OPINION: टॉस तो जीत गई टीम सोरेन, टूर्नामेंट जीतने की है चुनौती

हेमंत सोरेन 29 दिसंबर को झारखंड के नए सीएम की शपथ लेंगे.
हेमंत सोरेन 29 दिसंबर को झारखंड के नए सीएम की शपथ लेंगे.

झारखंड में JMM कांग्रेस और RJD का महागठबंधन अपने बल पर नहीं जीता, बल्कि यहां के लोगों ने उसे एक अवसर दिया है कि वह BJP और आजसू से मिली निराशा को दूर कर सके. सबसे बड़ी चुनौती इस महागठबंधन सरकार की यही है. बाकी चुनौतियां इसी चुनौती की शाखाएं हैं.

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  • Last Updated: December 25, 2019, 10:19 AM IST
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(अनुराग अन्वेषी)

झारखंड मेहनतकशों का राज्य है. सिर्फ आदिवासी ही नहीं, वर्षों से रह रहे सदान भी मेहनतकश और ईमानदार हैं. आप कह सकते हैं कि यहां के लोग भोले-भाले और लगभग ग्रामीण हैं. छल-कपट से बहुत दूर रहने वाले, सहज ही हर बात पर भरोसा करने वाले, बेहद भावुक, शांत और सरल लोग. ऐसे सीधे-सादे और सरल लोगों की अगुवाई कर पाना टेढ़ी खीर होती है. ऐसे लोग अगर अपनी जिद पर आ जाएं तो कुछ भी कर सकते हैं. वह बहुत जल्दी किसी को भी दिल में उतार लेते हैं और उम्मीदों पर लगातार खरा न उतरने पर जल्दी ही दिल से उतार भी देते हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ यही हुआ. यहां के लोगों ने भाजपा को दिल से उतार दिया.

झारखंड विधानसभा 2019 के नतीजे की वजह समझने से पहले बेहतर होगा कि यहां के लोगों की प्रकृति समझी जाए. लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे माही के खेल और उनके संयम से यहां के लोगों को समझना ज्यादा आसान होगा. माही को विश्व भर के लोग भले क्रिकेट के आइकन के तौर पर देखते हैं, पर सच है कि माही आइकन होने से पहले झारखंडी जनता का प्रतिनिधि चरित्र हैं. माही के खेल की तारीफ और आलोचना अक्सर होती रही है. तारीफ से वे फूले नहीं और आलोचनाएं उन्हें विचलित नहीं कर सकीं.



बड़े धीरज से उन्होंने अपने आलोचकों का मुंह अपने खेल से बंद किया. बहुत गौर करने की जरूरत नहीं, यह सब जानते हैं कि माही क्रिकेट की तकनीक के मामले में न तो राहुल द्रविड़ रहे, न ही गावस्कर. वह क्रिकेट की शास्त्रीयता से बिल्कुल अलग ठोस रूप से जुनूनी खिलाड़ी रहे. वह अपनी टीम की जीत के लिए खुद को झोंक देते हैं. टीम की मेहनत और अपनी फौरी सूझ को हथियार बना जोखिम उठाते हैं. वह क्रिकेट को शास्त्रीय अंदाज से नहीं खेलते, बल्कि भावुक और जुझारू अंदाज से खेलते हैं. सच है कि अधिकतर झारखंडी ऐसे ही होते हैं-बिल्कुल जुनूनी. खूब भावुक.
झारखंडी नादानियों को माफ कर सुधार का नया अवसर देना जानते हैं. छलावा, धोखा और झूठ से उतनी ही नफरत करते हैं. प्यार उन्हें अपनी ओर खींचता है, पर इसी प्यार का कोई व्यापार करे तो उसके व्यापार को वह तहस-नहस करने पर आमादा हो जाता है.


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पिता-मां और पत्नी के साथ हेमंत सोरेन.


इस लिहाज से देखें तो झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का महागठबंधन अपने बल पर नहीं जीता, बल्कि यहां के लोगों ने उसे एक अवसर दिया है कि वह भाजपा और आजसू से मिली निराशा को दूर कर सके. सबसे बड़ी चुनौती इस महागठबंधन सरकार की यही है. बाकी चुनौतियां इसी चुनौती की शाखाएं हैं.

हेमंत सोरेन को झारखंड में सरकार बनाने के बाद कई मोर्चों पर जूझना होगा. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार दोहराया था ‘मैं राज्य के बेरोजगार युवाओं से वादा करता हूं कि मेरी सरकार आने पर शत-प्रतिशत युवाओं को राज्य में ही रोजगार दूंगा और जब तक किसी को रोजगार नहीं दे पाया तब तक उसे बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा’.

उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था- 'झारखंड में बेरोजगारी दर अपनी सीमाएं लांघ रहा है. यह एक बीमारी की तरह बढ़ रहा है. जहां वर्तमान में देश में बेरोजगारी दर 7.2 प्रतिशत है, वहीं राज्य में यह उससे ज्यादा 9.4 प्रतिशत है. पिछले 4.5 वर्षो में भाजपा की रघुबर सरकार ने युवाओं को बस ठगा है. राज्य में 4 लाख से ज्यादा निबंधित बेरोजगार हैं. इससे कहीं ज्यादा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं.'

इसी साल अप्रैल में सैंपल सर्वे ऑफिस की रिपोर्ट आई थी. उसके मुताबिक, देश के उन 11 राज्यों में झारखंड शामिल है, जहां बेरोजगार दर सबसे ज्यादा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि बेरोजगारी के मामले में झारखंड पांचवें नंबर पर है. झारखंड में 2011-12 में 2.5 प्रतिशत बेरोजगारी की दर थी, जो 2017-18 में 7.7 हो गई.

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परिवार के साथ हेमंत सोरेन


एक ऐसे समय में जब झारखंड सरकार पर 85 हजार 234 करोड़ का कर्ज है, तो क्या सरकार के लिए यह मुमकिन होगा कि राज्य के बेरोजगारों को भत्ता दे सकें? या यहां रोजगार के अवसर पैदा कर सके?


2014 में जब रघुबर दास ने सरकार संभाली थी, तब राज्य पर 37 हजार 593 करोड़ का कर्ज था. मगर रघुबर सरकार आने के बाद राज्य का कर्ज और तेजी से बढ़ा. 2014 से पहले 14 वर्षों में आई सरकारों ने जितना कर्ज लिया था, उससे कहीं ज्यादा रघुवर सरकार ने लिया. ऐसे में मुख्यमंत्री बनने के बाद हेमंत सोरेन के सामने इस कर्ज को कम करने की भी चुनौती होगी. राज्य के किसानों पर भी छह हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद किसानों को इस कर्ज से उबारने की भी चुनौती सोरेन का रास्ता रोकेगी.

झारखंड की लगभग 37 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारती है. गाहे-बगाहे यहां भूख से होने वाली मौत की खबरें आती रहती हैं, जो राज्य की गरीबी के आंकड़े को पुष्ट भी करती हैं, राज्य को बदनामी की ओर भी धकेलती हैं. राज्य पर लगे इस गरीबी के टैग को हटाना इस सरकार की बड़ी चुनौती बनने वाली है.

झारखंड में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने बार-बार अपनी सभाओं में कहा कि झारखंड में नक्सली समस्या लगभग अपने अंतिम सांसें ले रहा है, जबकि उस दौरान नक्सली हमले की खबरें लगातार आती रहीं. भाजपा ने यहां के स्थानीय मुद्दों को लगातार नजरअंदाज किया और राम मंदिर, एनआरसी, धारा 370, नागरिकता संशोधन विधेयक की चर्चा कर लोगों को बहलाने की कोशिश की. वह चूक गई यहां के लोगों का वह नब्ज पकड़ने में कि वे नादानियां तो नजरअंदाज कर सकते हैं, पर चालबाजियों को नहीं.

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ठीक इसके उलट महागठबंधन ने यहां के लोगों के बीच वह उम्मीद जगाई कि वह उनकी समस्याएं समझता है और दूर करने की दिशा में वह ईमानदारी से जुटेगा. सोरेन सरकार को यहां की जनता को साथ लेकर चलना होगा. यह अकेले हेमंत सोरेन के बूते की बात नहीं होगी. इसके लिए उनकी पूरी टीम को एकजुट होना होगा. यह एकजुटता महज राजनीति वाली दिखावटी एकजुटता न हो, वह ठोस हो.


हालांकि, ऐसी एकजुटता किसी भी महागठबंधन सरकार के लिए चुनौती होती है. सोरेन को इस चुनौती का भी सामना करना होगा. अब यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा कि हेमंत सोरेन इन कसौटियों पर कितना खरा उतर पाते हैं? समय के साथ यह भी साफ होगा कि उनमें धोनी वाला वह माद्दा है कि नहीं, जो पूरी टीम को लेकर आगे बढ़ता है और कई बार तो सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर टीम इंडिया को जिताता रहा है. टॉस तो टीम सोरेन जीत चुकी है, देखना रोचक होगा कि टूर्नामेंट की ट्रॉफी इस टीम के हिस्से आती है या नहीं? इंतजार करें अगले चुनाव तक.

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