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Nehru@130: बचपन का कातिल कौन!

News18Hindi
Updated: November 14, 2019, 5:05 PM IST
Nehru@130: बचपन का कातिल कौन!
देश में आज बाल दिवस के रूप में मनाया जा रहा है.

पं. जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) की आज 130वीं जयंती है, इस असवर पर देश के कई हिस्सों में बच्चों के डांस, कविता, भाषण, गाने, खेलकूद जैसे रंगारंग कार्यक्रम हो रहे हैं.

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  • Last Updated: November 14, 2019, 5:05 PM IST
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नई दिल्ली. आज देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) या चाचा नेहरू का जन्मदिन है. यह दिन पूरे देश में बाल दिवस (Children's Day) के रूप में मनाया जा रहा है. दिल्ली में तो आबोहवा में घुले जहरीले धुएं-धुंध ने स्कूल बंद करा दिए. बच्चे इस खास दिन स्कूल जा ही नहीं पाए. अलबत्ता देश भर में बच्चों के डांस, कविता, भाषण, गाने, खेलकूद जैसे रंगारंग कार्यक्रमों का दौर दिन भर चलने वाला है.

इस खास दिन की सरकारी रस्म अदायगी और खास समापन कर घर लौट आएंगे. अगले दिन फिर पुराने ढर्रे पर वापसी? वही सिलेबस, भारी बस्ते का मासूम कंधों पर बोझ, मां-बाप के सपनों की ताबीर, हमेशा अव्वल रहने का बोझ लादे ये बच्चे अपने बचपन से बहुत दूर एक बिना जिंदगी वाली दौड़ में शामिल दिखेंगे? होना तो कुछ यूं चाहिए था कि बचपन की इस खूबसूरत अवस्था में बच्चों की आंखों में उनके खुद के देखे हुए सपने होते, उनकी कल्पनाशीलता होती, उनका अपना जीवन संगीत होता, अपनी एक शैली होती, अपने बनाए दोस्त होते, अपनी ही एक दुनिया होती. एक ऐसी दुनिया, जहां वो अपनी मर्जी से खेलते-खाते, पढ़ाई करते और दुनिया को और खूबसूरत बनाने के अपने तरीके निकालते, लेकिन उनकी जिंदगी से ये सब गायब है.

खास बात यह है कि बचपन को सहेजने, संवारने और उन्हें ख्वाबों के उड़न खटोले पर बैठाकर आसमान की बुलंदियों की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही बचपन के कातिल बन बैठे हैं और बचपन गायब करने के अपराध में शामिल हैं? फिर चाहे वो माता-पिता हों, शिक्षक हों, बस्ते का बोझ यानी हमारी शिक्षा व्यवस्था हो, या हमारी लचर राजनैतिक व्यवस्था, जहां बच्चों की ज्यादा फिक्र ही नहीं है. बच्चे उसके एजेंडे में शामिल ही नहीं हैं.

एक तरफ स्कूल मैनेजमेंट अपने फायदे को देख नन्हें कंधों पर बस्ते का बोझ बढ़ा रहे हैं. वहीं बच्चों को जल्द से जल्द गाना, डांस, ड्राइंग, तैराकी... सब कुछ सिखा देने की और सब कुछ पा लेने की अभिभावकों की ख्वाहिश बच्चों के रचनात्मक मस्तिष्क पर दबाव डाल रही है. मां-बाप बच्चे को खड़ा होने, चलना सिखाने की उम्र में उसे स्कूल में बैठना, सिखाना पसंद करने लगे हैं. हम आत्मकेन्द्रित लोग अपने बच्चों के दोस्त भी चुनने का अधिकार अपने पास रखने लगे हैं. हम बड़े दूसरे बच्चे का स्तर देखते और तय करते हैं. अपने बच्चे को दुनिया के अथाह समंदर में डुबकी लगाने देने की जगह हम किनारे पर खड़े रहकर बिना भीगे पानी का आनंद लेने को कह रहे हैं. एक कमरे में सुविधाएं उपलब्ध कराने के फेर में हमारे जिस समय पर बच्चे का अधिकार था, उससे भी उसे वंचित कर रहे हैं? हमें केवल मैरिट में आने वाला बच्चा ही चाहिए.

बच्चों के साथ नेहरू


हम मोबाइल, गाड़ी उसके हाथों में थमाकर अपना आर्थिक स्तर प्रदर्शित करने की होड़ में उसका बचपन छीन रहे हैं.

ना सुनना भी आना चाहिए, लेकिन हम अपने बच्चों को ना सुनने ही नहीं देना चाहते?  तब जब सब हम उसकी मर्जी का कर रहे है, सब कुछ सहज उपलब्ध करा रहे हैं, तब हम कुछ पाने के लिए उसके द्वारा किए जाने वाले प्रयासों को खत्म कर उसकी जद्दोजहद की प्रवृत्ति को खत्म कर रहे हैं, जो बचपन जीने का एक सहज तरीका है.
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बच्चे किसी भी सियासी दल का वोट बैंक नहीं होते, इसलिए किसी भी सरकार या राजनैतिक दल की प्राथमिकता में बच्चे शुमार नहीं होते. इसलिए वह शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल-कूद, अवसरों की उपलब्धता में पिछड़ जाते हैं. पूरे देश में बच्चों को कुपोषण अपनी चपेट में ले रहा है, लेकिन किसी को फिक्र नहीं है. भारत में  कुपोषण से पैदा बीमारियों की वजह से हर साल लाखों बच्चों की मौत हो जाती है. 5 साल से कम उम्र के बच्चों की यह संख्या तो प्रतिवर्ष 10 लाख से ऊपर है.

देश में बच्चों के खिलाफ आपराधिक और यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से 2016 में जारी की गई अपराध पर आधारित आखिरी रिपोर्ट कहती है कि बच्चों के साथ अपराध की दर 24 फीसदी तक पहुंच गई है. मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बच्चों के साथ रेप केस दर्ज हुए. मध्य प्रदेश (2,467) के बाद महाराष्ट्र (2,292) और उत्तर प्रदेश (2,115) दो अन्य सबसे बदनाम राज्य हैं.

जहां तक बच्चों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार की बात करें तो उत्तर प्रदेश 2,652 मामलों के साथ सबसे आगे है. इसके बाद महाराष्ट्र (2,370) और मध्य प्रदेश (2,106) शर्म से सिर झुकाए खड़ा है. पोर्नोग्राफी, सेक्सुअल हैरासमेंट की लगातार बढ़ती घटनाएं बच्चों से उनका बचपन छीन सपनों को धूल-धूसरित कर निराशा के सागर में गोते लगाने को छोड़ रही हैं.

ऐसा लगता है जैसे सिस्टम, सियासत, सत्ता, परिवार से लेकर सब बचपन के खिलाफ खड़े हो गए हैं, ऐसे में नेहरू के सपनों का भारत कैसे बनेगा, जहां हर बचपन को उन्मुक्त जीने का अवसर मिलेगा.

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First published: November 14, 2019, 11:08 AM IST
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