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आंदोलन कर रहे जाट यूं ही पटरी से नहीं हटे, जानिए इसके पीछे की असली कहानी

Bhawani Singh | News18Hindi
Updated: June 25, 2017, 2:28 PM IST
आंदोलन कर रहे जाट यूं ही पटरी से नहीं हटे, जानिए इसके पीछे की असली कहानी
भरतपुर में हाईवे पर चक्काजाम किया हुआ है.

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राजस्थान में गुर्जर और हरियाणा में जाटों का आरक्षण आंदोलन खत्म हो चुका है. जाटों ने 48 घंटे बाद रेलवे ट्रैक और हाईवे पर लगा जाम हटा लिया, जिससे रेलवे विभाग के साथ-साथ राजस्थान सरकार ने भी राहत की सांस ली.

आखिर इतने जल्दी कैसे मान गए जाट
लेकिन आखिर जाटों ने जितनी जल्दी आंदोलन शुरू किया था उतनी ही जल्दी खत्म भी कैसे कर लिया. क्या सरकार की अपील और जनता की परेशानियों से आंदोलनकारी पिघल गए, या फिर उन्हें सुरक्षाबलों की सख्ती का डर था. आंदोलनकारियों के तेवर देखकर तो इतनी जल्दी उनके आंदोलन खत्म करने का अंदाजा तो कोई भी नहीं लगा सकता था. एक दिन पहले तक आंदोलनकारी रेलवे ट्रैक के बीचों-बीच खाट लगाकर नाश्ता कर रहे थे और किसी भी कीमत पर आंदोलन खत्म नहीं करने की चेतावनी भी दे रहे थे.


सरकार और आंदोलनकारियों के बीच दो बार बातचीत भी हुई. लेकिन दोनों बार बातचीत फेल रही. पर आखिरकार वो शनिवार को मान गए. लेकिन कैसे? दरअसल सरकार की ओर से उनके पास एक चिट्ठी आई थी कि ओबीसी कमीशन ने धौलपुर-भरतपुर के जाटों के आरक्षण को लेकर एक गोपनीय रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है. रिपोर्ट को कैबिनेट के सामने रखा जाएगा. इसके बाद आरक्षण पर फैसला किया जाएगा.

लेकिन इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है कि क्या सरकार ने आंदोलनकारियों के सामने गोपनीय रिपोर्ट उजागर की थी. या फिर क्या रिपोर्ट में धौलपुर-भरतपुर के जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने की सिफारिश की गई. जिससे आंदोलनकारी मान गए. हालांकि इस पर जाट और सरकार दोनों ही चुप हैं.

पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और
लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही कहती है. आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे भरतपुर के पूर्व महाराजा और कांग्रेस विधायक विश्वेंद्र सिंह ने आरक्षण की मांग को लेकर 22 तारीख को एक पंचायत बुलाई थी. पंचायत ने 23 तारीख को चक्काजाम का फैसला किया था. लेकिन विश्वेंद्र सिंह ने फिर दांव खेलते हुए 22 तारीख की शाम को ही ट्रैक जाम कर दिया. हैरानी की बात ये थी कि 22 तारीख की शाम को ही ओबीसी कमीशन के चैयरमैन ने मुख्यमंत्री को आरक्षण की रिपोर्ट सौंपी थी. अब सवाल ये कि क्या विश्वेंद्र सिंह को ये भनक थी कि रिपोर्ट में आरक्षण को लेकर सिफारिश की गई है या फिर सरकार धौलपुर-भरतपुर के जाटों को आरक्षण देने का ऐलान कर सकती है.ये भी हो सकता है कि जाटों का हिमायती बनने का क्रेडिट कांग्रेस से छीनने और खुद को जाटों का पैरोकार दिखाने के लिए आनन-फानन में आरक्षण की रिपोर्ट ओबीसी कमीशन के चैयरमैन से मुख्यमंत्री को पेश करवाई गई.

इसके अलावा इस इलाके में ही बीजेपी के जाट नेता दिगंबर सिंह भी काफी लोकप्रिय हैं. जिन्हें सरकार ने कैबिनेट मंत्री का ओहदा दे रखा है. विश्वेंद्र सिंह और दिगंबर सिंह में जाटों की लीडरशिप और वोट बैंक को लेकर तगड़ा मुकाबला है. इस मामले में जनता सियासी वर्चस्व और क्रेडिट लेने की लड़ाई में फंस गई. सरकार ने भी क्रेडिट कांग्रेस के खाते में जाने से रोकने के लिए आरक्षण का वादा नहीं किया. ऐसे में अगर जाटों को आरक्षण मिलता है तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही इसका क्रेडिट लेने की कोशिश करेंगी. और अगर ऐसा नहीं होता तो भी दोनों पार्टियां खुद को जाटों का हिमायती दिखाने की कोशिश जरूर करेंगी.

बता दें सुप्रीम कोर्ट धौलपुर और भरतपुर के जाटों का आरक्षण पहले ही खारिज कर चुका है. ऐसे में अगर जाटों को आरक्षण दे भी दिया जाता है तो कोर्ट में भी ये बरकरार रह पाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है.

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First published: June 25, 2017, 2:28 PM IST
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