जम्मू-कश्मीर: मनोज सिन्हा का काम तलवार की धार पर धावनो है

मनोज सिन्हा. (फाइल फोटो)
मनोज सिन्हा. (फाइल फोटो)

अनुच्छेद 370 व 35ए हटने के बाद जम्मू कश्मीर में कई अच्छे काम किए गए. 370 की आड़ में सरकारी भर्ती व आरक्षण नीतियों में चल रहे मनमानेपन को खत्म करने और 73वें व 74वें संविधान संशोधनों को राज्य में लागू कर पंचायत स्तर तक लोकतांत्रिक सशक्तिकरण महत्वपूर्ण कदम हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 7, 2020, 2:41 PM IST
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उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता मनोज सिन्हा (L-G Manoj Sinha) की जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल (Lieutenant Governor) के रूप में नियुक्ति से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार वहां राजनीतिक प्रक्रिया की शुरू करने की जरूरत शिद्दत से महसूस कर रही है. मनोज सिन्हा भाजपा और खासकर, उत्तर प्रदेश के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जिनके पार्टी लाइन से ऊपर सब तरह के लोगों से मधुर संबंध हैं. ‘राजनीति अपनी जगह, संबंध अपनी जगह’  वाली इसी खूबी ने मनोज सिन्हा को हाशिए से उठाकर लाइम लाइट में ला दिया है.

जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) इस समय जिस मोड़ पर खड़ा है, उसमें विश्वसनीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की चुनौती देश के सामने है. विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि एक साल से कश्मीर घाटी में और कुछ हद तक जम्मू संभाग में पहले जैसे हालात नहीं हैं. इसी कारण क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों खामोश हैं. रावी के इस तरफ, हम सब लोग समझते हैं कि कश्मीर घाटी में सब सामान्य हो चला है. लेकिन शायद ऐसा नहीं है. माहौल सामान्य होने में कुछ वक्त लग सकता है और नए एलजी से उम्मीद की जा सकती है कि वे लोगों का विश्वास जीतकर यह काम आसानी से कर लेंगे. हालांकि कई और पक्ष भी हैं. पिछले 30 साल के दौरान कश्मीर अपना आक्रोश जिस तरह से व्यक्त करता रहा है, पिछले एक साल में वैसा कुछ भी नहीं हुआ. न बंदी, न हड़ताल, न जुलूस. यह सकारात्मक संकेत हैं.

पिछले 72 साल के दौरान केंद्र सरकारों ने विलय के समय जम्मू-कश्मीर को मिली संवैधानिक स्वायत्तता को डायल्यूट करने का ही काम किया. पिछले साल तो स्वायत्तता को जड़ से ही खत्म कर दिया गया और साथ 35ए का कवच भी. लेकिन यह भी तथ्य है कि शुरुआती तीन-चार साल छोड़ दें तो जम्मू-कश्मीर में किसी भी सरकार ने अपने लोगों की बेहतरी का काम नहीं किया, बल्कि शासक वर्ग ने स्वायत्तता के जुमले का इस्तेमाल केंद्र के दोहन और राज्य में अपनी मनमानी के लिए किया.



अनुच्छेद 370 व 35ए हटने के बाद वहां कई अच्छे काम किए गए. 370 की आड़ में सरकारी भर्ती व आरक्षण नीतियों में चल रहे मनमानेपन को खत्म करने, रणवीर पीनल कोड को खत्म कर आईपीसी को लागू करने और 73वें व 74वें संविधान संशोधनों को राज्य में लागू कर पंचायत स्तर तक लोकतांत्रिक सशक्तिकरण बहुत भी महत्वपूर्ण कदम माने जाने चाहिए. अब जरूरत लोगों के बीच विश्वास बहाली और राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की है. अब यह काम विधानसभा चुनाव के जरिए होगा. इससे पहले विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्परिसीमन किया जाना है.
नए एलजी मनोज सिन्हा के पास स्पेस है केंद्र शासित राज्य से पूर्ण राज्य के दर्जे के बीच का, जिसका इस्तेमाल उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली में अपनी जमीन के तौर पर करना होगा. परिसीमन प्रक्रिया को विश्वास बहाली की प्रक्रिया के रूप में इस्तेमाल करने की छूट के लिए केंद्र को राजी करना होगा. मनोज सिन्हा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है. यह चुनौती और ज्यादा कठिन हो जाती है जब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अविश्वास की दरार बढ़ाने के नैरेटिव को ही आगे बढ़ा रही हो. ऐसे में मनोज सिन्हा का काम तलवार की धार पर धावनो है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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