सुप्रीम कोर्ट में कश्मीर मामला- सुनवाई, स्टे और फैसला

नज़रबंदी से नेताओं की रिहाई के बाद इस मामले में और भी याचिकाएं दायर होंगी, जिससे केन्द्र सरकार (Central Government) की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

News18Hindi
Updated: August 13, 2019, 12:24 PM IST
सुप्रीम कोर्ट में कश्मीर मामला- सुनवाई, स्टे और फैसला
नज़रबंदी से नेताओं की रिहाई के बाद इस मामले में और भी याचिकाएं दायर होंगी, जिससे केन्द्र सरकार (Central Government) की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.
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Updated: August 13, 2019, 12:24 PM IST
विराग गुप्ता

जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के पुनर्गठन कानून को राष्ट्रपति (President) की मंजूरी मिलने के बाद 31 अक्टूबर, सरदार पटेल की जयंती से देश के नक़्शे में दो नए केन्द्रशासित प्रदेशों का जन्म हो जाएगा. पाकिस्तान (Pakistan) को यूएन के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मात मिल रही है तो भारत में अनेक लोग कश्मीर घाटी को फिलिस्तीन बनाने के मंसूबे देख रहे हैं. भारत में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अनेक याचिकाएं दायर हुई हैं. कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने पिछले सप्ताह जल्द सुनवाई का आग्रह किया था. पूनावाला ने कश्मीर (Kashmir) से कर्फ़्यू हटाने के साथ फ़ोन, इंटरनेट, न्यूज़ चैनल पर लगी सभी पाबंदियों को हटाने की मांग की है. पूनावाला ने जम्मू-कश्मीर के हालात की वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए एक न्यायिक आयोग के गठन का अनुरोध भी किया है. उनकी याचिका पर जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने आज यानी मंगलवार को सुनवाई की. कश्मीर टाइम्स की संपादिका अनुराधा भसीन ने भी मीडिया की आजादी को बहाल करने और नज़रबंद नेताओं की रिहाई के लिए दायर की गई अपनी याचिका की जल्द सुनवाई की मांग की है. नेशनल कॉन्फ्रेस के दो सांसद अकबर लोन और हसनैन मसूदी के अलावा एक वकील ने भी याचिका दायर करके अनुच्छेद 370 के संशोधनों और नए राज्य के गठन को चुनौती दी है. नेताओं की नज़रबंदी से रिहाई के बाद इस मामले में अनेक अन्य पक्षों पर और भी याचिकाएं दायर हो सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट की इन याचिकाओं से कानूनी मोर्चे पर सरकार की मुश्किलें कैसे बढ़ सकती हैं.

जम्मू-कश्मीर में कर्फ्यू के साथ इंटरनेट पर पाबंदी
संविधान के अनुच्छेद 19 में अनेक अपवादों के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने अनेक पूर्व निर्णयों के माध्यम से मीडिया को भी अनुच्छेद 19 का संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया है. जम्मू-कश्मीर के अलावा अन्य राज्यों में भी कानून व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट बंद करने के अनेक उदाहरण हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ठाकुर ने सन 2016 में इन्टरनेट बंदी के बारे में गुजरात सरकार के विरुद्ध दायर की गई याचिका को निरस्त कर दिया था. इसके बाद राज्य सरकारों को इन्टरनेट बंद करने की जैसे खुली छूट मिल गई. कश्मीर में अब सरकारी दफ्तरों से आम जनता के लिए टेलीफोन की सुविधा को बहाल कर दिया गया. सीमावर्ती कश्मीर में सामरिक सुरक्षा के साथ राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना केन्द्र सरकार की जवाबदेही है. इन परिस्थितियों में सरकार या सुरक्षा बलों की कारवाई पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से सख्त आदेश पारित होना मुश्किल ही लगता है.

अनुच्छेद 370 और 35ए के खात्मे को चुनौती
कुछ वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट में दायर अनेक याचिकाओं के माध्यम से अनुच्छेद 370 और धारा 35ए के खात्मे की मांग की गई थी. उन याचिकाओं पर केन्द्र सरकार ने कभी भी औपचारिक जवाब ही नहीं दायर किया, जिस वजह से उन मामलों में अंतिम सुनवाई और फैसला नहीं हुआ. संसद द्वारा पारित नए कानून और राष्ट्रपति द्वारा जारी राजाज्ञा के बाद पुरानी याचिकाएं तो अब निरर्थक हो गई हैं. संविधान के अनुच्छेद 370 के शुरू में ही इसे अल्पकालिक बताया गया है. पिछली सरकारों ने अनेक आदेश से इस प्रावधान को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया था.

नवीनतम समाचारों के अनुसार कांग्रेस सरकार ने इन प्रावधानों को सन 1964 में ही ख़त्म करने की कोशिश की थी. अनुच्छेद 370 के तहत ही 35ए समेत अनेक कानून राष्ट्रपति के आदेश से जारी किए गए थे. और अब उसी संविधानिक जुगाड़ से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 65 वर्षों से जारी धारा 35ए को कभी भी गलत नहीं ठहराया तो अब उसकी समाप्ति के लिए जारी आदेश को को कैसे असंवैधानिक माना जाएगा?

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अनुच्छेद 370 में संविधान संशोधन का पेंच
सुप्रीम कोर्ट से सरकार को भले ही फौरी राहत मिल जाए, लेकिन अनुच्छेद 370 पर संवैधानिक पेंच लम्बा फंसा रहेगा. अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के लिए संविधान संशोधन करने के लिए सरकार को लोकसभा और राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत की दरकार थी. इसलिए संविधान संशोधन की बजाय राष्ट्रपति द्वारा जारी राजाज्ञा से 35ए के खात्मे के साथ अनुच्छेद 370 को भी निष्प्रभावी बना दिया गया. यह मानना और कहना गलत है कि अनुच्छेद 370 खत्म हो गया है. इस संवैधानिक जुगाड़ से भविष्य में झंझट या संकट पैदा होने की थोड़ी गुंजाइश बची है. भविष्य में बहुमत की कोई अन्य सरकार अनुच्छेद 370 के तहत आदेश जारी करके पुरानी व्यवस्था को फिर से बहाल करने की कोशिश कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले में सरकार द्वारा जल्द ही संविधान में उचित संशोधन करना चाहिए, जिससे भविष्य में कोई नया संवैधानिक बखेड़ा खड़ा न हो.

 

Article 370, Jammu Kashmir
सुप्रीम कोर्ट से सरकार को भले ही फौरी राहत मिल जाए, लेकिन अनुच्छेद 370 पर संवैधानिक पेंच लम्बा फंसा रहेगा. (Photo- PTI)


क़ानून की बजाय प्रक्रिया पर उठेंगे ज्यादा सवाल
आजाद भारत में पहली बार किसी राज्य को ख़त्म करके उसे केन्द्रशासित प्रदेश में तब्दील कर दिया गया और इसके लिए राज्य विधानसभा का अनुमोदन भी नहीं लिया गया. इसलिए इसे संघीय व्यवस्था पर आघात बताया जा रहा है. विपक्षी नेताओं और संसद सदस्यों ने शिकायत की है कि उन्हें बिल की प्रति पढ़ने के लिए पहले से नहीं दी गई. ऐसी अनेक प्रक्रियागत दोषों को सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान विरोधियों द्वारा उछाला जाएगा. सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंचों द्वारा दिए गए अनेक फैसलों के अनुसार जब तक संविधान के बेसिक ढांचे का उल्लंघन न हो, तब तक सरकार के आदेशों को अदालत द्वारा नहीं बदला जा सकता. परस्पर विरोधी मांग वाली इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई और न्याय संभव नहीं है. इसलिए इन मामलों पर भी लम्बी और जटिल बहस होगी और फैसला आने तक मामला स्वतः ही समाप्त हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, स्टे और फैसला
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ द्वारा 10 साल पुराने अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई हो रही है, जो नवम्बर तक चलने की संभावना है. कश्मीर के बारे में दायर याचिकाओं पर जल्द सुनवाई के आग्रह को मानने के बाद उन पर सुनवाई शुरू होगी. शुरुआती सुनवाई में ही संक्षिप्त आदेश से याचिकाओं का निस्तारण हो सकता है या फिर नोटिस जारी करके सरकार से जवाब मांगा जाएगा. गवर्नर की अनुसंशा पर राष्ट्रपति ने आदेश पारित किया है और संसद ने बहुमत से नया कानून बनाया है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे आदेश देने की संभावना नगण्य है. अनेक मांगों वाली विविध याचिकाओं को यदि एक साथ जोड़ने का आदेश हो गया, तो अंतिम सुनवाई और फैसले में ख़ासा वक्त लग सकता है. अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म करने की मांग वाली पुरानी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले पांच सालों में कोई फैसला नहीं लिया, तो अब दायर याचिकाओं में त्वरित फैसले की उम्मीद कैसे की जाए?

(विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार हैं.)
Twitter- @viraggupta

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First published: August 13, 2019, 6:52 AM IST
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