आलोक वर्मा को लेकर जस्टिस पटनायक की टिप्पणी पर उठ रहे हैं ये सवाल

सुप्रीम कोर्ट के अनुरोध पर जस्टिस पटनायक ने आलोक वर्मा के खिलाफ चल रही सीवीसी जांच की निगरानी की थी. आलोक वर्मा पर उनकी टिप्पणी मीडिया में खासी चर्चित रही.

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: January 12, 2019, 7:51 PM IST
आलोक वर्मा को लेकर जस्टिस पटनायक की टिप्पणी पर उठ रहे हैं ये सवाल
(फाइल फोटो- आलोक वर्मा)
Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: January 12, 2019, 7:51 PM IST
आलोक वर्मा मामले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के जांच की निगरानी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके पटनायक ने शुक्रवार को कहा कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं था और पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली समिति ने उन्हें हटाने के लिए बहुत जल्दबाजी में फैसला लिया.

आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई सबूत न मिलने वाली टिप्पणी सवालों के घेरे में है. सुप्रीम कोर्ट के अनुरोध पर जस्टिस पटनायक ने आलोक वर्मा के खिलाफ चल रही सीवीसी जांच की निगरानी की थी. आलोक वर्मा पर उनकी टिप्पणी मीडिया में खासी चर्चित रही.

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज ने यह भी कहा कि पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच और जांच प्रक्रिया को सही ढंग से आगे बढ़ाने के लिए केवल निगरानी तक ही उनकी भूमिका सीमित थी. उन्होंने कहीं भी नहीं कहा कि सारे तथ्यों की जांच और पड़ताल भी उनकी निगरानी में हुई.

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अब सवाल यह उठता है कि अगर सिर्फ जांच उनकी निगरानी में हुई थी तो उन्हें आलोक वर्मा के खिलाफ या समर्थन में मिले में सुरागों के महत्व के बारे में कैसे पता है?

जस्टिस पटनायक के बयान पर एक सवाल यह भी उठता है कि अगर उन्होंने सभी तथ्यों की पड़ताल नहीं की, तो उनके उस बयान का क्या अर्थ है, जिसमें उन्होंने आलोक वर्मा के खिलाफ मिले साक्ष्यों पर टिप्पणी की थी.

जस्टिस पटनायक ने आलोक वर्मा के उस दावे की भी पुष्टि की थी, जिसमें आलोक वर्मा ने कहा था कि सीवीसी रिपोर्ट जस्टिस पटनायक की ओर से तैयार नहीं की गई है. अगर उनके दावों की बात करें तो क्या चल रही जांच पर टिप्पणी करना जस्टिस पटनायक के अधिकार क्षेत्र में आता है. यहां यह बात भी गौर करने वाली है कि सबूतों पर टिप्पणी करने से सुप्रीम कोर्ट ने भी परहेज ही कियाहै.
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जस्टिस पटनायक ने अपने दो पन्नों की रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उन्होंने सीवीसी जांच केवल उनकी निगरानी में हुई है. ऐसे में अगर जस्टिस पटनायक का अधिकार क्षेत्र केवल जांच तक सीमित था तो आलोक वर्मा के खिलाफ सबूतों पर क्या उन्हें टिप्पणी करनी चाहिए थी?

अगर जस्टिस पटनायक ने आलोक वर्मा पर जुटाए गए सभी तथ्यों को जांचा और समझा है तो क्या उन्हें यह आजादी थी कि वे सुप्रीम कोर्ट में यह कह सकें कि सीवीसी जांच में सामने आए तथ्यों से उनके मतभेद हैं. बावजूद इसके उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केवल यह कहा कि उन्होंने आदेश के मुताबिक खुद को केवल निगरानी तक सीमित रखा.

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जस्टिस पटनायक इस मामले में सही हैं कि सीवीसी रिपोर्ट में कही गई बातें अंतिम सत्य नहीं हो सकतीं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश रह चुका जज केवल किसी मामले की जांच कर सकता है, लेकिन जाचं प्रक्रिया की मेरिट पर सवाल नहीं खड़े कर सकता.

अगर जस्टिस पटनायक ने सभी आरोपों को जांचा है तो यह उनका नैतिक दायित्व है कि वे विस्तार से बताएं कि कैसे आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई साक्ष्य नहीं है.

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First published: January 12, 2019, 5:52 PM IST
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