जाटलैंड की जंग: बीजेपी ने जाटों को 2014 में दिए थे 27 टिकट इस बार सिर्फ 17 नेताओं को मैदान में उतारा!

हरियाणा में बीजेपी सभी 90 सीटों पर लड़ रही है

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Haryana BJP Candidate List: जाटलैंड की सीटों नारनौद, गढ़ी सांपला-किलोई, बेरी और महम में कमल खिलाना बीजेपी के लिए चुनौती

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 1, 2019, 1:25 PM IST
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नई दिल्ली. बीजेपी (BJP) ने हरियाणा विधानसभा चुनाव (Haryana Assembly Election) के टिकट वितरण में नान जाट (Jat Candidate) प्रत्याशियों पर ज्यादा भरोसा जताया है. इस प्रदेश की सत्ता बनाने और बिगाड़ने में जाट समुदाय की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन इस बार पार्टी ने उन्हें पहले के मुकाबले कम टिकट दिया है. 2014 में हुए चुनाव में इस वर्ग को 27 टिकट दिए गए थे, लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन (Jat Reservation Agitation) के बाद पार्टी की धारणा थोड़ी बदल गई और इस बार अब तक वितरित 78 टिकटों में से सिर्फ 17 ही जाटों को दिए गए हैं. जाट संगठन यहां पर अपनी आबादी 25 फीसदी से अधिक बताते हैं. यहां हमेशा जाति की राजनीति होती रही है लेकिन देखना यह है कि इस बार ऐसी सियासत खत्म होती है या फिर बढ़ती है.

सियासी पंडितों का कहना है कि भले ही पिछले विधानसभा और बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इस वर्ग का खुलकर साथ न मिला हो, लेकिन वह इसकी अनदेखी भी नहीं कर सकती. इसीलिए उसे कुछ अहम पदों पर प्रतिनिधित्व देना पड़ा है. इस समय प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला (Subhash barala) जाट समाज से आते हैं. कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनखड़ को कैबिनेट मंत्री का पद मिला हुआ था. जाटों को ही साधने के लिए चुनाव का सह प्रभारी यूपी के जाट नेता भूपेंद्र चौधरी को बनाया गया है.

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हरियाणा बीजेपी के बड़े जाट नेता



जाट-गैर जाट राजनीति की प्रयोगशाला
हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं "2016 में हुए जाट आरक्षण आंदोलन के बाद से ही हरियाणा जाट बनाम नान जाट वाली पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला बन गया है. क्योंकि बिरादरियों के दिलों में खटास पैदा हो गई है. हालांकि, बीजेपी ने जाट वोटरों में भी सेंध लगाने की कोशिश नहीं छोड़ी है. इसलिए कई महत्वपूर्ण पद इस समाज के नेताओं को दिए गए हैं. फिर भी बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की ही बनी हुई है. क्योंकि जहां जाट ही सीएम बनते आ रहे थे वहां पर पार्टी ने पंजाबी समाज से आने वाले मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाया. इस बार भी फेस वही हैं. अब जाट समाज को पहले से कम टिकट देकर पार्टी अपनी गैर जाट वाली छवि को और मजबूत कर रही है. क्योंकि उसे गैर जाटों का भरपूर साथ मिला है."

हालांकि पार्टी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि जातिवाद, परिवार और क्षेत्रवाद की राजनीति की अब हरियाणा में जगह नहीं है. प्रदेश की जनता बीजेपी के साथ काम के आधार पर खड़ी है.

कांग्रेस ने लगाया जाट चेहरे पर दांव

धमीजा कहते हैं, "हरियाणा में अधिकांश समय जाटों का शासन रहा है. कांग्रेस में कई बड़े जाट लीडर थे और हैं. गैर जाट हमेशा हाशिए पर रहे हैं. चाहे वो नौकरी की बात हो या फिर सियासत की. इसलिए कांग्रेस के इस गढ़ में पैठ बनाने के लिए बीजेपी ने गैर जाट फार्मूले पर काम किया. इसका उसे काफी फायदा भी मिला. कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कमान देकर इस वोटबैंक को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है. रही बात जाटों की सबसे पुरानी पार्टी इनेलो की तो वो अब दो फाड़ हो चुकी है.

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कांग्रेस ने जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा को प्रदेश की कमान दी है (File Photo)

हरियाणा की जाट बहुल सीटें और बीजेपी की चुनौती 

रोहतक, सोनीपत, जींद, कैथल, सिरसा, झज्जर, फतेहाबाद और भिवानी जिले की विधानसभा सीटों पर जाटों का अच्छा प्रभाव है. 23 विधानसभा सीटों पर इनका प्रभाव है. बीते लोकसभा चुनाव में जाट बहुल कुछ विधानसभा सीटों पर बीजेपी की दाल नहीं गली थी.

इनमें एक सीट थी नारनौद. जो बीजेपी के जाट नेता एवं कैबिनेट मंत्री कैप्टन अभिमन्यु का विधानसभा क्षेत्र है. जबकि दूसरे जाट नेता और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश धनकड़ की सीट बादली में भी यही हाल था. इसी तरह गढ़ी सांपला-किलोई, बेरी और महम में भी बीजेपी पीछे रही थी. गढ़ी सांपला-किलोई विधानसभा से भूपेंद्र सिंह हुड्डा विधायक थे.  बेरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खासमखास रघुवीर सिंह कादयान की सीट है. वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं, "इससे ये जाहिर हो रहा है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी की आंधी के बावजूद उससे जाटलैंड में वोटर नहीं सधे थे.

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