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'दिलचस्प हुआ झारखंड विधानसभा चुनाव: किंग से ज्यादा किंग मेकर की लड़ाई'

Anil Rai | News18Hindi
Updated: December 4, 2019, 11:14 AM IST
'दिलचस्प हुआ झारखंड विधानसभा चुनाव: किंग से ज्यादा किंग मेकर की लड़ाई'
छोटे-छोटे दलों ने झारखंड विधानसभा इलेक्शन को रोचक बना दिया है.

झारखंड में बड़ी-बड़ी पार्टियां भी अकेले चुनाव लड़ रही हैं. जबकि दूसरी सरफ लड़ रहे उनके सहयोगियों को उम्मीद है कि वो भी चुनाव बाद 2-4 सीटें लाकर मोल-भाव की स्थिति में आ जाएंगी.

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  • Last Updated: December 4, 2019, 11:14 AM IST
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महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद अब सबकी नजरें झारखंड चुनाव पर टिकी हैं. महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव के बाद छोटे दलों ने जिस तरह विधानसभा के गणित को उलटकर सरकार का नया 'गणित' सेट कर दिया है, ऐसे में झारखंड के चुनावों में भी छोटे दलों की बड़ी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सरकता. दरअसल पिछले 5-6 विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ को छोड़कर किंग से ज्यादा अहम किंगमेकर हो गए हैं. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भले ही किंग मेकर कुछ खास नहीं कर पाए हों लेकिन कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा में तो किंग मेकर ने चुनाव के गणित के उलट सरकार का गणित अलग कर दिया. ऐसे में झारखंड विधानसभा चुनाव पर सबकी नजर टिकी हैं. यहां जिम्मेदारी झारखंड विकास मोर्चा, जेडीयू, आरजेडी और आजसू जैसे छोटे दलों पर है जो किंग बनने के लिए नहीं बल्कि किंगमेकर बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं.

महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद बदली छोटे दलों की भूमिका
झारखंड की राजनीति पर नजर डालें तो यहां हमेशा किंग से ज्यादा लड़ाई किंग मेकर के लिए रही है. क्योंकि झारखंड ही एक ऐसा राज्य है जहां निर्दलीय विधायक को भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला है. झारखंड के करीब 20 साल के इतिहास में 2014 में पहली बार किसी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. राज्य बनने के शुरुआती 14 सालों में झारखंड ने 7 मुख्यमंत्री देखे.

यानि जिन पार्टियों को 42 सीटों के जादुई आकड़े तक पहुंचने की उम्मीद नहीं है उनकी मंशा यही है कि झारखंड विधान सभा त्रिशंकु हो जाए और उन्हें सरकार में अपनी शर्तों पर शामिल होने का मौका मिल जाए. झारखंड की लड़ाई में वैसे तो जेएमएम –कांग्रेस गठबंधन के नेता प्रमुख हेमंत सोरेन और मुख्यमंत्री रघुवर दास के बीच आमने-सामने का मुकाबला है लेकिन 81 सीट वाली झारखंड विधानसभा में 2-4 सीट पाने वाले भी राजनीतिक समीकरण बना-बिगाड़ सकते हैं. ऐसे में आजसू के सुदेश महतो और झारखंड विकास मोर्चा के बाबूलाल मरांडी, जनता दल (यू) और RJD की भूमिका अहम हो जाती है.


आजसू और झारखंड विकास मोर्चा पर सबकी नजर
चुनाव से ठीक पहले आजसू-बीजेपी के गठबंधन टूटने से आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो की भूमिका काफी अहम हो गई है. सुदेश की चुनाव बाद क्या भूमिका होगी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीजेपी और जेएमएम दोनों दलों के नेता खुले तौर पर चुनाव बाद आजसू के साथ लेने की घोषणा कर चुके हैं. झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबू लाल मरांडी भी इन चुनावों में 5-10 सीट जीतकर अपनी भूमिका मजबूत करने में लगे हैं. वैसे राजनीतिक जानकर उन्हें भी चुनाव के बाद के समीकरण की मजबूत कड़ी मानते हैं. झारखंड के चुनाव में केन्द्र में एनडीए का हिस्सा जेडीयू और एलजेपी अलग-अलग ताल ठोक रहे हैं, तो दूसरी और यूपीए का हिस्सा आरजेडी यहां अकेले चुनाव लड़ रही है. और इन पार्टियों को कोशिश सिर्फ इतनी है कि किसी तरह 4-6 सीटें मिल जाए त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में ठीक से मोलभाव किया जा सके.

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First published: December 3, 2019, 12:38 PM IST
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