कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे पिता, बड़े होकर इन बेटों ने उन्हीं की रेजीमेंट जॉइन की

नायक सूबेदार सुरजीत सिंह के बेटे सिपाही अमरप्रीत सिंह, नायक सूबेदार रावल सिंह के पुत्र सिपाही बख्तावर सिंह और नायक बचन कुमार के पुत्र लेफ्टिनेंट हितेश कुमार के सेना में भर्ती होने के फैसले को उनकी माताओं ने भी समर्थन दिया.

News18Hindi
Updated: July 27, 2019, 10:34 PM IST
कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे पिता, बड़े होकर इन बेटों ने उन्हीं की रेजीमेंट जॉइन की
कारगिल युद्ध में अपने पिता की वीरगाथा का कुछ बेटों पर ऐसा असर हुआ कि वे अब सेना की उसी रेजीमेंट में हैं, जिनमें उनके पिता थे.
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Updated: July 27, 2019, 10:34 PM IST
कारगिल युद्ध में शहीद हुए तीन सैनिकों के बेटे अपनी मां से पिता की वीरगाथाएं सुनकर बड़े हुए. अपने पिता की वीरगाथा का असर कुछ ऐसा हुआ कि वे अब सेना की उसी रेजीमेंट में भर्ती हो गए, जिनमें उनके पिता थे. नायक सूबेदार सुरजीत सिंह के बेटे सिपाही अमरप्रीत सिंह, नायक सूबेदार रावल सिंह के पुत्र सिपाही बख्तावर सिंह और नायक बचन कुमार के पुत्र लेफ्टिनेंट हितेश कुमार के सेना में भर्ती होने के फैसले को उनकी माताओं ने भी समर्थन दिया.

शनिवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में विजय दिवस की याद में हुए समारोह में भी इन नौजवानों की कहानियां सुनाई गईं. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा आर्मी चीज जनरल विपिन रावत भी मौजूद रहे.

कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे 527 सैनिक
भारतीय सेना ने 1999 के मई महीने में कारगिल की कई पहाड़ियों की चोटियों पर कब्जा किए बैठे पाकिस्तानी घुसैपैठियों को खदेड़ने के लिए आपरेशन विजय चलाया था. इन चोटियों से श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर आसानी से नजर रखी जा सकती है. अमरप्रीत, बख्तावर और हितेश के पिता उन 527 सैनिकों में शामिल हैं, जिन्होंने दो महीने तक हाड़कंपा देने वाली सर्दी में चले इस युद्ध में देश की रक्षा करते हुये अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे. इस युद्ध से जुड़ी विभिन्न घटनाओं में 1,363 सैनिक घायल हुए थे.

पिता की शहदात के समय 10 साल के थे सिपाही अमरप्रीत सिंह
पंजाब के मावा गांव के अमरप्रीत उस समय केवल 10 साल के थे, जब उन्होंने इस युद्ध में अपने पिता को खो दिया था. उनकी मां अमरजीत कौर ने कहा कि वह हमेशा सेना में शामिल होना चाहता था. उन्होंने बताया कि जब उनके पति ने 1999 में मीडियम आर्टिलरी रेजिमेंट में द्रास सेक्टर में शहादत दी, तो मेरा बेटा सिर्फ 10 साल का था. वह शुरुआत से ही सेना में शामिल होने का इच्छुक था. मैंने उनका समर्थन किया. मुझे उसके फैसले पर गर्व है. अमरप्रीत मई, 2018 में अपने पिता की रेजिमेंट में शामिल हुए. इस समय वह लेह में तैनात हैं.

सिपाही बख्तावर की मां ने किया बेटे के सेना में भर्ती होने का समर्थन
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सिपाही बख्तावर की मां सुरिंदर कौर ने कहा कि मैंने अपने बेटे के सेना में शामिल होने के फैसले का हमेशा समर्थन किया. जम्मू के माखनपुर गांव के रहने वाले बख्तावर उस समय केवल 9 साल के थे, जब उनके पिता नायक सूबेदार रावल सिंह टाइगर हिल पर दुश्मन से लड़ते हुए शहीद हो गए. कारगिल में सेवा दे चुके बख्तावर को परिवार के अन्य सदस्यों ने भी सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने याद करते हुये बताया कि कारगिल युद्ध में लड़े उनके चाचा ने भी अपनी बहादुरी के किस्से सुनाकर मुझे प्रोत्साहित किया.

लेफ्टिनेंट हितेश ने छह साल की उम्र में ही कर लिया था फैसला
लेफ्टिनेंट हितेश कुमार के पिता राजपूताना राइफल्स की दूसरी बटालियन में लांस नायक बचन सिंह 12 जून, 1999 को तोलोलिंग में लड़ते हुए शहीद हुए. उनकी मां कमलेश बाला ने बताया कि हितेश तब केवल छह साल के थे. उन्होंने भी अपने पिता की मृत्यु के बाद सेना में शामिल होने का फैसला किया. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने युवा सैनिकों को अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने के लिए उनकी प्रशंसा की.

उन्होंने कहा, बहुत सी महिलाओं में अपने बच्चों का इस तरह के करियर चयन का समर्थन करने का साहस नहीं होता हैं, जो एक बार उनके पति को उनसे हमेशा के लिए दूर कर चुका है. करगिल युद्ध को 26 जुलाई, 1999 को उस समय समाप्त घोषित कर दिया गया था, जब भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे धकेल दिया था. इस दिन को भारत की जीत के उपलक्ष्य में 'कारगिल विजय दिवस' के रूप में मनाया जाता है.

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First published: July 27, 2019, 8:32 PM IST
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