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टीबी की वैक्सीन से रुकता है कोरोना का गंभीर संक्रमण और मौत का खतरा- JNU रिसरचर्स का शोध

भारत में BCG का टीकाकरण साल 1949 से ही हो रहा है.

भारत में BCG का टीकाकरण साल 1949 से ही हो रहा है.

कोरोना वायरस (Coronavirus) की दवा और वैक्सीन पर शोध चल रहे हैं.हर देश की कोशिश है कि इस संक्रामक बीमारी से होने वाली मृत्यु को रोका जा सके.

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नई दिल्ली. दुनिया भर में फैले कोरोना वायरस (Coronavirus) संक्रमण के बीच अलग-अलग देशों में इसकी दवा और वैक्सीन पर शोध चल रहा है. इसके साथ ही हर देश की कोशिश है कि इस संक्रामक बीमारी से होने वाली मृत्यु को रोका जा सके. इस दौरान दो स्टडीज में यह बात सामने आई है कि बच्चों में टीबी को फैलने से रोकने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली BCG (Bacillus Calmette Guerin BCG) वैक्सीन कोरोना के गंभीर संक्रमण को कम करने के साथ ही मौत रोकने में भी मददगार है. स्टडी करने वालों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के शोधकर्ता भी शामिल हैं.

जेएनयू के अध्ययन में पाया गया कि वैक्सीन बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बीसीजी स्ट्रेन पर सुरक्षा की गुणवत्ता निर्भर करती है, जिसमें मिक्स्ड, पॉश्चर और जापान के तीन अन्य स्ट्रेन्स से बेहतर है, जो एक साथ 90% से अधिक बीसीजी टीके का उपयोग करते हैं. स्टडी को सेल डेथ एंड डिजीज में प्रकाशित किया गया था. प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित अमेरिका के दूसरे अध्ययन ने भी बीसीजी टीकाकरण को कोविड की कम मौतों की वजह माना.

1000 से अधिक मामलों वाले देशों के डेटा का एनालिसिस
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर मॉलिक्यूलर मेडिसिन के चेयरपर्सन गोवरधन दास ने कहा- ' 1,000 से अधिक मामलों वाले देशों के डेटा के एनालिसिस से यह सामने आया है कि भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी जिनका बीसीजी टीकाकरण हुआ है, वे उन लोगों की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं जिन्हें बीसीजी का टीका नहीं लगा है. हमें लगता है कि बीसीजी के इस्तेमाल से संक्रमण और संक्रमण की गंभीरता दोनों को कम करने में मदद मिलेगी.' दुनिया भर में लगभग 1 अरब मिलियन बच्चों को हर साल बीसीजी वैक्सीन का टीका लगता है.
भारत में 1949 से बच्चों का बीसीजी टीकाकरण शुरू हुआ. साल 2019 में जन्में 26 मिलियन भारतीय बच्चों में से कम से कम 97% का यह टीकाकरण हुआ. यह टीका बचपन में होने वाली टीबी और मेनिन्जाइटिस से बचाता है, लेकिन अडल्ट पल्मोनरी टीबी से सिक्योरिटी नहीं देता जिसकी वजह से कई देशों ने इसका इस्तेमाल बंद कर दिया .



स्टडी से सहमत नहीं कई चिकित्सक
अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार दास ने कहा, 'सेल मेडिएटेड इम्यूनिटी के साथ-साथ बीसीजी पॉवर फुल इम्यूनिटी माजलेटर है. बीसीजी में कुष्ठ रोग, बर्ली अल्सर, मूत्राशय कैंसर, टाइप -1 मधुमेह और कई अन्य बीमारियों से सुरक्षा मिलीत है, जिनमें माइकोबैक्टीरिया से जुड़े नहीं हैं. बीसीजी से इन्यून मैकास में पल्मनरी संक्रमण की होती हैं, जिसके कारण सांस के संक्रमण से रोकथाम के लिए इसके टीकाकरण का प्रस्ताव आया. कोविड -19 एक प्रकार से सांस का संक्रमण भी है इसलिए यह स्टडी को एक और आधार देता है.'

कई चिकित्सक और महामारी वैज्ञानिक इस स्टडी की फाइंडिग्स को सही नहीं मानते हैं. फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में पीडियाट्रिक्स के निदेशक डॉ. कृष्णन चुघ ने कहा- 'मुझे लगता है कि इसका कोई ठोस सबूत नहीं है. इसकी संभावना कम है कि इम्यूनिटी किसी बच्चे के वयस्क होने जारी रहेगा. हमारे पास भारत से पुख्ता सबूत हैं कि यह एडल्ट टीबी से रक्षा नहीं करता है. यहां तक कि बच्चों में भी यह  सिंपल टीबी कोमस्तिष्क और अन्य अंग को प्रभावित करने से रोकता है.'
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