जसवंत सिंह: वाजपेयी के 'हनुमान', जिन्होंने कभी नहीं किया उदारवादी विचारों से समझौता

भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह वाजपेयी के खास सिपेसलहार थे. (फाइल फोटो)
भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह वाजपेयी के खास सिपेसलहार थे. (फाइल फोटो)

वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान जसवंत सिंह (Jaswant Singh) सरकार में काफी ऊंचा ओहदा रखते थे. उस दौरान वह कई ऐतिहासिक घटनाओं और उपलब्धियों के गवाह (Witness achievements) बने, जिनमें 1998 का परमाणु परीक्षण (Nuclear test) पोखरण-2, भारत-पाकिस्तान के बीच करगिल संघर्ष, 2001 में हुआ आगरा शिखर सम्मेलन और अमेरिका (America) के साथ परमाणु मुद्दों पर बातचीत शामिल है.

  • भाषा
  • Last Updated: September 27, 2020, 6:18 PM IST
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नई दिल्ली. सेना के अधिकारी से नेता बने, भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वसनीय सहयोगी थे. साथ ही उन्होंने अपने उदारवादी राजनीतिक विचारों से अपनी अलग पहचान बनाई. रविवार सुबह लंबी बीमारी के बाद दिल्ली में उनका निधन हो गया. मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले और उदारवादी मिजाज के लिए जाने जाने वाले 82 वर्षीय जसवंत ने अपने राजनीतिक जीवन में 1998 से 2004 के बीच वाजपेयी सरकार में केन्द्रीय मंत्रिमंडल के तीन सबसे प्रमुख रक्षा, विदेश और वित्त मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली.

हालांकि दिसंबर 1999 में इंडियन एअरलाइन्स के अपहृत विमान में सवार यात्रियों के छुड़ाने के लिए तीन खूंखार आतंकवादियों को सरकारी विमान से अफगानिस्तान के कंधार ले जाने से उनकी छवि को धक्का लगा. उस समय जसवंत सिंह विदेश मंत्री थे. इंडियन एअरलाइन्स के विमान (आईसी 814) में सवार 180 से अधिक यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को छुड़ाने के बदले भारत को जिन तीन आतंकवादियों को रिहा करना पड़ा, उनमें मौलाना मसूद अजहर भी शामिल था, जिसने बाद में जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया.

आठ दिन तक चले उस अपहरण संकट को खत्म करने के लिए जसवंत सिंह खुद आतंकवादियों को छोड़ने गए, तो विवाद खड़ा हो गया. इस घटना के लिए कई बार जसवंत सिंह का मजाक बना. अपहरण की घटना को 1998 में बनी भाजपा नीत राजग सरकार के कार्यकाल की नाकामियों में शुमार किया जाता है. आतंकवादियों ने अपहृत विमान के एक यात्री की हत्या भी कर दी थी.
ईमानदार नेता माने जाने वाले सिंह वाजपेयी के बेहद खासमखास थे. इस वजह से उन्हें वाजपेयी का ‘हनुमान’ भी कहा जाता था.
वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान जसवंत सिंह सरकार में काफी ऊंचा ओहदा रखते थे. उस दौरान वह कई ऐतिहासिक घटनाओं और उपलब्धियों के गवाह बने, जिनमें 1998 का परमाणु परीक्षण पोखरण-2, भारत-पाकिस्तान के बीच करगिल संघर्ष, भारत-पाकिस्तान के बीच 2001 में हुआ आगरा शिखर सम्मेलन और अमेरिका के साथ परमाणु मुद्दों पर बातचीत शामिल है. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व शुरू से ही जसवंत सिंह को पसंद करता था. फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करने के उनके हुनर का हर कोई कायल था. पार्टी के कई नेता ऐसा नहीं कर पाते थे.



भाजपा को 'मध्यम वर्ग' की पार्टी माना जाता था, जिसमें सिंह को खास मुकाम हासिल था. इसकी वजह उनकी शिक्षा और सैन्य पृष्ठभूमि मानी जाती थी. कम बोलने और गहरी समझ वाले सिंह उदारवारी मूल्यों के कट्टर समर्थक थे. शिष्टजनों में शुमार किए जाने वाले सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी देखे. मई 1996 में 13 दिन की वाजपेयी सरकार में वह वित्त मंत्री बने थे.

आम तौर पर गंभीर दिखने वाले सिंह कभी-कभी अपने मिजाज के विपरीत बात किया करते थे. जुलाई 2009 में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जब संसद में बजट पेश किया. तो सिंह ने उसपर चर्चा के दौरान कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को कर में दी गई छूट इतनी भी नहीं है कि, वह उससे विस्की की एक बोतल खरीद सकें. आरएसएस से ताल्लुक न रखने वाले जसवंत को दो बार भाजपा से निष्कासित किया गया. पहली बार उन्हें 2009 में जिन्ना की तारीफ करने पर पार्टी से निकाला गया. हालांकि 2010 में उन्हें फिर से पार्टी में शामिल कर लिया गया. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में राजनस्थान की बाड़मेर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उम्मीदवारी वापस लेने से मना करने पर एक बार फिर उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

सिंह ने आठ साल तक सेवाएं देने के बाद 1965 में सेना से सेवानिवृत्ति ले ली थी. जब उनसे सेना छोड़ने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वह राजनीति में जाना चाहते हैं. भाजपा को इसके गठन के समय से ही दक्षिणपंथी दल माना जाता है. पार्टी के कई तेज-तर्रार नेताओं के विपरीत सिंह हमेशा पार्टी के अंग्रेजी भाषी उदारवादी तथा प्रगतिशील मिजाज के नेता के तौर पर जाने जाते रहे. सिंह ने पार्टी को शहरी इलाकों में पैठ बनाने में भी मदद की.

हालांकि जसवंत सिंह को कभी जन नेता के तौर पर नहीं देखा गया. पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी वह बहुत लोकप्रिय नहीं रहे. माना जाता है कि, उन्हें सत्ता में ऊंचा मुकाम उनकी गहरी समझ के कारण हासिल हुआ. जसवंत सिंह 2012 में उपराष्ट्रपति पद के लिए राजग के उम्मीदवार थे, लेकिन उन्हें संप्रग उम्मीदवार हामिद अंसारी से हार का सामना करना पड़ा.
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