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कथक सा प्रखर अनुशासन है गीतांजलि शर्मा का व्यक्तित्व

गीतांजलि ने अपने इर्द गिर्द जो संसार रचा था उसमें नृत्य और सिर्फ़ नृत्य ही था जो उन्हें बचपन से आता था, या कहें ईश्वर ने उसे दिया था.

गीतांजलि ने अपने इर्द गिर्द जो संसार रचा था उसमें नृत्य और सिर्फ़ नृत्य ही था जो उन्हें बचपन से आता था, या कहें ईश्वर ने उसे दिया था.

गीतांजलि ने अपने इर्द गिर्द जो संसार रचा था उसमें नृत्य और सिर्फ़ नृत्य ही था जो उन्हें बचपन से आता था, या कहें ईश्वर ने उसे दिया था. परन्तु यह एक ऐसा सशक्त माध्यम था जिससे भारतीय सामाजिक रूढ़िवादी ढांचे को समझने तथा उससे टकराने में गीतांजलि को मदद मिल रही थी.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. ब्रज की लोक कला का स्वतन्ताय व शास्त्रीय नृत्य कथक की नव युवतियों की प्रेरणा गीतांजलि शर्मा का जीवन संघर्षमय रहा है, कथक का प्रखर अनुशासन ही उनका जीवन है, कुछ लोगों के व्यक्तित्व व क्रितत्व में भिन्नता होती है, पर गीतांजलि शर्मा का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही नृत्य और उसकी मान्यताओं को मान देने के लिए बना है. गीतांजलि को बचपन से ही शौक़ था मंच पर जीने का, ब्रज में जन्म लेने के कारण ब्रज लोक विधा पर लिखना और पहचान बनाना अच्छा लगा था परन्तु एक बच्ची को उसकी प्रतिभा के लिए दुलारते व प्रशंसा करते लोग उसी बच्ची को बड़े होते देख और पहचान बनाते देख खुद को समझा नहीं पा रहे थे और ईर्ष्या करने लगे थे.

    जहां एक बच्ची को लोगों से प्रशंसा तथा प्रेरणा पाने की उम्मीद की हो वही लोग अचानक उसकी प्रतिभा को नकारने लगे थे. उस बच्ची के लिए यह एक सदमा था, लेकिन इसी से भविष्य के लिये गहरी समझ की ज़मीन तैयार हो रही थी. गीतांजलि ने अपने इर्द गिर्द जो संसार रचा था उसमें नृत्य और सिर्फ़ नृत्य ही था जो उन्हें बचपन से आता था, या कहें ईश्वर ने उसे दिया था. परन्तु यह एक ऐसा सशक्त माध्यम था जिससे भारतीय सामाजिक रूढ़िवादी ढांचे को समझने तथा उससे टकराने में गीतांजलि को मदद मिल रही थी. गीतांजलि खूब टकराई, चूर चूर हुयी और स्वयं को जोड़ जोड़ कर पुनः कुछ नया करती रही.

    इससे नृत्य की यात्रा तो सम्पन्न होती है साथ ही भारतीय समाज में हार ना मानने वाली संघर्षशील स्त्री को अपने ही स्वयं के आइने में देखने का और समझने का अवसर मिलता रहा. नृत्य करते करते स्त्री सशक्तिकरण की ना केवल समझ गहरी होती गयी बल्कि नृत्य सम्बन्धी स्थापनाओं और मान्यताओं में बरबस ही स्त्री सम्वेदना और सशक्तिकरण की यात्रा चल निकली जो लहूलुहान संघर्ष जितना साहसी व दृढ़ किन्तु राधा- भाव में नृत्य करने के कारण कोमल व प्रेममय है. गीतांजलि ने स्वयं ज़िंदगी से कुछ ना चाह कर अपने ध्येय व स्त्री की गरिमा को सदैव ऊँचा रखा. कभी कभी एसा लगता है कि वह अपने नृत्य के माध्यम से जिसमें राधिका जी का जीवन चित्रित होता है, इस वर्तमान समय को कुछ असम्भव देने की कोशिश कर रही हैं.

    विदुषी उमा डोगरा जी जो कथक के महान गुरु पंडित दुर्गा लाल जी की परम शिष्या हैं से कथक नृत्य सीख कर दोनों ही विधाओं में श्रेष्ठ देने की उनकी इच्छाशक्ति इन्हीं मान्यताओं की स्थापना करती हैं. गीतांजलि ने ब्रज लोक नृत्य को अंतरष्ट्रिया गरिमा प्रदान की है, क्योंकि ब्रज संस्कृति नायिका प्रधान है कृष्ण की लीलाएं राधिका के व्यक्तित्व के चतुर्दिक है. किन्तु राधा जी को धर्म से मंच तक लाने में वर्तमान समय में जो जद्दोजहद होती है वह एक पीड़ा की कहानी है. जिसे महसूस करने व निराकरण करने में स्त्री स्वतंत्रता व सशक्तीकरण का अजस्र स्रोत है. प्रायः होता है, यही दृष्टिकोण व सिद्धांत बनता है गीतांजलि का, गीतांजलि की नृत्य यात्रा से स्त्री सशक्तीकरण का पोषण निम्न प्रकार होता है

    उनकी स्वयं की संघर्ष गाथा व गरिमापूर्ण नृत्य यात्रा ना केवल हज़ारों कलाकारों को प्रेरित करती है बल्कि कलाकारों की गरिमा व सम्मान के नए द्वार व सम्भावनाओं को रेखांकित करती है. दक़ियानूसी समाज में स्त्री व नृत्य दोनों के प्रति अन्यायपूर्ण रवैये को चकनाचूर करती है. इन प्रश्नों से टकराती हुयी गीतांजलि राधिका के साथ साथ किसी प्रतिष्ठित वीरांगना की भूमिका में नज़र आती हैं.

    नृत्य की यात्रा जिसमें श्री राधा की आधुनिक भूमिका, गरिमा की स्थापना, स्त्री-चेतना की गहरी भारतीय मान्यताओं को उजागर करती है. इसके अतिरिक्त स्वयं की कोरियोग्राफ़ी कहीं ना कहीं स्त्री संभावनाओं को नए आकाश की ओर ले जाती है. गीतांजलि एक ऐक्टिविस्ट भी हैं उन्होंने ब्रजभूमि के स्वच्छता अभियान में आंदोलन के रूप में ब्रांड ऐम्बैसडर के रूप में, स्वस्थ भारत यात्रा के कम्पेन के रूप में तथा विभिन्न प्रोजेक्ट जैसे गोरैया बचाओ आंदोलन, सूरदास महोत्सव आदि में अहम भूमिका निभाती हैं.

    उन्होंने देश विदेशों में अब तक हज़ारों मंचों पर प्रस्तुतियां दीं और १५०० से ज़्यादा बच्चियों को लोक व शास्त्रीय नृत्य का प्रशिक्षण देकर गुरु शिष्य परम्परा में देने के लिए कलावृक्ष नामक संस्थान की स्थापना की है. इसके माध्यम से न केवल नृत्य की शिक्षा हो रही है बल्कि गुरु शिष्य परम्परा, राधा के व्यक्तित्व, भक्ति की गहराई, व आधुनिक जीवन की संभावनाओं व संघर्षो पर चर्चा करते हुए अपनी शिष्याओं को नर्तकार ही नहीं बल्कि एक सशक्त स्त्री भी बनाती हैं. नृत्य प्रशिक्षण के दौरान अभिभावकों तथा शिष्याओं से संवाद करना इस बात की इंगित करता है कि गीतांजलि नृत्य के माध्यम से स्त्री-परतंत्रता के सभी दुराग्रह तोड़ने के लिए अपनी एक फ़ौज तैयार कर रही हैं और वह स्वयं उसकी कमांडर भी हैं.

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