OPINION। निधन के बाद तमिनलाडु की राजनीति में कितने प्रासंगिक रहेंगे करुणानिधि ?

द्रविड मानसिकता का कमजोर होना डीएमके और एआईएडीएमके को भी कमजोर बनाएगा. हालांकि द्रविड के शीर्ष नेता अब भी खुद को नास्तिक कहते हैं लेकिन राजनीति से अलग उनके परिवार के सदस्य गुपचुप तरीके से मंदिरों में जाते देखे जाते हैं.

News18India
Updated: August 8, 2018, 11:48 PM IST
OPINION। निधन के बाद तमिनलाडु की राजनीति में कितने प्रासंगिक रहेंगे करुणानिधि ?
द्रविड मानसिकता का कमजोर होना डीएमके और एआईएडीएमके को भी कमजोर बनाएगा. हालांकि द्रविड के शीर्ष नेता अब भी खुद को नास्तिक कहते हैं लेकिन राजनीति से अलग उनके परिवार के सदस्य गुपचुप तरीके से मंदिरों में जाते देखे जाते हैं.
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Updated: August 8, 2018, 11:48 PM IST
(टीएस सुधीर)

क्या निधन के बाद भी एम करुणानिधि को राजनीतिक ताकत माना जा सकता है? पलानीस्वामी द्वारा मरीना बीच में मेंटौर अन्नादुरई के बगल में दफनाने के लिए करुणानिधि को स्थान न देने से तो यहीं लगता है. एआईएडीएमके सरकार द्वारा पांच बार के मुख्यमंत्री और 70 साल से तमिनलनाडु की राजनीति को प्रभावित करने वाले करुणानिधि के अंतिम संस्कार के लिए जगह देने को लेकर ढीठ रवैया दिखाने की पीछे की एक मात्र वजह यह हो सकती है.

डीएमके अपने नेता के अंतिम संस्कार के लिए मरीना बीच पर स्थान चाहती थी जबकि एआईडीएमके ने गांधी मंडपम की पेशकश की जो तुलनात्मक रूप से कम सार्वजनिक है. इसके पीछे की वजह क्या थी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हो सकता है कि यह करुणानिधि को अन्नादुरई के पास नहीं दफनाने देने की कोशिश थी. यह इस बात की घोषणा करने का तरीका भी था कि करुणानिधि अपनी उपलब्धियों के बाद भी अन्नादुरई, एमजीआर और जयललिता की लीग में नहीं थे.

वास्तविक कारण यह था कि मरीना बीच पर अपनी समाधि द्वारा करुणानिधि सार्वजनिक स्मृति में रहेंगे और वह डीएमके के लिए लोगों में ऊर्जा भरने में अब भी उतने ही सक्षम होंगे जितना कि तब, जब वह जिंदा था. पलानीस्वामी की कोशिश करुणानिधि की विरासत को कम करके उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री के जैसा सम्मान देने का था. जबकि वह भूल गए कि करुणानिधि कवि, नाटककार और महान कहानीकार के रुप में प्रत्षिठत हैं.

करुणानिधि सदैव एक न्यूजमेकर रहे, मुश्किल सवालों के जवाब वे मजाकिया और वन लाइनर में देते थे. यह एक विडंबना है कि कभी न मरने वाले नेता निधन के बाद भी खबरें बनाते हैं.

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कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की राजनीति करुणानिधि के बाद बदल जाएगी. जिस तरह से करुणानिधि ने द्रविड राजनीति कि उसे देखते हुए 2018 डीएमके के लिए काफी मुश्किल होने वाला है. ऐसा इसलिए क्योंकि एक विचारधारा के रुप में द्र’विड राजनीति’ दम तोड़ती दिख रही है. कभी मूर्तिपूजा का विरोध करने वाली एआईएडीएमके आज खुले तौर पर मूर्ति पूजा और मंदिर जाने का समर्थन करती है. यह हिन्दू समर्थक दृष्टिकोण है जो एआईएडीएमके को बीजेपी के करीब बनाता है.

द्रविड मानसिकता का कमजोर होना डीएमके और एआईएडीएमके को भी कमजोर बनाएगा. हालांकि द्रविड के शीर्ष नेता अब भी खुद को नास्तिक कहते हैं लेकिन राजनीति से अलग उनके परिवार के सदस्य गुपचुप तरीके से मंदिरों में जाते देखे जाते हैं.

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इसीलिए करुणानिधि के निधन के बाद माना जा रहा है कि तमिलनाडु से नास्किता की राजनीति खत्म हो गई है. स्वतंत्रता के बाद 1950 और 1960 के दशक में डीएमके ने पिछड़ा वर्गों को सशक्त बनाने और एक समानतावादी समाज में लाने के प्रयास में ब्राह्मणवाद के खिलाफ आवाज उठाई. अन्ना, करुणानिधि और एमजीआर ने सत्ता में आने के लिए नास्तिकतावाद का सहारा लिया. बीजेपी का वाक्य बनने से पहले उन्होंने कांग्रेस मुक्त तमिलनाडु की शुरुआत की.

लेकिन जमीन पर क्या बदल गया? आज के तमिलनाडु में, थेवर, गौंडर्स, वन्नियर्स नए ब्राह्मण हैं. यह वह पिछड़ा वर्ग है जो सत्ता और अधिकार पर कब्जा करते हैं और इससे भी बदतर, दलितों के खिलाफ जाति अत्याचारों में शामिल होते हैं और यहां तक ​​कि ब्राह्मणों को भी निशाना बनाते हैं.

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करुणानिधि का समय हो या जयललिता का चेन्नई दिल्ली के पास नहीं गई थी. केंद्र तमिलनाडु आया था. लोकसभा में अपनी स्थिति की वजह से करुणानिधि ने जो चाहा उन्हें वह मिला क्योंकि लुटियंस को तोड़ने-मरोड़ने की शक्ति उनके पास थी.

इन दो क्षेत्रीय पार्टियों ने जो किया वह राजनीति में पूरी तरह नया था. यह तमिलनाडु में राजनीति का सबसे विस्मयकारी और विषाक्त रुप लेकर आया. सभ्यता की राजनीति का अन्त और नफरत का उपयोग प्रभावशाली भावना के तौर पर करने के लिए करुणानिधि और जयललिता हमेशा एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे.

तो क्या तमिलनाडु करुणानिधि के बाद बदल जाएगा? यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कम से कम सार्वजनिक स्तर पर डीएमके और एआईडीएमके के बीच अच्छे संबंध हैं. 37 सांसद होने के बावजूद दिल्ली और एआईएडीएम के के रिश्तों में नाटकीय परिवर्तन आया है. दरअसल तमिलनाडु में इस वक्त एक ऐसा मुख्यमंत्री है जो उस तरह के दांव-पेच चलाने में बिल्कुल भी सक्षम नहीं है जैसे करुणानिधि और जयललिता चलाया करते थे.

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यहां तक कि अब तमिलनाडु में हिन्दी-विरोधी कार्ड के भी उस तरह से चलने की संभावना नहीं है जैसे कि वह आधे दशक पूर्व चलता था. हालांकि बीजेपी को हिंदी और हिंदुत्व पार्टी के रूप में देखा जाता है लेकिन जिस तरह से राष्ट्रीय राजमार्गों पर हिन्दी का प्रयोग किया जा रहा है वह खतरे की घंटी दिखाता है, भगवा पार्टी यदि यहां विश्वसनीय स्थानीय लोगों पर भरोसा करती है तो उसको रास्ता मिल सकता है.

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(लेखर वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं)
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