कर्नाटक चुनावः अपने प्रचार में सिद्धारमैया ने तीन महीने में खर्चे जनता के 56 करोड़ रुपये

कर्नाटक सरकार ने 2017-18 के बजट में सूचना और जनसंपर्क विभाग को 280 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि सरकार 2017-18 में अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए 123 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

News18.com
Updated: April 16, 2018, 11:05 PM IST
कर्नाटक चुनावः अपने प्रचार में सिद्धारमैया ने तीन महीने में खर्चे जनता के 56 करोड़ रुपये
सिद्धारमैया
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Updated: April 16, 2018, 11:05 PM IST
कर्नाटक चुनावों से पहले सिद्धारमैया सरकार ने अपनी उपलब्धियां गिनाने और वोट बैंक तैयार करने के मकसद से पिछले तीन महीने में 56 करोड़ रुपये खर्च कर दिए. दरअसल सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत यह जानकारी सामने आई है, जिसमें पता चला कि ये पैसे विधानसभा चुनाव के पहले सूचना विभाग द्वारा होर्डिंग्स पर खर्च किए गए, जिसे बसों, मेट्रो रेल के खंभों, ऑटो रिक्शा आदि सभी जगहों पर लगाए गए.

जनता के इस पैसे को सीएम सिद्धारमैया और केजे जॉर्ज, एमबी पाटिल जैसे उनके मंत्रियों के काम को गिनाने के लिए खर्च किए गए. होर्डिंग्स और बिलबोर्ड्स के अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म, टीवी चैनल पर भी विज्ञापन दिए गए, जिसके लिए अलग से फंड आवंटित किया गया.

इन विज्ञापनों को आचार संहिता लागू होने से पहले एक दिसंबर से 20 मार्च के बीच लगाया गया और हर दिन करीब एक करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें मुख्यमंत्री के 5 साल की उपलब्धियों को गिनाया गया.

कर्नाटक सरकार ने 2017-18 के बजट में सूचना और जनसंपर्क विभाग को 280 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि सरकार 2017-18 में अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए 123 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

कर्नाटक सरकार के इस फैसले को भाजपा ने जनता के पैसे की बर्बादी बताया. बीजेपी प्रवक्ता एस. प्रकाश ने कहा कि लोगों के पैसे को उन योजनाओं के प्रचार के लिए खर्च किया गया जो अब तक लागू भी नहीं किए गए हैं. इस सरकार ने प्रचार के लिए 600 करोड़ से ज्यादा का खर्च किया है. जनता को नहीं कांग्रेस पार्टी को ये खर्च उठाना चाहिए.

बीजेपी ने जब इस पर सवाल उठाया तो ग्रेस सांसद सईद नासिर हुसैन ने कहा कि यह बजट पूरे साल के लिए आवंटित किया जाता है. जब तक यह सीमा से अधिक नहीं होता, तब तक इसमें कोई गड़बड़ नहीं. यह कांग्रेस या आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है.

कांग्रेस यहां भले अपने बचाव में कोई भी दलील दे रही हो, लेकिन पहले साढ़े चार सालों और पिछले तीन महीनों में प्रचार अभियान पर किए गए खर्च के अंतर से ये सवाल जरूर उठता है कि सिद्धारमैया सरकार ये सब 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए ही कर रही है.

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