कबीर: जिन्होंने कभी धर्म देखकर नहीं की आलोचना, बगैर डरे गलत को गलत कहा

कहते हैं कि बड़े होने पर कबीर रामानंद के शिष्य बने, तो वहीं मुसलामानों का मत है कि कबीर ने मुसलमान फ़क़ीर सूफी शेख तकी से दीक्षा ली थी.

Kabir Jayanti: कबीर के जन्म के संबंध में अनेक कथाएं मिलती हैं, जिनमें से एक है कि स्वामी रामानंद (Swami Ramanand) ने अपने एक शिष्य की विधवा कन्या को भूलवश पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया, जिससे कबीर का जन्म हुआ.

  • Share this:
    (पीयूष द्विवेदी)


    नई दिल्ली. हिंदी साहित्य (Hindi Literature) की हजार वर्षों की परंपरा में सूरदास के अतिरिक्त कबीर और निराला (Nirala) ही ऐसे कवि नजर आते हैं, जो बिना कोई महाकाव्य लिखे भी महाकवि की प्रतिष्ठा रखते हैं. इनमें भी प्रासंगिकता की दृष्टि से विचार करने पर कबीर कहीं आगे नजर आते हैं. कबीर के जन्म और मृत्यु को लेकर अब भी एकदम निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संवत 1456 में कबीर का जन्म और संवत 1575 में 120 साल की अवस्था में मृत्यु माना है. इस हिसाब से कबीर को गुजरे करीब साढ़े चार सौ वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन कबीर की लोकप्रियता और प्रासंगिकता पर काल के इस बहाव का कोई प्रभाव दृष्टिगत नहीं होता बल्कि समय के साथ उनकी प्रासंगिकता बढ़ी ही है.

    कबीर के जन्म के संबंध में अनेक कथाएं मिलती हैं, जिनमें से एक है कि स्वामी रामानंद ने अपने एक शिष्य की विधवा कन्या को भूलवश पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया, जिससे कबीर का जन्म हुआ. तब लोकलाज के मारे वह बालक को बाहर फेंक आई जहां से उन्हें नीरू नाम का जुलाहा उन्हें अपने घर ले आया और उसी के घर कबीर की परवरिश हुई.

    कहते हैं कि बड़े होने पर कबीर रामानंद के शिष्य बने, तो वहीं मुसलमानों का मत है कि कबीर ने मुसलमान फ़क़ीर सूफी शेख तकी से दीक्षा ली थी. इन परस्पर विरोधी बातों के बीच सत्य यही है कि कबीर वैष्णवों के संसर्ग में भी रहे, सूफी संतों की संगत उन्होंने की और रहस्यवादी सिद्धों से भी कोई परहेज नहीं किया. लेकिन कबीर का जो व्यक्तित्व बना है, वो इन सभी सम्प्रदायों, मतों और पंथों की बातों से प्रभावित होते हुए भी स्वतंत्र और मौलिक है.

    यह भी पढ़ें: Kabir Jayanti : क्या है कबीर को मानने वालों का पंथ, ये क्यों कई धाराओं में बंटा

    यूं तो कबीर की वर्तमान प्रासंगिकता के अनेक बिंदु हो सकते हैं. फिर चाहें बाह्य आडम्बरों पर उनकी चोट हो या जाति-धर्म का विरोध अथवा धर्म-मज़हब के नाम पर होने वाले भेदभाव का प्रतिवाद, कबीर की रचनाओं में मौजूद ऐसे अनेक विषय उनकी समकालीन प्रासंगिकता को बढ़ाते हैं. लेकिन कबीर को जो बात उन्हें सबसे ख़ास बनाती है वो ये कि विषय कोई भी हो, वे बिना किसी लाग लपेट के खरे-खरे ढंग से अपनी बात रखते हैं.

    धार्मिक पाखंडों और बाह्य आडम्बरों की आलोचना करते समय वे यह नहीं देखते कि हिंदू की बात हो रही या मुसलमान की, वे निरपेक्ष भाव से गलत को गलत कह जाते हैं. वे एक तरफ यदि ‘पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़’ कहके हिंदुओं की मूर्तिपूजा पर तंज़ करते हैं, तो दूसरी ओर ‘काकर पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय, वा चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय’ कहके इस्लाम के पाखंड पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते.

    यह भी पढ़ें: Kabir Jayanti 2021: संत कबीर जयंती आज, उनके इन दोहों में छिपा है जीवन और संसार का सार

    कबीर का दौर मुसलामानों के शासन का दौर था, लेकिन तब भी हिंसकता पर वे निर्भीक ढंग से चोट करते हुए कहते हैं, ‘दिन को रोजा रहत है, राति हनत है गाय. यहां खून वै वंदगी, क्यों कर खुशी खोदाय. ‘हिंदू-मुसलमान दोनों को समझाते हुए वे कहते हैं, ‘हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना. आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना.’ दरअसल कबीर के समय में जो समाज उनके सामने था, वो अनेक तरह बंटा हुआ था जिसमें एकता लाने के लिए वे इस तरह की रचनाएं गाते थे.

    कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि कबीर अपनी रचनाओं में चयनित विरोध और आलोचना की परिपाटी का अनुकरण नहीं करते. वे निरपेक्ष भाव से सत्य कहते हैं और यह विचार नहीं लाते कि उनके इस सत्य का किसे लाभ मिलेगा और किसे हानि होगी. वे नसीहत भी हिंदू-मुसलमान दोनों को देते हैं. वास्तव में, सत्य कहने का आदर्श ढंग यही है. लेकिन यह दुखद है कि कबीर की साखियां गाने वाले इस देश में आज में चयनित विरोध और आलोचना की एक परिपाटी ही चल पड़ी है.

    बुद्धिजीवियों के अलग-अलग वैचारिक खेमे बन गए हैं जो यदि घटना उनके एजेंडे के अनुकूल है तो विरोध के नामपर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, वहीं घटना यदि एजेंडे के प्रतिकूल है तो खामोशी की चादर ओढ़कर गायब हो जाते हैं. बुद्धिजीवी होने का अर्थ होता है कि आप की बौद्धिक चेतना किसी भी तरह के पूर्वाग्रह और वैचारिक संकीर्णता से मुक्त, बुद्धि और ज्ञान के विस्तृत धरातल पर प्रतिष्ठित हो. बुद्धिजीवियों से अपेक्षा की जाती है कि वे देश को दिशा दिखाएंगे. लेकिन क्या एजेंडे के हिसाब से संचालित इन बुद्धिजीवियों से ऐसी कोई अपेक्षा की जा सकती है.

    कबीर अशिक्षित थे, लेकिन निरपेक्ष भाव से सत्य कहने के ढंग ने उनकी बौद्धिक चेतना को आज के कथित बुद्धिजीवियों से कहीं ऊपर प्रतिष्ठित कर दिया है. यदि वे मुसलामानों के शासन से घबराकर उनकी आलोचना से पीछे हट जाते और केवल हिंदुओं की आलोचना करते तो क्या उनकी रचनाओं में अभी जैसी बात आ पाती और क्या उन्हें आज जैसी प्रतिष्ठा ही प्राप्त होती ? यक़ीनन नहीं. लेकिन कबीर ने चयनित विरोध का मार्ग नहीं चुना और उनके निरपेक्ष चिंतन से जो भी उन्हें सही-गलत लगा उन्होंने निर्भीक भाव से कहा, यही कारण है कि आज शताब्दियां गुजरने के बाद भी वे कालजयी बने हुए हैं.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.