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अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाली बेंच में पहले नहीं थे ये 2 जज, फिर ऐसे हुए शामिल

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 8:50 PM IST
अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाली बेंच में पहले नहीं थे ये 2 जज, फिर ऐसे हुए शामिल
न्यायमूर्ति भूषण ने 1979 से वकालत शुरू की और 2001 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश बने.

अयोध्या मामले (Ayodhya land despute) पर सुनवाई के लिए शुरुआत में गठित की गई पांच सदस्यीय संविधान पीठ में पहले जस्टिस अशोक भूषण (Justice Ashok Bhushan) और जस्टिस एस ए नजीर (Justice S Abdul Nazeer) शामिल नहीं थे. बाद में दो जजों ने जब आपने आपको अयोध्या मामले पर सुनवाई से इनकार किया तो इन्हें मौका मिला.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 8:50 PM IST
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नई दिल्ली. जस्टिस अशोक भूषण (Justice Ashok Bhushan) अयोध्या मामले (Ayodhya land despute) पर सुनवाई के लिए शुरुआत में गठित पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य नहीं थे, लेकिन अपनी तकदीर की वजह से वह इस ऐतिहासिक फैसले का हिस्सा बने. क्योंकि शीर्ष अदालत के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसके बाद उन्हें पीठ में शामिल किया गया. जस्टिस भूषण और जस्टिस एस ए नजीर (Justice S Abdul Nazeer) तब इस पीठ में शामिल हुए जब कुछ वादकारों की आपत्तियों के मद्देनजर जस्टिस एन वी रमण और जस्टिस यूयू ललित ने राजनीतिक तौर पर संवेदनशील इस मुद्दे की सुनवाई से हटने का फैसला किया. जस्टिस रमण और जस्टिस यू यू ललित के भविष्य में भारत का प्रधान न्यायाधीश बनने की संभावना है.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Chief Justice Ranjan Gogoi) ने न्यायाधीशों की एक पीठ बनाई थी जो वरिष्ठता के आधार पर भविष्य में प्रधान न्यायाधीश बनते. न्यायमूर्ति एस ए बोबडे इस महीने की 17 तारीख को सेवानिवृत्त होने जा रहे न्यायमूर्ति गोगोई की जगह लेंगे. वहीं, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़़ नौ नवंबर, 2022 से 10 नवंबर, 2024 तक प्रधान न्यायाधीश के पद पर रहेंगे. जस्टिस भूषण 27 सितंबर 2018 को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा सुनाए गए उस फैसले का हिस्सा थे, जिसने इस्माइल फारुखी मामले में 1994 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को पुनर्विचार के लिये पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया था. इस फैसले ने अयोध्या मामले में नियमित सुनवाई का रास्ता साफ कर दिया था.

जस्टिस भूषण ने इस्माइल के फारुखी के अनुरोध को खारिज किया था
1994 के फैसले में कहा गया था कि इस्लाम में नमाज अदा करने के लिये मस्जिद अनिवार्य नहीं है. उस फैसले को संविधान पीठ के पास भेजने का मामला तब उठा था जब पीठ अयोध्या मामले पर सुनवाई कर रही थी. उस समय मुस्लिम पक्षों ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट पहले इस्माइल फारुखी मामले में दिये गए फैसले को पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखे. न्यायमूर्ति भूषण ने अपनी और तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की तरफ से लिखे गए फैसले में मुस्लिम पक्षों के अनुरोध को खारिज कर दिया था हालांकि, न्यायमूर्ति नजीर ने उन दोनों की राय से असहमति जताई थी.

जस्टिस भूषण ने कई अहम फैसले लिखे
अयोध्या मामले के अलावा जस्टिस भूषण ने कई अहम फैसले लिखे हैं. उनमें आधार पर कानून को बरकरार रखना, आधार को पैन से जोड़ना और सीजेआई ‘कार्य आवंटन के मामले में सर्वेसर्वा होने’ से संबंधित फैसले शामिल हैं. अयोध्या मामले के अलावा जस्टिस भूषण जस्टिस ए के सीकरी के साथ उस पीठ का भी हिस्सा थे, जिसने आधार को पैन कार्ड से जोड़ने की केंद्र की महत्वाकांक्षी परियोजना को चुनौती देने वाली याचिकायें खारिज कर दी थीं. जस्टिस भूषण केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच सत्ता के संघर्ष का निपटारा करने वाली पीठ का भी वह हिस्सा थे. पीठ ने कुछ अधिकार केंद्र को और कुछ दिल्ली सरकार को दिये थे.

 मई 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने थे जस्टिस भूषण
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तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली के खिलाफ तत्कालीन न्यायाधीश जे चेलमेश्वर की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की प्रेस वार्ता के परिप्रेक्ष्य में प्रधान न्यायाधीश के प्रशासनिक अधिकार जैसे अहम मुद्दे पर भी सुनवाई की. उस प्रेस कांफ्रेंस में न्यायमूर्ति गोगोई भी मौजूद थे. पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति भूषण ने कहा था कि भारत का प्रधान न्यायाधीश कार्य आवंटन में सर्वेसर्वा, न्यायपालिका का मुखिया और प्रवक्ता है. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में 1956 में जन्मे न्यायमूर्ति भूषण ने 1979 से वकालत शुरू की और 2001 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश बने. वह 13 मई 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने.

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First published: November 9, 2019, 8:41 PM IST
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