Section 377 पर जस्टिस नरीमन बोले- कोर्ट 'अपराध' की सजा दे सकता है, 'पाप' की नहीं

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने अपने फैसले में लिखा, 'धरती में पाप की सजा कोर्ट नहीं दे सकता, कोर्ट सिर्फ अपराध के मामले में सजा सुना सकता है.'

News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 10:44 AM IST
Section 377 पर जस्टिस नरीमन बोले- कोर्ट 'अपराध' की सजा दे सकता है, 'पाप' की नहीं
सांकेतिक तस्वीर
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Updated: September 7, 2018, 10:44 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए समलैंगिक सेक्स को क्राइम की कैटेगरी से बाहर कर दिया है. कोर्ट का मानना है कि सामाजिक नैतिकता के लिए संवैधानिक नैतिकता की बलि नहीं दी जा सकती और धरती पर कोर्ट सिर्फ अपराध की सजा दे सकता है, पाप की नहीं.

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने अपने फैसले में लिखा, 'धरती पर पाप की सजा कोर्ट नहीं दे सकता, कोर्ट सिर्फ अपराध के मामले में सजा सुना सकता है.'

नरीमन ने इस बात पर जोर दिया कि 'धारा 377 विक्टोरियन युग की देन है, विक्टोरियन नैतिकता को संवैधानिक नैतिकता का मार्ग देना चाहिए जैसा कि हमारे पिछले कई फैसलों में हुआ है. संवैधानिक नैतिकता संविधान की आत्मा है.'

न्यायाधीश के अनुसार, धारा 377 और विक्टोरियन नैतिकता पर तर्क लंबे समय से चला आ रहा है और इसके आगे जारी रखने का कोई कारण नहीं है.

न्यायाधीश ने धारा 377 की वैधता के निर्धारण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप के खिलाफ कुछ धार्मिक संगठनों द्वारा किए गए एक तर्क का भी जिक्र किया. हालांकि, जस्टिस ने इस बात को भी अमान्य करार दिया इसे सरकार और संसद को तय करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए.

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने फैसला लिखते समय 'मेंटल इलनेस' यानी मानसिक विकार को भी परिभाषित किया. मेंटल हेल्थकेयर एक्ट का ज़िक्र करते हुए जस्टिस नरीमन ने कहा, 'समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है. क्योंकि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट में मानसिक विकार को जिस तरह से परिभाषित किया गया, उसमें समलैंगिकता का जिक्र नहीं है.' जस्टिस नरीमन ने कहा कि समलैंगिकता अपनी-अपनी सेक्स च्वॉइस का मामला है.'

बता दें कि अपने इस ऐतिहासिक फैसले में बेंच में कहा कि अन्य व्यक्तियों की ही तरह एलजीबीटी समुदाय को भी समानता का अधिकार प्राप्त है. सेक्शन 377 संवैधानिक सिद्धांतो का उल्लंघन करती है, जो मनमाना और अतार्किक है. बेंच ने कहा कि समलैंगिक समुदाय के प्रति प्रगतिशील और व्यावहारिक नजरिया रखने की जरूरत है. बदलते समय के हिसाब से कानूनों की व्याख्या होनी चाहिए.
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