कैलाश सत्‍यार्थी ने बाल मजदूरों की मुक्ति के लिए जनजागरुकता यात्राओं को बनाया कारगर हथियार

कैलाश सत्यार्थी (फाइल फोटो, AFP)

श्री कैलाश सत्‍यार्थी (Kailash Satyarthi) के विचारों और कार्यों पर अगर हम गौर करें तो पता चलता है कि वे भी बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग की समस्‍या का समाधान करने के लिए लोगों के बीच पहुंचकर उन्‍हें जागरूक करते रहे हैं.

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    (पंकज चौधरी)
    नई दिल्ली.
    प्राचीनकाल से ही यात्राओं का इतिहास मिलता है. आवागमन और संचार के जब कोई साधन नहीं थे तब लोग ज्ञान-विज्ञान की तलाश और प्रचार-प्रसार के लिए पदयात्राएं किया करते थे. साहसी लोगों ने हजारों किलोमीटर की बीहड़, जोखिमभरी पदयात्राएं करके दुनिया की महान सभ्‍यताओं को खोज निकाला. आवागमन और संचार तकनीक के इतने विकसित होने के बावजूद आज भी यदि पदयात्राओं को प्राथमिकता दी जाती है तो उसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि लोगों से सीधे-सीधे अपने को कनेक्‍ट किया जाए. भारत का तो इतिहास रहा है कि यहां जन-नायकों ने पदयात्राएं करके सामाजिक और राजनीतिक बदलाव किए हैं.

    यह अकारण नहीं है कि महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने भारत को स्‍वतंत्र करने और लोगों में स्‍वतंत्रता की चेतना को जागृत करने के लिए जन-जन तक पहुंचना जरूरी समझा. इसके लिए उन्‍होंने पदयात्रा को सबसे मुफीद माध्‍यम माना. उन्होंने अनेक बार लंबी-लंबी पदयात्राएं की. गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत से भारत को आजादी तो दिला दी, लेकिन उसका बचपन गुलाम रह गया. बाल मजदूरी (Child Labour) के रूप में यह गुलामी आज भारत सहित पूरी दुनिया में जिंदा है. आजाद बचपन की बहाली के लिए जरूरी है कि सबसे पहले लोगों को बाल मजदूरी की बुराईयों के प्रति आगाह और जागरूक किया जाए. नोबेल शांति पुरस्‍कार (Noble Peace Prize) से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी ने इस तथ्‍य को बखूबी समझा और उन्‍होंने जनजागरुकता के लिए यात्राओं का सहारा लिया एवं दुनियाभर की यात्रा कर डाली.

    सत्‍यार्थी के विचारों और कार्यों पर अगर हम गौर करें तो पता चलता है कि वे भी बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग की समस्‍या का समाधान करने के लिए लोगों के बीच पहुंचकर उन्‍हें जागरूक करते रहे हैं.

    भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्‍न जातियां, भाषा, धर्म आदि के लोग रहते हैं एवं सभी के हित एक दूसरे से टकराते हैं. किसी के हित एक दूसरे से नहीं टकराएं और सब एक कॉमन मुद्दे पर एक साथ आएं इसके लिए उनको जागरूक करना जरूरी होता है. हरेक गांव, गली, मुहल्‍ला, सड़क, चौराहे पर पहुंचना जरूरी होता है और जिसमें पदयात्रा ही एक ऐसा माध्‍यम है जो बड़ी भूमिका निभा सकती है. श्री सत्यार्थी का मानना है कि जब तक जनता को बाल मजदूरी के खिलाफ जागरूक नहीं किया जाएगा तब तक देश और दुनिया से बाल मजदूरी खत्म नहीं की जा सकती है. सत्यार्थी ने लोगों तक पहुंचने के लिए इसी दृष्टिकोण से यात्राओं को अपना कारगर हथियार बनाया.

    लोकतंत्र में अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए दबाव की रणनीति का सहारा भी लेना पड़ता है. वह दबाव चाहे वोट के जरिए हो या आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के जरिए. बच्‍चे चूंकि वोट बैंक नहीं होते हैं, इसीलिए सरकारें और राजनीतिक पार्टियां उनकी ओर से उदासीन होती हैं. सत्‍यार्थी के नेतृत्‍व में आयोजित यात्राओं को जब हम देखते हैं तो पाते है कि उसमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया और सरकारों पर उनका परोक्ष और प्रत्‍यक्ष तरीके से दबाव बना. ऐसे में सरकारों ने बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग को दूर करने के लिए कानून बनाए.

    मौजूदा निष्‍प्रभावी कानूनों में संशोधन किए और कानूनों के कार्यान्‍वयन को सरकारी मशीनरी को हरकत में लाने के लिए सक्रिय हुआ. इस दृष्टिकोण से श्री सत्‍यार्थी के नेतृत्‍व में आयोजित लगभग सभी यात्राएं महत्‍वपूर्ण हैं. ग्‍लोबल मार्च अगेंस्‍ट चाइल्‍ड लेबर और भारत यात्रा उसके प्रत्‍यक्ष प्रमाण हैं. दोनों यात्राओं के परिणामस्वरूप बच्चों के हक में कई कानूनी और नीतिगत बदलाव हुए. श्री सत्यार्थी ने बाल श्रम और बच्चों के शोषण के खिलाफ करीब दर्जन भर छोटी-बड़ी जनजागरुकता यात्राएं आयोजित की है.

    सत्यार्थी ने पूरी दुनिया से बाल मजदूरी को खत्‍म करने के ख्‍याल से 17 जनवरी 1998 में 'ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर' नाम से बाल श्रम के खिलाफ विश्व यात्रा का आयोजन किया. श्री सत्यार्थी का यह एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम था. जिससे पूरी दुनिया में एक बड़ा बदलाव हुआ और बाल श्रम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानून बना. इस मार्च के माध्यम से बाल श्रम को खत्‍म करने के लिए 70 लाख से अधिक लोग गोलबंद हुए. तब इस यात्रा ने एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, यूरोप सहित 103 देशों से गुजरते हुए 80,000 से अधिक किलोमीटर की दूरी तय की थी. इस यात्रा में 100 से अधिक देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजा-रानी, राजनयिक आदि शामिल हुए. लगभग पांच महीने तक चली इस यात्रा ने बाल श्रम के खिलाफ पूरी दुनिया में एक माहौल बनाने का काम किया. इस यात्रा का समापन अंतर्राष्‍ट्रीय श्रम संगठन के जिनेवा स्थित मुख्यालय पर 6 जून 1998 को हुआ.

    इसी ग्‍लोबल मार्च अगेंस्‍ट चाइल्‍ड लेबर के परिणामस्‍वरूप अंतर्राष्‍ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization) ने 1999 में आईएलओ कनवेंशन-182 पारित किया. कन्‍वेंशन-182 बदतर प्रकार की बाल मजदूरी, बाल दासता, वेश्यावृत्ति और युद्ध व आपराधिक कामों में 18 साल तक के बच्चों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करता है. इस कानून को अनुमोदित करने वाले देशों ने जबसे इसे अपने यहां लागू किया है बाल मजदूरों की संख्‍या में अप्रत्‍याशित कमी आई है. आईएलओ के अनुसार आज पूरी दुनिया में बाल मजदूरों की संख्‍या घटकर करीब 15 करोड़ रह गई है. जबकि ग्‍लोबल मार्च अगेंस्‍ट चाइल्‍ड लेबर की शुरुआत करने से पहले बाल मजदूरों की संख्‍या 26 करोड़ से अधिक थी. इस मार्च के परिणामस्‍वरूप कई देशों ने अपने यहां बच्चों के हक में कई अतिरिक्‍त कानून भी बनाए.

    सत्‍यार्थी ने भारत में ट्रैफिकिंग और बाल यौन शोषण के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए 11 सितंबर 2017 से 16 अक्‍टूबर 2017 तक देशव्‍यापी 'भारत यात्रा' का आयोजन किया. यह यात्रा कन्‍याकुमारी के विवेकानंद शिला स्‍मारक से शुरू होकर दिल्‍ली के राष्‍ट्रपति भवन तक चली. देशभर में चली इस यात्रा के जरिए लाखों लोगों को जागरूक किया गया और सत्‍यार्थी ने भारत यात्रा को सामाजिक ओर सांस्‍कृतिक आंदोलन की संज्ञा दी. 35 दिनों तक चली यह यात्रा 23 राज्यों से गुजरते हुए 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर दिल्ली में समाप्त हुई थी. इस यात्रा में करीब 14 लाख लोग सत्यार्थी के साथ सड़कों पर उतरे. यात्रा में सिविल सोसायटी, राजनेताओं, धर्मगुरुओं, कानून निर्माताओं और शिक्षक युनियनों ने भाग लिया. बच्‍चों के सवाल को लेकर इसे भारत का सबसे बड़ा जन-आंदोलन बताया गया. दिल्‍ली के राष्‍ट्रपति भवन में इस यात्रा का समापन राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ramnath Kovind) ने किया. भारत यात्रा की मांगों और जनमानस का सरकारों पर दबाव बना.

    राज्य सरकारों ने बच्चों के यौन शोषण और बलात्कार के खिलाफ मौजूदा कानूनों में संशोधन कर उसे और सख्त बनाया. बाद में केंद्र सरकार ने भी ऐसा ही किया. वही केंद्र सरकार ने लोकसभा में 'ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रीवेंशन, प्रोटेक्‍शन एंड रीहैबिलिटेशन) बिल, 2018' पेश कर दिया. लेकिन दुखद यह रहा कि लोकसभा में पारित होने के बाद यह बिल राज्यसभा में पेश नहीं हो पाया. जिससे इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सका.

    कैलाश सत्‍यार्थी द्वारा आयोजित यात्राओं का एक फायदा यह भी हुआ कि बाल मजदूरी राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर एक बड़ा मुद्दा बना. इस पर संसद से सड़क तक विचार-विमर्श शुरू हुआ. इस दृष्टिकोण से उन्‍होंने बाल श्रम के खिलाफ पहली यात्रा झारखंड के नगर उटारी से 01 फरवरी से 15 फरवरी 1993 तक आयोजित की. दूसरी यात्रा 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक आयोजित की. तीसरी यात्रा 'शिक्षा यात्रा' के नाम से 2001 में निकाली गई. इस यात्रा का मुख्‍य मकसद शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाना था. यात्रा के जरिए पक्ष-विपक्ष के सासंदों को लमबद किया गया. लिहाजा, यह यात्रा अपने मकसद में कामयाब हुई और शिक्षा का अधिकार कानून बना.

    बाल श्रम के खिलाफ दक्षिण एशियाई यात्रा थी, जो 2007 में आयोजित की गई और इसका मकसद ट्रैफिकिंग के जरिए होने वाली जबरिया बाल मजदूरी पर रोक लगाना था. इस यात्रा के जरिए 5000 किलोमीटर की दूरी तय की गई. यात्रा कोलकाता से प्रारंभ होकर काठमांडू पहुंची, फिर काठमांडू से दिल्ली. नेपाल यात्रा 2009 में नेपाल में आयोजित की गई. यात्रा का मकसद वहां शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाना था. सत्यार्थी ने 2012 में असम चाइल्ड लेबर एंड ट्रैफिकिंग मार्च का आयोजन किया.

    इस तरह हम देखते हैं कि कैलाश सत्‍यार्थी के नेतृत्‍व में समय-समय पर आयोजित यात्राओं ने एक ओर जहां लोगों को बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग के खिलाफ जागरूक करने का काम किया, वहीं सरकारों पर कानून बनाने के लिए दबाव बनाया. यात्राओं में विभिन्‍न जातियों, धर्मों, वर्गों, क्षेत्रों और समुदायों के लोगों ने शामिल होकर बाल अत्‍याचार को रोकने की दिशा में एक आम सहमति बनाई. सत्यार्थी की जनजागरुकता यात्राओं ने लाखों बच्‍चों के चेहरों पर मुस्‍कान लाने का काम किया है. (लेखक युवा कवि हैं)

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