कर्नाटक चुनावः 'किसान पिता' के लिए US की कंपनी छोड़ देश लौटा इंजीनियर

विदेश में दर्शन की जिंदगी और चुनाव लड़ने का फैसला करने के बाद जो जिंदगी उनका इंतजार कर रही है उन दोनों में काफी अंतर है. उनके साथ उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे भी कर्नाटक में शिफ्ट होंगे.

News18Hindi
Updated: April 17, 2018, 7:23 AM IST
कर्नाटक चुनावः 'किसान पिता' के लिए US की कंपनी छोड़ देश लौटा इंजीनियर
दर्शन ने यूएस में अपनी एक कंपनी शुरू की थी जिसे छोड़ अब वह कर्नाटक में चुनाव लड़ेंगे.
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Updated: April 17, 2018, 7:23 AM IST
रेवती राजीवन

पिछले साल फरवरी में कर्नाटक के मेलुकोटे विधायक केएस पुत्तनैया की 68 की उम्र में कार्डिएक अरेस्ट से मौत हो गई थी. उनकी मौत पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि किसान आंदोलन ने अपना बड़ा नेता खो दिया, एक ऐसा नेता जो जमीनी हकीकत को जानता और समझता था. अब जब चुनाव में उनकी जगह लेने की बारी आई तो समर्थकों ने एक मत से उनके बेटे दर्शन पुत्तनैया को चुना.

दर्शन 15 सालों पर कर्नाटक में वापस सेटल होने की योजना बना रहे हैं. अब तक यूएस के डेनवर में रह रहे दर्शन ने वहां अपनी एक कंपनी भी खोली थी. वह कहते हैं, 'मेरे राजनीति में आने को लेकर हमारे बीच कभी चर्चा नहीं हुई. अगर मेरी ऐसी कोई योजना होती तो शायद दुनिया के किसी और कोने में मैं पूरी तरह सेटल नहीं हुआ होता.'

कांग्रेस ने 218 उम्मीदवारों की सूची रविवार को जारी की है. हालांकि कांग्रेस ने 5 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं की है. इनमें से एक सीट मेलुकोटे है. सूत्रों ने इस सीट को लेकर सारी जानकारी दे दी है लेकिन दर्शन की राजनीति में एंट्री की पुष्टि नहीं की है.

दर्शन के पिता मांड्या के मेलुकोटे से विधायक थे. वह कर्नाटक सर्वोदय पार्टी के नेता थे. केएस पुत्तनैया के राजनीतिक करियर की शुरुआत कर्नाटक राज्य रैठा संघ नाम की एक किसानों की संस्था से हुई थी. यह संस्था अब योगेंद्र यादव की स्वराज इंडिया पार्टी में मर्ज हो गई है.

साल 2013 में पुत्तनैया स्वराज इंडिया के पहले और एकमात्र विधायक बने. इस चुनाव में मेलुकोटे सीट पर जितने वोट पड़े थे उसके करीब 50 प्रतिशत वोट पुत्तनैया को मिले थे. उन्होंने जेडीएस के उम्मीदवार सीएस पुत्ताराजु को 9000 वोटों के मार्जिन से हराया था. 2008 के चुनाव में पुत्तराजू ने पुत्तनैया को इसी सीट पर हराया था.

जब दर्शन से पूछा गया कि एक बड़े नेता का बेटा होने से चुनाव जीतना उनके लिए आसान होगा या मुश्किल? तो 40 वर्षीय दर्शन कहते हैं, 'उनका बेटा होने की वजह से मेरे लिए शुरुआत करना आसान है. लेकिन मुझे सिस्टम में रहते हुए काम करना होगा. मेरे पिता हमेशा अपने उसूलों पर टिके रहे जो कि आसान नहीं है. लेकिन मैं उनके नक्शेकदम पर चलने की कोशिश करूंगा.'

विदेश में दर्शन की जिंदगी और चुनाव लड़ने का फैसला करने के बाद जो जिंदगी उनका इंतजार कर रही है उन दोनों में काफी अंतर है. उनके साथ उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे भी कर्नाटक में शिफ्ट होंगे.

वह कहते हैं, "मुझे हमेशा से ही कर्नाटक राज्य रैठा संघ की सक्रियता ने आकर्षित किया है- वे किसानों के लिए लड़ते हैं. मेरे पिता ने मुझसे कभी भी राजनीति में आने के लिए नहीं कहा. उन्होंने कहा कि जो अच्छा लगता है वो करो. मैं तो KRRS का पदाधिकारी भी नहीं हूं. लेकिन जब मेरे पिता का देहांत हुआ तो क्षेत्र के लोगों ने मुझसे चुनाव लड़ने के लिए कहा और इसीलिये मैं राजनीति में आने का फैसला किया. मैं तो यहां रहता भी नहीं था, बस कुछ दिनों के लिए आता है."

दर्शन ने मैसूर यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग और कनाडा से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. वह 2002 में भारत से चले गए थे. लेकिन कर्नाटक चुनाव उनके लिए नया नहीं है. पिछले चुनाव में उन्होंने अपने पिता के लिए प्रचार किया था. अब वह क्षेत्र के लिए अपने पिता के विज़न को आगे लेकर जाना चाहते हैं. वह जल संकट का समाधान करना चाहते हैं और किसानों को उनकी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाना चाहते हैं.

कावेरी जल विवाद पर बात करते हुए दर्शन इसके लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराने से इनकार करते हैं. वह कहते हैं, "इसके लिए द्विपक्षीय बातचीत होनी चाहिए. वे (तमिलनाडु की जनता) भारतीय हैं, किसान हैं और हम भी वही हैं. हमें एक ऐसे समाधान के बारे में सोचना होगा जो दोनों के लिए फायदेमंद हो."
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