OPINION: क्या केसीआर को है बीजेपी की ज़रूरत, विधानसभा भंग करने से मिल रहे हैं संकेत

अगर बीजेपी और केसीआर के बीच आपसी समझ बनती है तो केसीआर बीजेपी के उम्मीदवारों को कांग्रेस का वोट काटने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

News18.com
Updated: September 7, 2018, 1:09 PM IST
OPINION: क्या केसीआर को है बीजेपी की ज़रूरत, विधानसभा भंग करने से मिल रहे हैं संकेत
अगर बीजेपी और केसीआर के बीच आपसी समझ बनती है तो केसीआर बीजेपी के उम्मीदवारों को कांग्रेस का वोट काटने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.
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Updated: September 7, 2018, 1:09 PM IST
(वीरराघव टीएम)

टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव हमेशा अपने समर्थकों और विरोधियों को दुविधा में रखते हैं वो पता नहीं लगने देते कि उनका अगला कदम क्या होगा? विधानसभा भंग करके इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया.

खास बात है कि केसीआर की पार्टी ने हमेशा राज्य के चुनाव और संसद के चुनाव साथ में कराए जाने की हिमायत की है जिससे ये संकेत मिल रहा था कि तेलंगाना विधानसभा चुनाव और संसदीय चुनाव साथ-साथ होंगे. लेकिन अचानक विधानसभा भंग करने की वजह से राज्य में समयपूर्व चुनाव की स्थिति बन गई है.

2014 में जब आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ था तो कांग्रेस को लग रहा था कि नया राज्य बनने से उसे फायदा मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चूंकि केसीआर इस पूरे आंदोलन के अगुवा थे इसलिए उन्हीं को जनता ने जिताया.

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आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद तेलंगाना के हिस्से में 119 विधानसभा सीटें आईं. चुनाव में टीआरएस को 63 सीटें मिलीं. केसीआर की सरकार बनने के बाद कांग्रेस उनकी सबसे बड़ी विरोधी पार्टी हो गई. टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस आंध्र प्रदेश तक ही सीमित रह गए क्योंकि इन पार्टियों ने बंटवारे का समर्थन नहीं किया था. हालांकि बीजेपी को थोड़ा फायदा हुआ लेकिन सत्ता पाने से वह काफी पीछे थी.

चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी विरोधी पार्टी है इसलिए लोकसभा चुनाव में उसके साथ कोई गठबंधन करने का सवाल नहीं उठता. दूसरी ओर राज्य में एक बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी को देखते हुए अगर केसीआर बीजेपी के साथ जाते हैं तो भी उन्हें नुकसान हो सकता है.
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अब अगर विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होता तो केसीआर के सामने कांग्रेस या बीजेपी के साथ गठबंधन करने का काफी दबाव होता. नहीं तो ये भी हो सकता था कि लोकसभा चुनाव में वो नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच में पिस कर रह जाते.

अब उन्होंने विधानसभा भंग करके राज्य में चुनाव को लोकसभा चुनाव से अलग कर दिया. जिससे अब वह विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से भिड़ंत कर सकते हैं इसमें पीछे से इनको बीजेपी का समर्थन भी मिल सकता है. इसके बाद राज्य में चुनाव के परिणामों के आधार पर लोकसभा चुनाव में वो किसी के भी साथ जा सकते हैं.

अगर बीजेपी और केसीआर के बीच आपसी समझ बनती है तो केसीआर बीजेपी के उम्मीदवारों को कांग्रेस का वोट काटने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. उस स्थिति में केसीआर के चुनाव जीतने की संभावनाएं काफी बढ़ जाएंगी. लेकिन अगर कांग्रेस को बहुमत मिलता है तो केसीआर लोकसभा चुनावों में खुले तौर पर बीजेपी के साथ हाथ मिला सकते हैं. चूंकि अल्पसंख्यकों का वोट लोकसभा चुनावों में उतना प्रभावी नहीं साबित होता है क्योंकि संसदीय क्षेत्र काफी बड़ा होता है इसलिए केसीआर को इसमें नुकसान नहीं है. लेकिन विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यक वोट काफी अहम भूमिका निभाता है.

नाम न बताए जाने की शर्त पर टीआरएस के एक नेता ने कहा कि चूंकि सभी विधानसभा क्षेत्रों में कुछ-कुछ अल्पसंख्यक वोट है इसलिए ये विधानसभा चुनाव को काफी प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव हिंदू वोटों को इकट्ठा करके जीता जा सकता है. वैसे तो कांग्रेस का वोटों का आधार तेलंगाना में काफी मज़बूत है लेकिन पिछले चार सालों में टीआरएस ने भी राज्य में अपना आधार काफी मज़बूत किया है.

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चूंकि कांग्रेस, टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के 26 विधायक भी टीआरएस में दल-बदल करके शामिल हुए थे तो ज़ाहिर है कि इन विधायकों को फिर से टिकट देने की भी समस्या खड़ी होगी. इसलिए टिकट देते वक्त टीआरएस को काफी सावधानी बरतनी होगी.

लेकिन ये काफी छोटी चीज़ें हैं जिनपर केसीआर का ध्यान है. केसीआर ने 119 में से 100 पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पहले ही कर रखी है. अब चुनौती कांग्रेस के सामने है कि क्या वो फिर से मज़बूती के साथ टीआरएस का मुकाबला कर पाएगी.
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