केरल: कोरोनाकाल में बेरोजगार हुए ग्रेजुएट्स के लिए उम्मीद की किरण बना मनरेगा, तोड़े कई रिकॉर्ड

केरल: कोरोनाकाल में बेरोजगार हुए ग्रेजुएट्स के लिए उम्मीद की किरण बना मनरेगा, तोड़े कई रिकॉर्ड
केरल में युवाओं के लिए आकर्षक हुआ मनरेगा. (सांकेतिक तस्वीर)

Coronavirus Lockdown लॉकडाउन के चलते कई लोगों की नौकरियां चली गईं और वह अपने गांवों लौट आए. सरकार के सामने बड़ी समस्या थी कि आखिर इन लोगों को दोबारा काम पर कैसे लगाया जाए ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे. ऐसे में सरकार ने मनरेगा को तेजी से क्रियान्वित किया.

  • Share this:
तिरुवनंतपुरम. देश में कोरोना वायरस (Coronavirus Lockdown) लॉकडाउन के चलते कई लोगों की नौकरियां चली गईं और वह अपने गांवों को लौट गए. इन सबके बीच सरकार के सामने बड़ी समस्या थी कि आखिर लोगों को दोबारा काम पर कैसे लगाया जाए ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे. इसलिए केंद्र सरकार ने मनरेगा को तेजी से क्रियान्वित किया और बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला. केरल (Kerala) के गांवों में मनरेगा (MGNREGA) के बारे में माना जाता था कि यह उन वृद्ध महिलाओं का आखिरी सहारा है, जिनके पास आय के कोई अन्य साधन नहीं थे. हालांकि कोरोना संकट के बीते चार महीनों में पैसे और नौकरी की तंगी से जूझ रहे राज्य के शिक्षित युवाओं के लिए मनरेगा लाइफलाइन का काम कर रही है. इनमें केरल स्थित पथानामथिट्टा कस्बे के थोटाफुजास्सेरी गांव के ऑटोमोबाइल इंजीनियर भी कृष्णकुमार केपी भी शामिल हैं. स्थानीय डीलर के यहां काम कर रहे कुमार की नौकरी लॉकडाउन में चली गई. 23 वर्षीय कुमार ने कहा कि 'सिर्फ यही एक काम है जो अभी चल रहा है. मैं पौधे रोप रहा हूं.'

वहीं कोझिकोड जिले के अझियुर गांव में एक अधिकारी ने बताया कि 'अब तक यहां काम करने वालों में सिर्फ 1837 महिलाएं शामिल थीं. पहली बार यहां पुरुष नामांकित किए गए और पांच ग्रेजुएट्स को मनरेगा के तहत काम दिया जा रहा है.' इसके साथ ही कासरगोड में बेडाडका पंचायत के मुखिया सी. रामचंद्रन ने कहा कि 'उन्होंने युवाओं के लिए कैंपेन शुरू किया है. जिनकी नौकरी चली गई है वह मनरेगा के तहत काम कर सकते हैं. चार ने बीते हफ्ते जॉइन किया.'

मनरेगा राज्य इकाई के एक अधिकारी ने कहा कि 'एक नया ट्रेंड सामने आया है. आमतौर पर यहां काम करने वालों में लगभग 91 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें से अधिकांश 40 वर्ष से अधिक आयु की हैं. अब कई युवा और महिलाओं ने योजना के तहत काम करना शुरू किया है. उनमें से कई ने अपनी मां या परिवार के अन्य सदस्यों को जारी किए गए जॉब कार्ड का इस्तेमाल करते हुए इनरोल हुए हैं. राज्य में 30,000 से अधिक परिवारों को पिछले दो महीनों में इस योजना में जोड़ा गया है. सभी जिलों से जॉब कार्ड की मांग अभी भी जारी है.'



लॉकडाउन में मनरेगा: टूटे कई रिकॉर्ड
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकारी ने बताया कि कई गांव कंटेनमेंट जोन में हैं, लेकिन राज्य में  मनरेगा के तहत काम करने वालों की संख्या पिछले सप्ताह 6 लाख और कुछ सप्ताह पहले 6.40 लाख थी. पिछले मानसून में इसका औसत मतदान 5-5.50 लाख था. वहीं पिछले वित्त वर्ष में प्रति घर रोजगार के औसत दिन 55.73 थ. इस बार भले ही योजना कोविड के कारण पूरी तरह से चालू ना हो पाई  हो लेकिन यह आंकड़ा पहले से ही 18.26 है. इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ तीन महीने में 82 परिवारों ने पूरे वित्तीय वर्ष के लिए  100 दिनों का काम पूरा कर लिया है. कई परिवारों ने 60-90 दिन पूरे कर लिए हैं. एक अधिकारी का कहना है कि आम तौर पर यह ऐसा वित्तीय वर्ष का आधा समय बीत जाने के बाद होता था.

सूत्रों का कहना है कि लोगों को उनके गांव में काम मिलने के अलावा इस योजना में खास बात यह हो गई है कि काम करने वालों को दो सप्ताह के भीतर मजदूरी मिल जाती है. पहले यह मजदूरी मिलने में महीनों का वक्त लगता था.

पथानामिट्टा निवासी 23 वर्षीय के. बिबिन ने कहा कि '291 रुपए के हिसाब से मुझे अब तक मेरे 4 दिन के काम का पैसा भी मिल चुका है. अब मेरे दोस्त भी मनरेगा में काम करना चाह रहे हैं.' स्थानीय कॉलेज से इंजीनियरिंग करने वाले कृष्णकुमार ने कहा कि 'मेरे गाँव के कई हमउम्र इसमें काम नहीं करना चाहते थे क्योंकि इस योजना के बारे में यह मान लिया गया था कि यह बुजुर्ग महिलाओं के लिए हैं लेकिन अब मैंने फैसला किया है कि जब तक कोई दूसरा काम नहीं मिलता मैं इसी में काम करुंगा.'
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज