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    कांग्रेस के 2 विद्रोहियों की कहानी, सिंधिया के ग्वालियर में सचिन पायलट द्वारा प्रचार में उतरने को लेकर टिकाऊ और बिकाऊ की लड़ाई शुरू

    आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में जिन 28 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके की हैं. इनमें कई सीटें ऐसी हैं जहां गुर्जर मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है. ऐसे में राजस्थान के दिग्गज गुर्जर नेता सचिन पायलट, कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. पार्टी ने इसी सोच और उम्मीद के साथ सचिन पायलट को सिंधिया के प्रभाव वाले इलाकों में चुनाव प्रचार के लिए उतारने का प्लान बनाया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव मैदान में दो जिगरी दोस्त एक-दूसरे के खिलाफ किस अंदाज में परस्पर विरोधी बयान देते हैं. फोटोः News 18
    आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में जिन 28 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके की हैं. इनमें कई सीटें ऐसी हैं जहां गुर्जर मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है. ऐसे में राजस्थान के दिग्गज गुर्जर नेता सचिन पायलट, कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. पार्टी ने इसी सोच और उम्मीद के साथ सचिन पायलट को सिंधिया के प्रभाव वाले इलाकों में चुनाव प्रचार के लिए उतारने का प्लान बनाया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव मैदान में दो जिगरी दोस्त एक-दूसरे के खिलाफ किस अंदाज में परस्पर विरोधी बयान देते हैं. फोटोः News 18

    दो विद्रोहियों के टकराव को पकड़ने वाली स्थिति हो सकती है. मध्य प्रदेश उपचुनावों में कांग्रेस नेता सचिन पायलट (Sachin Pilot) ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के दुर्ग ग्वालियर में प्रचार करेंगे. दूसरी तरफ सिंधिया भाजपा के लिए मालवा क्षेत्र में प्रचार करेंगे.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 27, 2020, 11:33 AM IST
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    नई दिल्ली. कांग्रेस के अंदर सिंधिया और पायलट दोनों की कहानी ही एक बागी के रूप में निकलकर आई. कांग्रेस सोशल मीडिया विंग (Congress Social Media Wing) पहले से ही दोनों के बीच बिकाऊ और टिकाऊ की लड़ाई को पिच करना शुरू कर चुका है. यह सचिन पायलट के कांग्रेस में ही रहने और सिंधिया के भाजपा में चले जाने को संदर्भित करता है.

    दोनों अपेक्षाकृत नए 'युवा' और कम बैगेज वाले चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं और उपचुनावों के लिए मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रचार करने और ग्वालियर को चुनने के पीछे कांग्रेस की एक रणनीति है. कांग्रेस सिंधिया को दिखाना चाहती है कि निष्ठा का फल मिलता है और सचिन पायलट को केवल राजस्थान के चेहरे के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि वह उनके राष्ट्रीय नेता भी होंगे. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में प्रचार के बाद पायलट बिहार चुनाव (Bihar Election) में भी प्रचार करेंगे.

    कांग्रेस सिंधिया को यह ताना भी मारती है कि उन्हें भाजपा के साथ जाने के बाद एक राज्य सभा सीट के अलावा कुछ नहीं मिला. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहता हैं कि राज्यसभा सीट कांग्रेस में रुकने पर उन्हें यहां भी मिल जाती. पायलट और सिंधिया में बुनियादी अंतर है क्योंकि सिंधिया भाजपा के लिए एक पुरस्कार के रूप में आए. वह राहुल गांधी के करीबी थे. उनके जाने के बाद राहुल गांधी ने यह माना भी था कि सिंधिया वह व्यक्ति थे जो बिना किसी अपॉइंटमेंट के मेरे घर आकर मुझसे मिल सकते थे. जब न्यूज 18 ने लगातार सिंधिया से राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ नहीं बोला, लेकिन एक वाक्य कहा और वह था 'मैं चुप रहने की गरिमा में भरोसा रखता हूं.'



    जब सिंधिया ने भाजपा (BJP) में जाने के लिए पार्टी से इस्तीफा दिया, तब उनके साथ 22 विधायक भी चले गए. इसे ग्वालियर के महाराजा की ताकत के रूप में देखा गया. यही कारण है कि सिंधिया के लिए उपचुनावों में डिलीवर करना अहम है क्योंकि वह यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि मैं भाजपा पैन में फ्लैश की तरह नहीं हूं.
    पायलट जब अपने 15 विधायकों के साथ एक पखवाड़े से भी ज्यादा समय तक गायब रहे तब भाजपा के अंदर कई लोगों को हैरानी हुई थी और उन्होंने सोचा कि क्या वह सिंधिया की तरह डिलीवर कर पाएंगे? मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में कांग्रेस के पास संख्या कम नहीं थी इसलिए भाजपा को लग रहा था कि पायलट कुछ और लोगों को तोड़ पाएंगे. ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि गांधी परिवार ने भी सबक सीखा और सिंधिया के मामले में जो गलती की, उसे उन्होंने नहीं दोहराया.

    गांधी परिवार पायलट के टच में रहा और उनका वापस आना सुनिश्चित किया इसलिए पायलट उपमुख्यमंत्री और पीसीसी अध्यक्ष जैसे पद गंवाने के बाद भी गहलोत सरकार (Gahlot Government) में लौट आए. ऐसा आश्वासन दिया गया कि पायलट की मांगों को पूरा किया जाएगा. पायलट के लोगों को समायोजित करने के लिए अभी कैबिनेट विस्तार होना बाकी है. इसके विपरीत सिंधिया अपने कुछ लोगों को शिवराज कैबिनेट (Shivraj Cabinet) में समायोजित कराने में सफल रहे.

    जब पायलट ग्वालियर में प्रचार करेंगे, तो सवाल यह है कि क्या वह सिंधिया पर हमला बोलेंगे? उनका ज्यादा फोकस भाजपा और शिवराज सरकार पर हो सकता है. सूत्रों के अनुसार जब पायलट दिल्ली में थे तब सिंधिया उनके सम्पर्क में थे.

    सिंधिया का कहना रहा है कि कांग्रेस में प्रतिभा को कोई जगह नहीं मिलती. न्यूज 18 से उन्होंने कहा था "मैंने इस तथ्य को स्वीकार किया कि मुझे पीसीसी अध्यक्ष नहीं बनाया गया, किसी और को मुख्यमंत्री बनाया गया. मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में मेरा थोड़ा योगदान था, लेकिन पोस्ट वह नहीं थी जिस पर मेरा हक था." सिंधिया से पायलट के भाजपा में शामिल होने के बारे में पूछा गया, तब उन्होंने जवाब नहीं दिया.

    जहां सिंधिया एक सफल विद्रोही के रूप में उभरे, वहीं पायलट ने अपने विद्रोह में पॉज बटन दबा दिया. दुश्मन के खेमे में शामिल होने से पहले सिंधिया और पायलट अच्छे दोस्त थे इसलिए कांग्रेस इस टकराव को अजीबोगरीब बनाना चाहेगी.
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