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झारखंडः भूख से पहली मौत के 6 महीने बाद कोयला मजदूरों का डर- अगला नंबर हमारा तो नहीं?

झारखण्ड में भूख से मौत के 6 महीने बाद कोयला खदान श्रमिकों का डर, अगला नंबर हमारा तो नहीं?

झारखण्ड में भूख से मौत के 6 महीने बाद कोयला खदान श्रमिकों का डर, अगला नंबर हमारा तो नहीं?

बैजनाथ का परिवार पिछले सात महीने से इस बात की लड़ाई लड़ रहा है कि प्रशासन मान ले कि उनकी मौत भूख से हुई थी.

    झारखण्ड में छह महीने पहले रिक्शा खींचने वाले 45 साल के बैजनाथ रविनाथ की मौत हो गई थी. अधिकारियों को सूचित करने से पहले ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया लेकिन उनके परिवारवालों और पड़ोसियों का कहना है कि उनकी मौत भूख से हुई थी. अब ताराबागान के दूसरे निवासियों को डर है कि कहीं भूख के अगले शिकार वे न बन जाएं.

    'हम कितनी बार कहें कि उनकी मौत भूख से हुई है. लेकिन इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ. अब हम इस बारे में बात नहीं करना चाहते हैं," रविदास के बड़े बेटे ने यह कहा और अपने औजार उठाकर काम के लिए निकल पड़ा.

    बैजनाथ की पत्नी पार्वती जानती है कि उनकी मौत की वजह भूख थी लेकिन वह बहुत मुश्किल से इस बारे में बात करने का साहस जुटा पाती हैं.

    झारिया कोयले खान के गेट नंबर छह से सिर्फ आधा किलोमीटर की दूरी पर एक गली आपको एक गंदी बस्ती तक लेकर जाती है. मिट्टी के घरों वाली इस बस्ती की ज्यादातर महिलाएं नौकरानी के तौर पर काम करती हैं, जबकि उनके पति कारखानों या दुकानों में मजदूर का काम करते हैं.

    बैजनाथ का परिवार पिछले सात महीने से इस बात की लड़ाई लड़ रहा है कि प्रशासन मान ले कि उनकी मौत भूख से हुई थी.

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    मुश्किल से अपने आंसू रोकने के बाद बैजनाथ के 14 वर्षीय छोटे बेटे रवि कुमार ने कहा, "भूख की वजह से उनकी मौत हो गई. चार दिनों से घर में खाना नहीं था. मेरी मां आमतौर पर घर पर होती है, मेरे पिता की मृत्यु के ठीक बाद मेरे भाई ने टायर की दुकान में काम करना शुरू कर दिया."

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    मृतक बैजनाथ का बेटा


    बैजनाथ की मौत के बाद परिवार को कुछ पैसे और राशन कार्ड दिए गए हैं.

    बैजनाथ रविदास की मौत के बाद धनबाद के डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि बैजनाथ पिछले कुछ महीनों से बीमार था और उसकी मौत भूख से नहीं हुई.

    लेकिन क्या कोई कोयला खनन केंद्र के पास भूखा रह सकता है? शहरी भुखमरी संभवत: सत्य है.

    बैजनाथ रविदास के परिवार के पास में रहने वाली गीता एक स्थानीय कारखाने में बर्तनों की सफाई का काम करती है. कोयले की खान में काम करने के उसके पति के सारे सपने व्यर्थ हो चुके हैं. गीता को मात्र 400 रुपये तनख्वाह मिलती है. पूछने पर गीता ने कहा कि मेरे तीन बच्चे हैं क्या आपको लगता है कि 400 रुपये हमारे लिए पर्याप्त हैं?

    2017 में रेलवे ने झारखण्ड के झारिया कोयला खदान क्षेत्र में धनबाद-चंद्रपुरा के बीच चलने वाली सभी ट्रेनों को रद्द कर दिया था, कोयला मंत्रालय ने रिपोर्ट दी थी कि खानों में पुरानी आग ने क्षेत्र को अस्थिर और कमजोर कर दिया है.

    इस क्षेत्र में एक लाख लोग रहते हैं, तब झारखण्ड के मुख्य सचिव राज बाला वर्मा धनबाद गए थे और वहां उन्होंने अधिकारियों और हितधारकों से लोगों के पुनर्वास के बारे में चर्चा की थी. खदान बंद होने के बाद अब लोग भुखमरी में जीने को मजबूर हैं.

    आहेली 10 साल की थीं जब उनकी शादी हुई थी, कुछ वक्त पहले तक उन्होंने भुखमरी के बारे में सोचा भी नहीं था. उन्होंने कहा, "जब मैं यहां आई तो लोग कोयले की खानों में काम करते थे. मैंने कभी खाने के बारे में नहीं सोचा. हमारे पास कभी राशन कार्ड नहीं थे. लेकिन अब जब हमारे पास काम नहीं है तो राशन कार्ड की जरूरत महसूस हुई. रविदास की मौत के बाद राशन कार्ड बनाया गया है."

    गीता और आहेली स्थानीय फैक्ट्री में काम करते हैं जहां उन्हें महीने के 400 रुपए दिए जाते हैं.

    क्षेत्र के अधिकांश लोग प्रधानमंत्री मोदी से नाराज हैं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने कोयला कंपनी शुरू करने का वायदा किया था जो पूरा नहीं किया गया.

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    मानसून के दिनों में झारिया के आग से प्रभावित खानों में जोखिम बढ़ जाता है ऐसे में प्रशासन ने लोगों के पुनर्वास की गति तेज कर दी है. अब यहां के निवासियों की समस्या यह है कि या तो उन्हें दूर भेज दिया जाएगा या फिर वे यहां भूखे मरेंगे.

    रविदास के बड़े बेटे अरुण कुमार ने बताया कि विस्थापित होने के लिए तैयार दो लोगों का घर तोड़ा जा चुका है. अरुण कुमार का कहना है कि उन्हें जंगल के बीच भेजा जा रहा है जहां न तो स्कूल है और न शौचालय की सुविधा, मौत के इंतजार को छोड़कर हमारे पास वहां कुछ भी नहीं होगा.

    (यह कहानी न्यूज 18 द्वारा झारखण्ड में भुखमरी से मौत पर चलाई जा रही सीरीज का हिस्सा है)

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