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21वीं सदी में भी भूख मिटाने के लिए चूहा खाने को मजबूर हैं भारत के लोग

21वीं सदी में भी भूख मिटाने के लिए चूहा खाने को मजबूर हैं भारत के लोग

21वीं सदी में भी भूख मिटाने के लिए चूहा खाने को मजबूर हैं भारत के लोग

21वीं सदी में भी भूख मिटाने के लिए चूहा खाने को मजबूर हैं भारत के लोग

छत और सम्मान की कमी के अलावा भूख मुसहरों की सदाबहार साथी रही है.

    (देबायन रॉय)

    बुद्धिया की आंखे खुशी से चमक रही थी क्योंकि उसने दिन का पहला शिकार पकड़ लिया था, एक बड़ा चूहा. गुलाबी फ्रॉक पहने सात साल की बुद्धिया ने एक पल के लिए भी उसे नहीं छोड़ा, इस दौरान उसने मैदान पर गड्ढा खोदकर आग जलाना जारी रखा.

    छत और सम्मान की कमी के बाद भूख ही है जो मुसहर जाति के लोगों की सदाबहार साथी रही है.

    बुद्धिया की कमजोर काया देखकर किसी को भी लगेगा कि वह तीन साल से ज्यादा बड़ी नहीं होगी. घर के निकट खड़ा महुआ के पेड़ उसका सबसे अच्छा दोस्त बन चुका है. यदि महुआ का पेड़ उसे कुछ खाना दे सकता है तो बुद्धिया को उसकी सभी परेशानियों का हल मिल जाएगा.

    रांची से 200 किलोमीटर दूर स्थित गढ़वा के एक प्राथमिक स्कूल के निकट ये लोग घास की झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं.



    जाति व्यवस्था में मूसहर जाति का स्थान सबसे नीचे माना जाता है. इनके लिए न तो छत उपलब्ध है और न ही भोजन.

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    यहां लगभग 10 परिवारों के 100 सदस्य एक स्थान पर रह रहे हैं. झारखंड में सबसे अधिक भेदभाव सहन करने वाली जाति मुसहरों के लिए घर का सपना देखना बहुत दूर की बात है. नमक और चावल का भोजन खत्म करने के बाद हरि अपने घर के प्लास्टिक शीट के ढीले छोर को बांधने में व्यस्त हो गया.

    हरि ने कहा, "अगर हमें चावल और नमक मिलता है तो यह अच्छा दिन है." हालांकि इन लोगों के अधिकांश दिन चूहों को पकड़ने के मुश्किल काम में ही बीतते है. एक बार चूहा पकड़ भी लेते हैं तो उबालने के बाद उसकी त्वचा को छुड़ाना सबसे मुश्किल काम होता है.

    हरि की पत्नी मंजरी ने कहा कि हम यहां 16 सालों से रह रहे हैं लेकिन हम में से केवल एक के पास ही आधार कार्ड है. उन्होंने कहा ऐसा लगता है जैसे हम किसी को नजर नहीं आते.



    मूसहर जाति के लोग केवल चूहा नहीं खाते वे सुअर भी पालते हैं जिन्हें विशेष अवसरों पर मारा जाता है.

    मूसहर जाति की चर्चा हाल ही में समाचार पत्रों में तब हुई जब चतरा जिले में भूख की वजह से एक पेड़ के नीचे मीना मूसहर ने दम तोड़ दिया. निचली जाति की होने की वजह से पड़ोसियों की दुत्कार के बाद मीना खाने के लिए भीख मांगते हुए मर गई.

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    हालांकि सरकार ने इस बात से इनकार कर दिया कि मीना की मौत भूख से हुई है. मीना का इलाज करने वाले सरकारी डॉक्टर का कहना है कि मीना की मौत जंगली खाना  खाने से हुई है.

    झारखण्ड के दो इलाकों गढ़वा और पलामू में मूसहर जाति की अधिकतर संख्या रहती है. गढ़वा में मूसहर जाति के करीब 10,000 लोग रहते हैं, जिनमें से अधिकांश जंगलों में रहते हैं ताकि शहद इकट्ठा कर सकें और आसानी से चूहे पकड़ सकें.

    बुद्धिया तब 6 साल की थी जब उसने आखिरी बार कंबल ओढ़ा था, अब उसकी मां और छोटा भाई उस कंबल का इस्तेमाल करते हैं. अब वह बिना छत के अपने चार भाई बहनों के साथ सोती है.



    चार साल के मुन्ना कि जिम्मेदारी अपने घर के बर्तन धोने की है जबकि उसकी मां गांव में घूमकर चावल और नमक की भीख मांगती है.

    बुद्धिया जब भी स्कूल में बच्चों को चावल और दाल खाते हुए देखती है तो वह परेशान हो जाती है, वह कहती है 'यह तो सरकारी है कुछ हमें भी दे दो.'

    मूसहर जाति ने सरकारी स्कूल के पास ठिकाना बनाया है. इसकी बड़ी वजह पीने के पानी तक पहुंच और दिन में मिलने वाला मिड-डे-मील है. मूसहर मूल रूप से चूहे पकड़ने वाले थे और जाति मतगणना में वे दलित के रूप में वर्गीकृत हैं. उनकी जाति का नाम 'मूष' शब्द से निकला है यानी चूहा.

    मूसहर जाति की उत्पति के पीछे एक किवदंती है. इसके अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा ने एक आदमी को सवारी करने के लिए उपहार में एक घोड़ा दिया. घोड़े पर अपने पैरों को स्थिर करने के लिए आदमी ने उसकी पीठ पर छेद कर दिए जिससे ब्रह्मा नाराज हो गए. उन्होंने उस आदमी को श्राप दिया कि वह अबसे गड्डे खोदकर अपना भोजन एकत्रित करेगा, जिसके बाद वह चूहे पकड़ने लगा.



    अच्छे दिन हरी ज्यादा चूहे पकड़ लेता है, वह दिन समुदाय के लिए दावत के समान होता है.

    देवी पास के गांव में सरकार की तरफ से बनाए गए शौचालयों को साफ करने का काम करती है. उसने बताया कि वह स्थानीय मंदिर के अंदर भोग खाने की कोशिश करती है, लेकिन आमतौर पर उसे प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया जाता है. मूसहर जाति के लोगों को मंदिर में आने की अनुमति नहीं है.

    "हमें मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है और गांव के कुंए से भी हम पानी नहीं पी सकते. तो आप कैसे सोच सकते हैं कि हम राशन सिस्टम में हिस्सा ले सकते हैं," देवी ने पूछा.

    बिहार में मूसहर जाति को महादलित का स्टेटस दिया गया है जो कि सरकारी सेवाओं के लिए आदेवन कर सकते हैं, लेकिन झारखण्ड में एक लाख मूसहर अब भी पहचान के लिए इंतजार कर रहे हैं.

    रांची से 200 किलोमीटर की दूरी पर गढ़वा में रहने वाले इन 10 परिवारों में किसी को भी बारिश पसंद नहीं है.

    पिछले साल प्रशासन ने उनके आवास के लिए कोई भी कदम उठाने से इनकार कर दिया था. वह भी उस वक्त जब ब्लॉक विकास अधिकारी असफ अली ने बुल्डोजर चलाकर मूसहर जाति के लोगों के मिट्टी के घर गिरा दिए थे. इस मुद्दे को वहां के विधायक भानु प्रताप ने विधानसभा में भी उठाया लेकिन इसके बाद भी इसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

    (यह कहानी झारखण्ड में भूख से मौत पर News18 द्वारा चलाई जा रही सीरीज की चौथी एवं अंतिम कहानी है)

    Tags: Jharkhand news

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