आपबीती: 'बाढ़ के पानी में डूब गया घर, कमरे में तैर रहे थे सांप'

आपबीती: 'बाढ़ के पानी में डूब गया घर, कमरे में तैर रहे थे सांप'
केरल में पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही है. (AP Photo)

मेरे माता पिता ने बताया कि फर्नीचर पानी में तैर रहा है. रेफ्रिजरेटर गिर गया था. बर्तन और कपड़े बह गये थे और रसोईघर तहस नहस हो चुका है.

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केरल में पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही है. जलस्तर बढ़ रहा है और इस डर के मारे आंखों की नींद उड़ गयी है कि कहीं पानी घर में ना घुस जाए. आधी रात में कहीं घर छोड़कर ना भागना पड़े, यह सोच ही डराने के लिए काफी है.

केरल में लगातार हो रही बारिश से राज्य के बड़े हिस्सों में बाढ़ आ गई है और नौ अगस्त को यह पलक्कड़ पहुंची जहां मेरे बुजुर्ग माता पिता रहते हैं. जब मैंने नई दिल्ली से घबराहट में उन्हें फोन किया तो उन्होंने मुझे बताया कि हमारे दो मंजिला मकान के भूतल में पानी घुस गया है.

उन्होंने बताया कि फर्नीचर पानी में तैर रहा है. रेफ्रिजरेटर गिर गया था. बर्तन और कपड़े बह गये थे और रसोईघर तहस नहस हो चुका है. सभी कमरों में पानी भरने के साथ, वे पहली मंजिल में चले गए. शुक्र है उनके पास खाने पीने के सामान का पर्याप्त भंडार है और पहली मंजिल पर भी रसोईघर है.



मैं उनकी सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित था. मैंने सोमवार, 13 अगस्त को कोयंबटूर के लिए उड़ान भरी और पलक्कड़ तक का एक घंटे का सफर तय करने के लिए बस पकड़ी. शुक्र है जब मैं दोपहर में पहुंचा तो बारिश थोड़ी कम हो गई थी और मैं बिना किसी हादसे के अपने घर तक पहुंच सका. हमारा घर करीब 20 साल पुराना है और मेरे 72 वर्षीय पिता और 66 वर्षीय मां पड़ोसियों की मदद से भूतल साफ कर चुके थे.



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अगले दिन, आसमान बरस पड़ा और लगभग पूरे दिन भारी बारिश हुई. सामने वाले यार्ड में बाढ़ आ गई थी. फूलों का बगीचा जिसे मेरी मां ने प्यार से सींचा था, जलमग्न हो चुका था. बिजली नहीं थी और मोबाइल फोन काम नहीं कर रहे थे और हमारी कॉलोनी में कई लोगों का संपर्क बाहरी दुनिया से टूटा हुआ था.

जिन लोगों के पास अभी भी मोबाइल फोन कनेक्टिविटी थी, वे व्हाट्सएप पर जानकारी के लिए जांच कर रहे थे या बचाव टीमों को कॉल करने की कोशिश कर रहे थे. अधिकांश समय, नम्बर व्यस्त थे या संपर्क नहीं हो रहा था. एक और चिंता थी, पानी में रेंगने वाले जहरीले सांपों की.

बुधवार को कुछ राहत मिली. उस दिन केवल बूंदाबांदी हुई. मैं बाहर गया और किराने का कुछ सामान ले आया. लेकिन रात आठ बजे के बाद पूरी रात बारिश हुई.

मैं हर घंटे जागता और बाहर पानी के स्तर की जांच के लिए सामने के दरवाजे पर जाता. ऐसा नहीं कि इससे कोई फर्क पड़ता लेकिन मैंने सोचा की अगर मैं अपने माता-पिता के साथ किसी होटल या रिश्तेदार के यहां ले जाता हूं तो हम पहले से तैयार हो सकते हैं क्योंकि पलक्कड़ के पडोसी क्षेत्र अभी सूखे थे.

शायद हमें पिछले दिन ही चले जाना चाहिए था क्योंकि सुबह होते ही पानी का स्तर तेजी से बढ़ गया था.

अब बहुत हो चुका था, मैंने सोचा और एक मित्र को बुलाया जिसने हमें निकालने के लिए लड़कों के एक समूह को भेजा. वे एक ऑटोरिक्शा में आए और सड़क के अंतिम छोर पर उसे खड़ा कर दिया और वे घुटनों तक पानी के बीच हम लोगों तक पहुंचे. किसी तरह उन्होंने कामचलाऊ बोट बनाकर मेरे माता पिता को वहां से निकाला. किसी तरह मैंने उन्हें अपने एक रिश्तेदार के घर पर छोड़ा और गर्म और उमसभरी दिल्ली के लिए लौट चला.

हमारे पड़ोसियों ने अपने घरों में ही रहने का निर्णय लिया. घर की एक महिला ने बताया ‘‘ उम्मीद है कि चीजें जल्द ही सामान्य हो जाएंगी लेकिन हम भयभीत है कि कहीं निकटवर्ती बांध में पानी का स्तर और न बढ़ जाए.’’

वह मलाम्पुझा बांध में बढ़ते जलस्तर के बारे में बात कर रही थी जो कि पलक्कड़ के लिए मुख्य जलस्रोत है. उनके परिवार के जाने के बाद एक अधेड़ व्यक्ति घुटनों तक भरे पानी में दूध और अन्य आवश्यक सामग्री खरीदने जा रहा था. जब मैंने उनसे कहा कि मूसलाधार बारिश हो रही है तो उन्होंने कहा,‘‘हमने इससे भी खराब स्थिति देखी है, इससे बुरा और क्या हो सकता है. उम्मीद करते है कि सब अच्छा हो.’’

(नई दिल्ली में पीटीआई के वरिष्ठ सहायक संपादक मनोज राममोहन द्वारा बताया गया आंखों देखा हाल)
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