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धर्म से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की पहली पसंद हैं बेंच के अकेले मुस्लिम न्यायमूर्ति नजीर

धर्म से जुड़े मसलों पर जस्टिस नजीर को सुप्रीम कोर्ट की पहली पसंद माना जाता है

धर्म से जुड़े मसलों पर जस्टिस नजीर को सुप्रीम कोर्ट की पहली पसंद माना जाता है

जस्टिस नजीर (Justice S Abdul Nazeer) ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) मामले में बनाई गई पांच सदस्यीय बेंच में भी शामिल थे और उन्होंने इस मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर (JS Khehar) के साथ एक अल्पमत फैसला (Minority Judgement) दिया था.

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    नई दिल्ली. जस्टिस एस अब्दुल नजीर (Justice S Abdul Nazeer), जो शनिवार को अयोध्या भूमि विवाद मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच (Constitution bench) के अकेले मुस्लिम जज थे, वे धर्म से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के सबसे ज्यादा मांग में रहने वाले जज माने जाते हैं.

    जस्टिस नजीर ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) मामले में बनाई गई पांच सदस्यीय बेंच में भी शामिल थे और उन्होंने इस मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर (JS Khehar) के साथ एक अल्पमत फैसला दिया था.



    ट्रिपल तलाक मसले पर भी थे बेंच का हिस्सा
    इस मामले में 3:2 से दिए फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिमों के बीच प्रचलित 1,400 साल पुरानी ट्रिपल तलाक की प्रथा को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था.

    जबकि, अयोध्या के फैसले में ये जज, जिन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में प्रोन्नत किया गया था, वे मुस्लिम पक्षकारों के तर्कों से सहमत नहीं थे ऐसे में उन्होंने सर्वमत से दिए इस फैसले का हिस्सा बने कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन का अधिकार देवता रामलला को दिया जाना चाहिए.

    मस्जिद को लेकर हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में भी रहे हैं शामिल
    अयोध्या मामले में संवैधानिक बेंच का हिस्सा बनने से पहले, जस्टिस नजीर (Justice S Abdul Nazeer) एक तीन जज बेंच का भाग थे, जिसमें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और अशोक भूषण शामिल थे. इसी बेंच ने 2:1 के बहुमत से एक बड़ी बेंच बनाने का फैसला किया था जो इसके 1994 में दिए फैसले पर पुनर्विचार के लिए बनाई गई थी जिसमें कहा गया था "इस्लाम के कर्मकांडों में मस्जिद एक जरूरी हिस्सा नहीं है."

    तीन सदस्यीय पीठ के 27 सितंबर 2018 के फैसले ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुनवायी करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था जिसमें भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इस मामले पर निर्णय करने के लिए पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया था.

    निजता को मौलिक अधिकार घोषित करने वाली पीठ में भी थे शामिल
    सबसे पहले अयोध्या विवाद पर सुनवायी करने के लिए जो पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया था उसमें न्यायाधीश अशोक भूषण के साथ न्यायमूर्ति नजीर (Justice S Abdul Nazeer) का नाम शामिल नहीं था लेकिन दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति एन वी रमण और न्यायमूर्ति यू यू ललित के इनकार के बाद वे इस मामले का हिस्सा बन गए.

    इन मामलों के अलावा न्यायमूर्ति नजीर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की नौ सदस्यीय उस पीठ का भी हिस्सा थे जिसने अगस्त 2017 में ‘निजता के अधिकार’ को मौलिक अधिकार घोषित किया था.

    2017 में सुप्रीम कोर्ट में हुए थे पदोन्नत
    1983 में वकील बने और कर्नाटक उच्च न्यायालय में वकालत करने वाले न्यायमूर्ति नजीर (61) को 12 मई 2003 में कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया तथा उन्हें सितंबर 2004 में वहां स्थायी न्यायाधीश बनाया गया.

    उन्हें 17 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया.

    यह भी पढ़ें: Ayodhya Verdict: कोर्ट ने रामलला को दी जमीन, पर हिंदू पक्ष के 3 दावे खारिज

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