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सुप्रीम कोर्ट जस्टिस रंजन गोगोई ने चाइल्ड लेबर एक्ट को बताया 'छलावा'

सांकेतिक तस्वीर

जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि ये कानून राइट टू एजुकेशन एक्ट से सुसंगत नहीं है.

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    सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ठ जस्टिस रंजन गोगोई ने बाल श्रम कानून के बारे में कहा कि यह एक तरह की 'मृग मरीचिका' है. दरअसल ये बाल श्रम को बढ़ावा देता है. उन्होंने कहा कि ये अपर्याप्त और प्रतिकूल बताया. उन्होंने नोबल पुरस्कार विजेता व बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी की नई किताब के लॉन्च के मौके पर ऐसा कहा.

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    जस्टिस रजन गोगोई ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बने कानून और गवर्नेंस पर भी सवाल उठाए. बता दें कि जस्टिस रंजन गोगोई सीजेआई बनने की पंक्ति में अगले हैं.

    राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जहां आरटीई एक्ट एक तरफ 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की बात करता है वहीं 2016 में बाल श्रम कानून में किए गए संशोधन के अनुसार 0 से 14 साल के बच्चों को घरेलू कामों के लिए लगाया जा सकता है. आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि क्या यह आरटीई एक्ट के खिलाफ नहीं है.

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    दुख जताते हुए जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि किस तरह से खतरनाक कामों वाली लिस्ट में कामों की संख्या को 83 से घटाकर 3 कर दिया गया है. ये उन कामों कि लिस्ट थी जिनमें बच्चों को काम पर लगाए जाने पर कानूनी तौर पर रोक है. उन्होंने कहा, 'यह कहना मुश्किल है कि अभी का बाल श्रम पर रोक लगाने वाला कानून इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइज़ेशऩ (आईएलओ) कन्वेंशन के नियम 138 व 182 से सुसंगत है.

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