#जीवनसंवाद : दुख सहने की कला!

आइए, सुख की जगह दुख को समझने में अपनी शक्ति, समझ और समय का निवेश करें. जिसने एक बार दुख का दर्शन समझ लिया, सुख असल में उसका ही साथी है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 22, 2019, 8:22 AM IST
#जीवनसंवाद : दुख सहने की कला!
जीवन संवाद
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 22, 2019, 8:22 AM IST
बहुत से लोग मिलेंगे, जो कहते हैं, सुख की कला सीखिए. ऐसे लोग अक्सर सुख को खोजने में जुटे रहते हैं. वह अपनी ऊर्जा प्रकृति की विपरीत दिशा में झोंकते हैं. नदी में तैरना कब आसान है! सागर को पार करना कब सरल है! जब आप उसकी धारा, लय और गति के साथ तालमेल बिठा लें. ऐसा ही जीवन के साथ है. हमें जाना दूसरी दिशा में है, दौड़ हम दूसरी दिशा में रहे हैं. तो पहुंचना कैसे संभव होगा?

जीवन मोटे तौर पर कष्ट सहने की यात्रा है. संघर्ष का सफर है. कुछ पड़ाव इसमें मिल जाते हैं, सुख के, विश्राम के! इसके मायने यह नहीं हुए कि यह सुख का सुरीला सफर है. जीवन सुरम्य वादियों में सुख की प्रतीक्षा नहीं है. वह आपके सफर में एक पड़ाव है, इससे अधिक कुछ नहीं.

#जीवन संवाद : आत्महत्या का संक्रामक होना!

इसलिए, बहुत जरूरी है कि
हम सुख की जगह दुख को समझने में अपनी शक्ति, समझ और समय का निवेश करें. जिसने एक बार दुख का दर्शन समझ लिया, सुख असल में उसका ही साथी है!


आपने महात्मा बुद्ध की वह कहानी तो सुनी ही होगी. जिसमें एक बुजुर्ग मां उनके पास आती हैं, बेटे के लिए जीवन की मांग करती हैं. बुद्ध उनसे केवल इतना ही तो कहते हैं कि जाइए, उस घर से भिक्षा ले आइए, जहां किसी की मृत्यु ना हुई हो.

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हमने अलग-अलग माध्यमों अवसरों पर इस कथा को सुना है. एक समाज के रूप में हम कथा श्रवण करने वाले ही तो रहे हैं. हम ईश्वर आराधक समाज तो हैं लेकिन हम उसकी कथाओं को अपने जीवन से जोड़ते नहीं हैं. जब तक यह जोड़ 'फेविकोल' जितना मजबूत नहीं होगा, हम दुख को कभी भी समझ नहीं पाएंगे, संभाल नहीं पाएंगे. सुख-दुख की सीमा में नहीं है बल्कि उसके केंद्र में स्थित है.

जीवन अनंत संभावना का पर्यायवाची है. ऐसा कौन है, जिसके जीवन में संकट नहीं.
हम उन्हीं लोगों की कहानियां पढ़ते हैं जो इस संकट (दुख) से सफलतापूर्वक प्रसन्न चित्त होकर गुजरते हैं. यहां सबसे अधिक जोर प्रसन्न 'चित्त' पर दिया गया है. जब तक हमारा चित्त प्रसन्न नहीं होगा, हम दुख को नहीं संभाल पाएंगे. दुख को संभालने का और दूसरा रास्ता ही नहीं है. हमें उसके साथ रहने और सुख पूर्वक रहने की कला सीखनी होगी.
जीवन मूलतः दुखों को संभालने की कला का नाम है. जो इसे जितनी बेहतर तरीके से साध लेते हैं उनका जीवन उतना ही सुखमय होता है.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 22, 2019, 8:22 AM IST
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