बीजेपी क्यों चाह रही है जम्मू-कश्मीर का फिर से ‘बंटवारा’ ?

जम्मू कश्मीर में आखिरी बार 1995 में परिसीमन हुआ था. उसके बाद वहां की स्थितियां बदली हैं लेकिन निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण नहीं हुआ है. इसका खामियाजा जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को उठाना पड़ रहा है. बीजेपी अब इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है.

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: June 18, 2019, 4:28 PM IST
बीजेपी क्यों चाह रही है जम्मू-कश्मीर का फिर से ‘बंटवारा’ ?
जम्मू कश्मीर में आखिरी बार 1995 में परिसीमन हुआ था. उसके बाद वहां की स्थितियां बदली हैं लेकिन निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण नहीं हुआ है. इसका खामियाजा जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को उठाना पड़ रहा है. बीजेपी अब इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है.
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: June 18, 2019, 4:28 PM IST
जम्मू-कश्मीर बीजेपी ने एक बार फिर राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की अपनी मांग दोहराई है. पार्टी की वर्किंग कमिटी के 6 संकल्पों में राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे परिसीमन का संकल्प भी है. इसके पहले अमित शाह के गृहमंत्री का पद संभालते ही जम्मू कश्मीर के फिर से बंटवारे यानी इसके निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव के लिए परिसीमन आयोग के गठन की चर्चा चल पड़ी थी. अमित शाह की जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से मुलाकात के बाद इस चर्चा को बल मिला था. हालांकि चर्चा शुरू होते ही नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसे राज्य के प्रमुख सियासी धड़ों ने विरोधी तेवर अपना लिए थे. ऐसा कुछ होने की स्थिति में जनआंदोलन के चेतावनी दी जाने लगी. बीजेपी ने एक बार फिर परिसीमन के मुद्दे को उठाकर ये जता दिया है कि जम्मू कश्मीर के इस पेचीदे मसले को वो इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली है.

जम्मू कश्मीर की कुछ विसंगतियों को दूर करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन मददगार साबित हो सकता है. पैंथर्स पार्टी जैसे दल लंबे वक्त से इसकी मांग भी कर रहे हैं. इससे जम्मू और लद्दाख के लोगों का भला होगा. कश्मीर घाटी के अलावा जम्मू और लद्दाख के विकास में तेजी आएगी. लेकिन परिसीमन आयोग के गठन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आम राय बनाना बहुत मुश्किल है. क्योंकि इसमें राजनीतिक नफा-नुकसान का मामला भी जुड़ा है. परिसीमन आयोग के गठन की राह में कैसी चुनौतियां सामने आ रही हैं, उसके पहले ये जान लेते हैं कि वर्तमान हालात में इसकी जरूरत क्यों महसूस की जा रही है.

क्यों जरूरी है जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग का गठन ?

जम्मू कश्मीर में आखिरी बार 1995 में परिसीमन हुआ था. उसके बाद वहां की स्थितियां बदली हैं लेकिन निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण नहीं हुआ है. मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की स्थिति की वजह से राज्य के तीन संभागों (कश्मीर, जम्मू और लद्दाख) में कश्मीर को राजनीतिक वर्चस्व हासिल है. सत्ता में हिस्सेदारी से लेकर संसाधनों पर हक और आर्थिक सहायता प्राप्त करने में कश्मीर (घाटी) बाजी मार ले जाता है. इसके मुकाबले बड़े क्षेत्रफल और ज्यादा आबादी वाले जम्मू और लद्दाख लगातार पिछड़ते जा रहे हैं. जानकार मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर के तीनों इलाकों में बराबरी तभी मुमकिन है, जब नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण हो.

जम्मू कश्मीर की 87 विधानसभा सीटों में कश्मीर के अंतर्गत 46 सीटें आती हैं. जम्मू के दायरे में 37 सीटें और लद्दाख के अंतर्गत 4 सीटें आती हैं. कश्मीर में ज्यादा विधानसभा सीटों की वजह से विधानसभा में इनका वर्चस्व होता है. सत्ता में हिस्सेदारी भी कश्मीर की अधिक है. राज्य सरकार नीतियां बनाने में कश्मीर पर ज्यादा फोकस रखती हैं. पावर डिस्ट्रीब्यूशन में गैरबराबरी की वजह से जम्मू और लद्दाख की जनता अपनी अनदेखी की शिकायत करती है. पैंथर्स पार्टी 2005 से इस मसले को उठा रही है. इसी गैरबराबरी को खत्म करने के लिए जम्मू में 10 से लेकर 15 विधानसभा सीटें बढ़ाए जाने की मांग उठ रही है.



जम्मू की बड़ी हिस्सेदारी लेकिन नहीं मिलता बराबरी का दर्जा
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क्षेत्रफल के लिहाज से देखें तो जम्मू का एरिया 26,293 स्कॉयर किलोमीटर का है. जबकि कश्मीर का एरिया 15,948 स्कॉयर किलोमीटर और लद्दाख कहीं ज्यादा बड़ा 59,000 स्कॉयर किलोमीटर है. जम्मू की 37 विधानसभा सीटों का हिसाब लगाएं तो हर विधानसभा सीट का एवरेज एरिया 710 स्कॉयर किलोमीटर का आता है. जबकि इसी तरह से कश्मीर का हिसाब लगाएं तो यहां की हर विधानसभा सीट का एवरेज एरिया सिर्फ 346 स्कॉयर किलोमीटर का है. यानी एवरेज एरिया के हिसाब से जम्मू और कश्मीर के विधानसभा सीटों का अंतर करीब दोगुने का है. क्षेत्रफल के लिहाज से जम्मू की विधानसभा सीटें कश्मीर की सीटों की तुलना में दोगुनी बड़ी हैं.

वोटर्स के लिहाज से भी जम्मू की विधानसभा सीटें कश्मीर घाटी की तुलना में बड़ी हैं. जम्मू में गांधी नगर सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र है, जिसकी आबादी 1लाख 68हजार 643 है. वहीं कश्मीर का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र बटमालू है, जहां की आबादी 1लाख 20हजार 339 है. यानी जम्मू के सबसे बड़े निर्वाचन क्षेत्र की आबादी कश्मीर के सबसे बड़े निर्वाचन क्षेत्र की तुलना में 48,304 ज्यादा है. घाटी में कम क्षेत्रफल और कम आबादी के बावजूद वहां सीटों की संख्या ज्यादा है. जबकि जम्मू के निर्वाचन क्षेत्र बड़े और ज्यादा आबादी वाले हैं लेकिन फिर भी सीटें कम रखी गई हैं. इसी गैरबराबरी की वजह से घाटी के सामने जम्मू कहीं ठहर नहीं पाता. राज्य के नीति निर्धारण से लेकर संसाधनों के बंटवारे तक में जम्मू को छोटे टुकड़े से संतोष करना पड़ता है. जबकि कश्मीर बड़ा हिस्सा छीन लेता है.

जम्मू और श्रीनगर में भी जमीन आसमान का अंतर

इसी तरह से जम्मू और श्रीनगर जिलों की तुलना भी की जा सकती है. सर्दियों के दिनों में जम्मू और गर्मियों के दिनों में श्रीनगर राज्य की राजधानी होती है. दोनों जिले अपने-अपने संभाग में सबसे ज्यादा विकसित हैं. लेकिन श्रीनगर संसाधनों और आर्थिक सहायता का बड़ा हिस्सा हजम कर जाता है. जम्मू यहां भी पिछड़ा है.

जम्मू जिले में कुल 10लाख 10हजार 959 वोटर्स हैं. यहां की 11 विधानसभा सीटें 2,336 स्कॉयर किलोमीटर क्षेत्र में फैली है. इन आंकड़ों से हिसाब लगाएं तो हर विधानसभा सीट में एवरेज 91,905 वोटर्स (10,10959/11= 91,905) हैं, जिनके हिस्से में करीब 212 स्कॉयर किलोमीटर (2,336/11= 212.36) का इलाका आता है.

वहीं 8 विधानसभा सीटों वाले श्रीनगर जिले की कुल आबादी 6लाख 25हजार 801 है, जो 294 स्कॉयर किलोमीटर में फैली हैं. इस लिहाज से यहां हर सीट पर एवरेज 78,225 लोगों (जम्मू से कम) की आबादी है, जिनके हिस्से सिर्फ 37 स्कॉयर किलोमीटर (294/8= 36.75) का एरिया आता है. जम्मू जिले में आने वाली विधानसभा सीटों का एवरेज साइज जहां 212 स्कॉयर किलोमीटर है, वहीं कश्मीर का सिर्फ 37 स्कॉयर किलोमीटर. यानी जम्मू की विधानसभा सीटें कश्मीर की तुलना में करीब-करीब छह गुना बड़ी हैं. एवरेज वोटर्स की तुलना करने पर श्रीनगर की तुलना में जम्मू में 13,680 (91,905-78,225) अतिरिक्त वोटर्स हैं.

जम्‍मू लोकसभा सीट पर 11 अप्रैल को पहले चरण में मतदान हुआ है.
फाइल फोटो


अब सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा परिसीमन क्यों किया गया है कि जम्मू की हर विधानसभा सीट क्षेत्र और आबादी के लिहाज से कश्मीर से बड़ा है. निर्वाचन क्षेत्रों में इन्हीं गड़बड़ियों की वजह से घाटी को जम्मू की तुलना में हमेशा तरजीह मिलती है. इसी को ठीक करने की मांग उठती रही है. अगर इस अंतर को पाट दिया गया तो राज्य सरकार को जम्मू और लद्दाख के लोगों की आवाज भी उतनी ही गंभीरता से सुननी पड़ेगी. हालांकि इसका फायदा जम्मू और लद्दाख में असर रखने वाली बीजेपी और पैंथर्स पार्टी जैसे दलों को भी होगा. इसलिए पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दलों के साथ घाटी के साथ हमदर्दी रखने वाले लोग परिसीमन का विरोध कर रहे हैं.

फिर से ‘बंटवारे’ में क्यों हो रही है दिक्कत ?

अगर परिसीमन हुआ तो घाटी का महत्व कम होगा. अलगाववादी ताकतें इसे सांप्रदायिक रंग देकर व्यापक तौर पर जनआंदोलन छेड़ सकते हैं. जम्मू बनाम कश्मीर की लड़ाई भीषण शक्ल अख्तियार कर सकती है. घाटी के माहौल को बिगाड़ना ज्यादा मुश्किल नहीं है. पहले से ही बिगड़े माहौल में आग लगने की डर की वजह से सरकार के लिए ऐसा कदम उठाना आसान नहीं है.

इससे जम्मू कश्मीर की सियासत भी प्रभावित होगी. जम्मू कश्मीर के संविधान के मुताबिक राज्य में हर 10 साल में परिसीमन होना था. लेकिन 2002 में तत्कालीन सीएम फारुक अब्दुल्ला ने एक बिल लाकर 2026 तक के लिए इस पर रोक लगा दी थी. देश के दूसरे हिस्सों में 2002 की जनगणना के हिसाब से परिसीमन हो चुका है. लेकिन जम्मू कश्मीर में इसे लागू नहीं किया जा सकता.

राज्य के कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि केंद्र सरकार ने सिर्फ विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ये शिगूफा छोड़ा है. उनका कहना है कि 2026 तक के लिए परिसीमन पर रोक वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस के बिल का बीजेपी ने समर्थन किया था. अब वो परिसीमन का हवा बनाकर फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.
( आंकड़े फ़र्स्टपोस्ट से लिए गए हैं )

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First published: June 18, 2019, 4:28 PM IST
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