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कैराना उपचुनाव: क्या सच में जाटों ने RLD गठबंधन को वोट दिया?

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: June 1, 2018, 1:15 PM IST
कैराना उपचुनाव: क्या सच में जाटों ने RLD गठबंधन को वोट दिया?
क्या सच में जाटों ने RLD गठबंधन को वोट दिया ? (फ़ाइल फोटो)

बीजेपी के कोर वोट बैंक राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और गैर जाट ओबीसी में सैनी-प्रजापति अगर अपने 100% वोट डाल भी देते तो भी मृगांका 4 लाख तक नहीं पहुंच पाती.

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यूपी की कैराना लोकसभा सीट पर महागठबंधन समर्थित आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह को 44,618 वोटों से हरा दिया है. 2014 लोकसभा चुनावों में आरएलडी को एक भी सीट नहीं मिली थी ऐसे में तब्बसुम पार्टी की एकमात्र प्रतिनिधि तो हैं ही साथ ही यूपी की तरफ से एकमात्र मुस्लिम सांसद भी बन गई हैं. इस जीत के लिए कैराना में सपा, बसपा, आरएलडी ने अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई थी और अब ऐसा दावा किया जा रहा है कि जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण से ये जीत हासिल की गई है. हालांकि सिर्फ 58% वोटिंग के बाद आरएलडी का ये दावा कि पार्टी ने जाट वोट बैंक हासिल कर लिया है कई सवाल खड़े कर रहा है.

RLD से अभी भी दूर ही हैं जाट!
कैराना की जीत के बाद आरएलडी के युवराज ये दावा करते नज़र आए कि 'जिन्ना पर गन्ना' भारी पड़ गया है. हालांकि कैराना सीट के वोटिंग पैटर्न और इतिहास पर नज़र डालें तो ये 44 हज़ार वोटों की जीत पश्चिमी यूपी में महागठबंधन के लिए ही परेशानियां बढ़ाने वाली नज़र आती हैं. साल 2004 के लोकसभा चुनावों से इस पूरे वोटिंग पैटर्न को देखने से बात कुछ-कुछ समझ में आती है. 2004 के लोकसभा चुनावों तक जाट वोटबैंक का बड़ा हिस्सा आरएलडी के खाते में ही था और इन चुनावों में इस सीट पर 66% वोटिंग हुई थी. आरएलडी की तरफ से अनुराधा चौधरी मैदान में थी और उन्होंने बीएसपी के शाहनवाज़ को 3 लाख 42 हज़ार वोटों से शिकस्त दी थी.



2009 लोकसभा चुनावों की बात करें तो उन चुनावों में भी तब्बसुम हसन ने बीएसपी के टिकट जीत हासिल की थी लेकिन तब आरएलडी एनडीए में थी और उसके सपोर्ट से हुकुम सिंह ने बीजेपी के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा था. दलित-मुस्लिम समीकरण से तब्बसुम जीती तो थीं लेकिन हुकुम सिंह ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. जीत का अंतर 13 हज़ार से भी कम रहा था. इन चुनावों में भी वोटिंग टर्नआउट 58% के आस-पास था और 7 बार कैराना विधानसभा से विधायक रहे हुकुम सिंह का जाटों ने खुलकर सपोर्ट किया था. ये ही वो साल था जब आरएलडी ने अपना जाट वोट बैंक सफलतापूर्वक बीजेपी को ट्रांसफर कर दिया.

2011 में आरएलडी ने यूपीए का हाथ थाम लिया और जाटों के एक बड़े हिस्से ने बीजेपी को वोट देकर खुद को ठगा हुआ महसूस किया. 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों ने इलाके में जाट बनाम मुस्लिम का समीकरण पैदा कर दिया और गन्ना किसान यूनियन तक ख़त्म हो गई. 'अजगर' से 'मजगर' पर शिफ्ट हुई आरएलडी के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि जाट वोटबैंक अब बीजेपी की तरफ खिसक गया था और मुसलमान भी सपा के खाते में जाता हुए दिखाई दे रहा था. 2014 के लोकसभा चुनावों में इसका असर भी देखने को मिला और अजीत सिंह अपनी पैतृक सीट बागपत से ही हार गए. कैराना की बात करें तो यहां रिकॉर्ड 73% वोटिंग हुई. जाटों ने आरएलडी को नकार दिया और पार्टी यहां चौथे नंबर पर खिसक गई. बीजेपी के हुकुम सिंह ने सपा के नाहिद हसन को 2 लाख 36 हज़ार वोटों से हरा दिया. तीसरे पर बसपा से कंवर हसन रहे जबकि आरएलडी के करतार सिंह भड़ाना को सिर्फ 42 हज़ार वोट मिले थे.

क्या है कैराना का जातीय समीकरण

कुल वोटर : 16,12989

(अनुमानित)
मुसलमान : 5.5 लाख
दलित : 2 लाख
पिछड़ी जाति (जाट, सैनी, प्रजापति, कश्यप): 4 लाख
गुर्जर : 1 लाख तीस हज़ार
राजपूत: 75 हजार
ब्राह्मण: 60 हजार
वैश्य: 55 हजार

सिर्फ 58% वोटिंग से ये साफ़ है कि लोगों ने 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस उपचुनाव को तवज्जो नहीं दी. कांग्रेस, बसपा, सपा और आरएलडी के साथ आने से मुसलमानों का 5 लाख से ज्यादा वोट, दलित के 2 लाख वोट, जाटों के 1 लाख 70 हज़ार और गैर ओबीसी जाटों के ढाई लाख वोटों का एक हिस्सा तबस्सुम के पक्ष में आएगा इसका अनुमान लगाया गया था.

बीजेपी और महागठबंधन के बीच लड़ाई प्रमुख रूप से जाट और गैर जाट ओबीसी वोटों के लिए ही थी. तबस्सुम को 481182 वोट मिले हैं जबकि बीजेपी की मृगांका सिंह को 436564 वोट मिले हैं. बीजेपी के कोर वोट बैंक राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और गैर जाट ओबीसी में सैनी-प्रजापति अगर अपने 100% वोट डाल भी देते तो भी मृगांका 4 लाख तक नहीं पहुंच पाती. इससे सपष्ट है कि सिर्फ 58% वोटिंग में जाटों के एक बड़े हिस्से और ओबीसी-दलित के छोटे ही सही पर एक हिस्से ने भी बीजेपी को वोट दिया है.



बीजेपी नहीं महागठबंधन के लिए भी है रेड अलर्ट
ज्यादातर जानकार इस बात पर सहमत नज़र आ रहे हैं कि गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना-नूरपुर की हार बीजेपी के लिए अच्छा मैसेज नहीं है. लेकिन कैराना उपचुनाव के वोट शेयर को देखा जाए तो बीजेपी इस बात से आश्वस्त हो जाएगी कि इलाके ने जाट अब भी उससे पूरी तरह नहीं रूठे हैं. गन्ना किसानों के बकाया के मुद्दे को लेकर लोगों में नाराजगी ज़रूर है लेकिन वो अभी भी वोटिंग से जाहिर नहीं हुई है.

उधर महागठबंधन के लिए कैराना उपचुनाव ये संदेश लेकर आया है कि सिर्फ गठबंधन करने और वोटबैंक का अंदाज़ा लगाकर खुश हो आजे की जगह ज़मीन पर काम करने की ज़रुरत बनी हुई है. जयंत-अजीत सिंह के कैराना में लगातार जाटों को फोकस कर रैली और जन सभाएं करने और सपा-बसपा-कांग्रेस के सपोर्ट के बावजूद भी अगर बीजेपी की हार का अंतर सिर्फ 44 हज़ार है तो 2019 में पश्चिमी यूपी की चुनौती काफी बड़ी होने वाली है.

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First published: June 1, 2018, 12:49 PM IST
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