58वें दिन भी घाटी में मुख्य बाजार और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे और सार्वजनिक वाहन भी सड़कों से नदारद रहे. शहर के कुछ इलाकों में कुछ निजी कारें और कुछ अंतर-जिला कैब और ऑटो रिक्शा नजर आए.

    अधिकारियों ने बताया कि घाटी में कहीं भी किसी तरह के प्रतिबंध नहीं हैं. कानून व्यवस्था को कायम रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है. केन्द्र सरकार के पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने के बाद से ही कश्मीर के स्कूलों में कक्षाएं प्रभावित हैं.

    अधिकारी ने बताया कि स्कूलों के सामान्य संचालन के राज्य सरकार के प्रयास अभी तक रंग नहीं लाए हैं क्योंकि माता-पिता अब भी सुरक्षा कारणों से बच्चों को घर से बाहर भेजने को तैयार नहीं हैं. पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत मुख्य धारा के नेता अब भी नजरबंद या हिरासत में हैं.

    सुप्रीम कोर्ट आर्टिकल-370 पर 14 नवंबर से करेगा सुनवाई
    सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद-370 के अधिकतर प्रावधान खत्म करने के केन्द्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 14 नवंबर से सुनवाई की जायेगी.

    पीठ ने याचिकाकर्ताओं का यह अनुरोध ठुकरा दिया कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को जवाब दाखिल करने के लिये दो सप्ताह से अधिक समय नहीं दिया जाये.


    न्यायमूर्ति एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अनुच्छेद-370 के अधिकतर प्रावधान समाप्त करने के फैसले संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को अपना जवाब दाखिल करने के लिये चार सप्ताह का वक्त दिया.

    पीठ ने याचिकाकर्ताओं का यह अनुरोध ठुकरा दिया कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को जवाब दाखिल करने के लिये दो सप्ताह से अधिक समय नहीं दिया जाये. पीठ ने कहा कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को इन याचिकाओं पर अपने हलफनामे दाखिल करने के लिये 'समुचित समय देना होगा क्योंकि यह जरूरी है कि सुनवाई शुरू होने से पहले सारी औपचारिकतायें पूरी की जायें.

    पीठ न कहा- केंद्र और प्रशासन को जबाव के लिए देनी होगी अनुमति
    पीठ ने कहा कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल होने के बाद याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर इनका जवाब देना होगा. शीर्ष अदालत ने कहा, 'हमें केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति देनी होगी. अन्यथा हम इस मामले का फैसला नहीं कर सकते हैं.'

    पीठ ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान समाप्त करने के मामले में अब और कोई नयी याचिका दायर करने पर भी रोक लगा दी. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत शामिल हैं. पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों से कहा, 'हमने उन्हें (केन्द्र और जम्मू-कश्मीर) को जवाब दाखिल करने के लिये समुचित वक्त दिया है.'

    पीठ का कहना है कि अनुच्‍छेद 370 पर 30 अक्‍टूबर तक फैसला सुनाना मुश्किल है.


    31 अक्‍टूबर से पहले फैसला सुनाना मुश्किल
    याचिकाकर्ताओं के वकील केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल द्वारा जवाब दाखिल करने के लिये चार सप्ताह का समय देने के अनुरोध का विरोध कर रहे थे. पीठ ने कहा कि यह सोचना ही अनुचित होगा कि 31 अक्टूबर से पहले कोई फैसला या आदेश दिया जायेगा.

    याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कहा कि नए कानून के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य 31 अक्टूबर को दो केन्द्र शासित राज्यों में तब्दील हो जाएगा और इसलिए इन याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई करने तथा इस दौरान यथास्थिति बनाये रखने का आदेश देने की आवश्यकता है.

    केन्द्र की ओर से वेणुगोपाल और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इन 10 याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिये उन्हें चार सप्ताह का वक्त चाहिए क्योंकि प्रत्येक याचिका में अलग अलग दलीलें दी गयी हैं.

    एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने जब वेणुगोपाल और मेहता के कथन पर आपत्ति की तो पीठ ने कहा, 'इस तरह के मामले में हम जवाबी हलफनामे के बगैर कैसे आगे बढ़ सकते हैं?'

    कोर्ट का कहना है कि सरकार और जम्‍मू कश्‍मीर प्रशासन को 28 अगस्‍त तक जवाब दाखिल करना चाहिए था.


    पीठ ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर को 28 अगस्त की सुनवाई के आलोक में अपने जवाब दाखिल करने चाहिए थे. पीठ ने कहा, 'हमें सरकार को जवाब दाखिल करने की अनुमति देनी ही होगी.'

    कोर्ट ने कहा- जवाबी हलफनामे के बगैर नहीं बढ़ेंगे आगे
    याचिकाकर्ताओं के वकील ने जब इस बात पर जोर दिया कि केन्द्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के पास जवाब दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय था, तो पीठ ने कहा इन मामलों में जवाबी हलफनामे के बगैर हम आगे नहीं बढ़ सकेंगे. पीठ ने केन्द्र और जम्मू-कश्मीर के जवाब का इंतजार करने पर जोर देते हुये कहा, 'अगर याचिका स्वीकार हो गयी, तो क्या हम पहले की स्थिति बहाल नहीं कर सकते?'

    इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को खत्म करने के पांच अगस्त के केन्द्र के फैसले से पहले ही दायर की गयी याचिकाओं का मुद्दा उठा. कुछ याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने तो अनुच्छेद-370 के प्रावधानों और अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिकता को पहले ही चुनौती दे रखी है.

    पीठ ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) सूर्य प्रताप सिंह को बुलाया और इस विषय पर लंबित याचिकाओं की जानकारी प्राप्त करके न्यायालय को सूचित करने का निर्देश दिया. इस मामले में जब कुछ वकीलों ने हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगी तो पीठ ने कहा, 'अगर हर कोई याचिका दायर करना चाहेगा तो यहां एक लाख याचिकाएं हो जाएंगी. इससे तो काम नहीं चलेगा. कृपया ऐसा नहीं करें. यह अनावश्यक रूप से मामले में विलंब ही पैदा करेगा.'

    पीठ ने केन्द्र के फैसले के एक दिन बाद ही शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा को भी आड़े हाथ लिया और कहा कि उनकी याचिका में कोई भी आधार या ठोस तथ्य नहीं हैं. पीठ ने शर्मा से कहा, 'आपने सबसे पहले आने वाला खेल खेला है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको पहले सुना जायेगा. निश्चित ही आपकी याचिका में कुछ भी नहीं है और केन्द्र का फैसला होने के 72 घंटे के भीतर ही आप न्यायालय आ गये तो इसका मतलब यह नहीं है कि हमें पहले आपको सुनना होगा.'

    Tags: Article 370, Jammu kashmir, Kashmir

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