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एनसीपी नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी ने जेएनयू से ही लड़ी थी आपातकाल के खिलाफ लड़ाई

News18Hindi
Updated: January 6, 2020, 3:33 PM IST
एनसीपी नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी ने जेएनयू से ही लड़ी थी आपातकाल के खिलाफ लड़ाई
एनसीपी नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी वामदल छोड़कर कांग्रेस और फिर राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए थे. वह जेएनयू के छात्र रहे थे.

देवी प्रसाद त्रिपाठी (DP Tripathi) वाम राजनीति (Left) को छोड़कर कांग्रेस (Congress) में शामिल हुए. फिर कांग्रेस से किनारा कर एनसीपी (NCP) का दामन थाम लिया. वह जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU) के अध्‍यक्ष्‍ा रहे. आपातकाल (Emergency) में उन्‍हें जेल में डाल दिया गया. एमनेस्‍टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने उन्‍हें राजनीतिक कैदी के तौर पर सूचीबद्ध किया था. बाद में वह देश की सियासत में अहम किरदार बनकर उभरे.

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सोहेल हाशमी

राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता देवी प्रसाद त्रिपाठी (Devi Prasad Tripathi) की दूरदर्शिता की कमी के चलते उनके समर्थक उनसे किनारा करते रहे, लेकिन सियासत पर उनकी पकड़ को कभी नजरअंदाज भी नहीं कर पाए. वह राजनीतिक तौर पर बार-बार पार्टियां बदलते रहे. उनकी शुरुआत वामपंथ (Left) से जुड़ाव के साथ हुई. बाद में वह कांग्रेस (Congress) में चले गए और आखिर में एनसीपी (NCP) का दामन थाम लिया. वह उन मुद्दों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध थे, जो उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय (Allahabad University) में अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान वामपंथी सक्रियता के शुरुआती दिनों में जाने थे.

बाकी सभी युवाओं की तरह डीपी त्रिपाठी भी आजादी की लड़ाई (Struggle for Freedom) की कहानियां सुनकर ही बड़े हुए थे. 70 के दशक में जब देश के युवा साम्राज्‍यवाद (Anti-imperialism) के खिलाफ थे तो उन्‍होंने भी भूख व शोषणमुक्‍त दुनिया के सपने देखे. वह भी चाहते थे कि भारत धर्मनिरपेक्षता, समानता, लोकतंत्र का समर्थक होने के साथ ही सबको साथ लेकर चलने वाला देश बने. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी आने के बाद भी वह राजनीति में सक्रिय रहे. बाद में वह जेएनयू छात्रसंघ के अध्‍यक्ष भी बने. आपातकाल के दौरान उन्‍होंने केंद्र सरकार के फैसले का विरोध किया. इस वजह से उन्‍हें मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्‍योरिटी एक्‍ट (MISA) के तहत लंबा समय जेल में गुजारना पड़ा.

कई भाषाओं के जानकार थे त्रिपाठी, जेएनयू से था गहरा जुड़ाव

डीपीटी को गालिब, फिराक, मुक्तिबोध, फैज, नागार्जुन और निराला के साथ ही संस्‍कृत से भी लगाव था. साथ ही उनकी अंग्रेजी, अवधी, बांग्‍ला समेत कई भाषाओं पर अच्‍छी पकड़ थी. वह अकसर कविताएं लिखते थे. उनकी ज्‍यादातर कविताएं बुंदेलखंडी आलहा की तर्ज पर होती थीं. वह उन्‍हें मेज पर तबला बजाकर गाकर सुनाते थे. हर बार गाते समय वह अपनी कविता में एक और संघर्ष की कहानी जोड़ देते थे. वह दर्जनों कवियों, लेखकों, फिल्‍म निर्माताओं को व्‍यक्तिगत तौर पर जानते थे. वह जेएनयू के लोगों से काफी जुड़ाव रखते थे. अकसर वह जेएनयू से जुड़े लोगों के घरों पर होने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करते थे. नेपाल और मॉरिशस के राजनीतिक दलों में लोग उन्‍हें गुरु, सलाहकार और मित्र के तौर पर पहचानते थे.

डीपीटी को आंखें कमजोर होने के कारण पढ़ने में होती थी मुश्किल
डीपीटी ने 1973 में जेएनयू में एडमिशन लिया और हॉस्‍टल में रहने लगे. वह बमुश्किल देख पाते थे. उन्‍हें कोई पेपर पढ़ने के लिए आंखों के बहुत नजदीक लाना पड़ता था. बाद के दिनों में वह राष्‍ट्रीय राजनीति में अहम किरदार बनकर उभरे. 1978 में जेएनयू में हुए चुनाव के प्रचार के दौरान एफआई की ओर से डीपीटी व सीताराम येचुरी और रिवॉल्‍यूशनरी सोशलिज्‍म के छात्र जायरस बानाजी, पृथ्‍वीराज मिश्रा व अन्‍य के बीच गुरमा-गरम बहस हुई थी. जहां जायरस ने अपने भाषण में मार्क्‍सवाद का जिक्र किया तो डीपीटी ने भी उन पर पलटवार के लिए मार्क्‍स का ही सहारा लिया. फर्क सिर्फ इतना था कि जायरस पेपर पढ़ रहे थे, जबकि डीपीटी ने अपने भाषण में बिना कुछ देखा किताबों के नाम, पन्‍ना और पैराग्राफ संख्‍या बताकर अपनी बात रखी. डीपीटी के इस भाषण के बाद लोगों ने उनके रेफरेंसेस को चेक करना शुरू किया. बाद में पता चला कि उनका हर रेफरेंस सही था.(लेखक फिल्‍म निर्माता हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: January 6, 2020, 3:33 PM IST
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