दिल्ली सरकार vs एलजी: SC के फैसले से इन 5 सवालों के मिले जवाब

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई में संवैधानिक बेंच ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि हर मामले में LG की सहमति जरूरी नहीं, लेकिन कैबिनेट को फैसलों की जानकारी देनी होगी.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई में संवैधानिक बेंच ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि हर मामले में LG की सहमति जरूरी नहीं, लेकिन कैबिनेट को फैसलों की जानकारी देनी होगी.

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    (देबायन रॉय)

    दिल्ली सरकार और केंद्र बीच चल रही अधिकारों के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उपराज्यपाल (LG) अनिल बैजल को फैसले लेने का पूर्ण अधिकार नहीं है. चुनी हुई सरकार लोकतंत्र में अहम है, इसलिए मंत्री-परिषद के पास फैसले लेने का अधिकार है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई में संवैधानिक बेंच ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि हर मामले में LG की सहमति जरूरी नहीं, लेकिन कैबिनेट को फैसलों की जानकारी देनी होगी. फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन सवालों के जवाब भी दिए:-

    ##1क्या कोर्ट का फैसला आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत है?
    >>नहीं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने पहली बार उपराज्यपाल के अधिकारों को हाइलाइट किया है. बेंच ने कहा, "अगर एलजी द्वारा विधायकों के वैध निर्णयों को मंजूरी देने में देरी हो रही है, तो इसका मतलब है कि सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी अस्वीकार कर दी गई है". बेंच ने यह भी कहा है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर मंत्रिपरिषद की मदद और सलाह से बंधा है. दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने हाईकोर्ट के 4 अगस्त, 2016 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उपराज्यपाल को प्रशासनिक प्रमुख बताते हुए कहा गया था कि वे मंत्रिमंडल की सलाह और मदद के लिए बाध्य नहीं हैं. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एलजी को मंत्रि-परिषद की सलाह माननी पड़ेगी.

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    ##2 फिर आर्टिकल 239 के क्लॉज 4 का मतलब क्या है? जो बहस का मुख्य बिंदु था
    >>संविधान का आर्टिकल 239AA कहता है, 'जब उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार सरकार के मंत्रियों के बीच किसी विषय पर कोई मतभेद होगा, तो वह मामला राष्ट्रपति के पास जाएगा.' दिल्ली सरकार की ओर से यह तर्क दिया था कि उपराज्यपाल 'मतभेद उजागर' कर सकते हैं और मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में दिल्ली सरकार काम नहीं कर सकती या करती भी है तो बहुत धीमी गति से.

    हालांकि, बेंच में शामिल जस्टिल एएम खान्विलकर और जस्टिस सिकरी ने फैसले में 'कोई भी मामले' का जिक्र किया है. इसलिए 239AA के क्लॉज (4) के तहत इसे 'हर मामले' के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए.

    ##3 क्या ये फैसला पूर्वव्यापी फैसलों का असर है?
    >>अगस्त 2015 में दिल्ली सरकार के रेवेन्यू विभाग ने कृषि भूमि का मिनिमम रेट तय किया था. कृषि भूमि का सर्कल रेट अभी भी ज्यादा है. उपराज्यपाल ने दोनों फैसलों का विरोध किया.

    इसके अलावा दिल्ली के सतर्कता निदेशालय ने कमीशन ऑफ इन्क्वॉयरी एक्ट 1952 के तहत एक नोटिफिकेशन जारी किया था. जिसके जरिए सीएनजी फिटनेस स्कैम की जांच के लिए एक कमीशन का गठन होना था. लेकिन, तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग ने इसका विरोध किया. तर्क दिया गया कि इन मामलों में फैसला लेने से पहले उपराज्यपाल की सहमति नहीं ली गई. जिसके बाद इस संबंध में हाईकोर्ट में तीन याचिकाएं दायर की गई थी.

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    अब इन सभी मामलों को दिल्ली कैबिनेट दोबारा से एलजी के सामने पेश करेगी. अगर इनमें से किसी भी मामले में एलजी की फिर से मंजूरी नहीं मिल पाती है, तो आप के लिए एकमात्र सहारा अदालत से संपर्क करना होगा. कोर्ट ने साफ किया है कि संवैधानिक व्यवस्था में किसी तरह का अवरोध नहीं होना चाहिए. ऐसे में इस फैसले को पूर्ववर्ती फैसलों का असर नहीं कहा जा सकता.

    ##4 एलजी की शक्तियों को स्पष्ट करने के अलावा क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला ये साफ करता है कि एलजी दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण क्यों हैं?
    >>सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में साफ किया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना मुमकिन नहीं है. यह एक केंद्रशासित प्रदेश है और राज्य सरकार को एक्सक्लूसिव अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं. उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासक हैं. कानून बनाने से पहले और बाद में उसे एलजी को दिखाना होगा. कोर्ट ने साफ किया है कि केंद्रशासित प्रदेश होने के नाते एलजी महत्वपूर्ण तो हैं, लेकिन एलजी के पास स्वतंत्र अधिकार नहीं है. उन्हें सरकार के साथ मिलकर काम करना है. संवैधानिक व्यवस्था में अराजकता की जगह नहीं है.

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि राजधानी दिल्ली क्षेत्र पर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को कानून बनाने का विस्तृत अधिकार है. संविधान की धारा 239 एए (4) को छोड़कर दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को मंत्रिपरिषद की मदद और सलाह पर चलना होगा. संविधान की धारा 239 एए के तहत दी गई शक्तियों पर महज संवैधानिक जरूरत पड़ने पर ही उपराज्यपाल फैसला कर सकता है.

    ##5 क्या कोर्ट ने दिल्ली सरकार और एलजी के बीच चल रहे विवाद को खत्म करने का कोई कारगर रास्ता दिया है?
    >>नहीं... कोर्ट ने साफ तौर पर कोई रास्ता नहीं दिया. कोर्ट ने एक तरह से आपसी मेलजोल और समझ से सरकार चलाने की बात कही है. कुछ बातें दिल्ली सरकार के पक्ष में गई हैं, तो कुछ चीजों पर उपराज्यपाल को हाइलाइट किया गया है.

    सीजेआई दीपक मिश्रा ने अपने फैसले में कहा, "कोर्ट को लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर ही संविधान का व्याख्यान करना होगा. राज्य के तीनों अंग संविधान से जुड़े हैं. लिहाजा कोर्ट का फैसला संविधान की भावना पर आधारित होना चाहिए. मदद और सलाह के संदर्भ में सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत बेहद अहम है. केंद्र और राज्य को संघीय ढांचे का पालन करने की जरूरत है. केंद्र-राज्य संबंध में दिल्ली की विशेष जगह है, दिल्ली का उपराज्यपाल किसी अन्य राज्य के गवर्नर की तरह नहीं है."

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