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OPINION: गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस ने सूझबूझ से लिया काम, हुड़दंगियों की बड़ी साजिश रही नाकाम

कृषि कानून का विरोध कर रहे किसानों के आंदोलन ने 26 जनवरी को हिंसक रूप ले लिया था. (फाइल फोटो)
कृषि कानून का विरोध कर रहे किसानों के आंदोलन ने 26 जनवरी को हिंसक रूप ले लिया था. (फाइल फोटो)

Delhi Violence: दिल्ली पुलिस को बधाई कि वे हुड़दंगियों के झांसे में नहीं आए. दिल्ली पुलिस ने परिपक्व बल की तरह काम किया और गोलीबारी नहीं की.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 30, 2021, 4:30 PM IST
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(विक्रम सिंह)
नई दिल्ली. गणतंत्र दिवस (Republic Day) पर लाल किले (Red Fort) के पास हुई दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा आंख खोलने वाली थी. ये कानून प्रवर्तन एजेंसियों और पुलिस के लिए एक सीख की तरह थीं. अगर भीड़ में नेतृत्व न हो और एकसमानता न हो, तो उसमें विरोधी बनने की क्षमता होती है. इस मामले में राजनीतिक फायदे के लिए दिए गए कुछ नेताओं के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया था.

मंगलवार को हुई हिंसा आंदोलन में घुसपैठ करने वाले अनचाहे तत्वों के शामिल होने की पृष्ठभूमि से आती है, जैसे- उमर खालिद और दूसरों के पोस्टर्स. ये चीजें नजरअंदाज भी नहीं की गईं. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि इन्हें रोकने के लिए कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं की गई, सीआरपीसी की धारा 107 और 116(3) के तहत को भी सक्रिय कदम क्यों नहीं उठाया गया.

यह पता था कि हिंसा भड़केगी, खासतौर से तब जब प्रदर्शनकारियों को दिल्ली में आने की इजाजत दी जाएगी. दिल्ली पुलिस की तरफ से 37 बिंदुओं के निर्देश केवल 25 जनवरी को दिए गए. इतने बड़े आंदोलन के मद्देनजर इन आदेशों को इतने जल्दी लागू नहीं किया जा सकता था. इन रैलियों में पुलिस को मौजूद रहना चाहिए था. इससे किसान अपना रास्ता नहीं खोते. वहीं कुछ FAQ यानी आम सवाल-जवाबों की एक सूची को बांटा जाना चाहिए था. साथ ही आपातकालीन स्थिति के लिए एक प्लान तैयार रखा जाना चाहिए था. लाल किले को छावनी में तब्दील किया जाना चाहिए था.
एक और जलियांवाला बाग नहीं


हालांकि, मैं दिल्ली पुलिस के संयम की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया. अगर ऐसा होता, तो आलोचना का नया दौर शुरू होता, जो दशकों तक चलता. यही पाकिस्तान और खालिस्तान समर्थकों का प्लान था. वे 26 जनवरी को दूसरे जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) में बदलना चाहते थे और पुलिस कमिश्नर को जनरल डायर (General Dyer) के तौर पर पेश करना चाहते थे.

दिल्ली पुलिस को बधाई कि वे इस झांसे में नहीं आए. दिल्ली पुलिस ने परिपक्व बल की तरह काम किया और गोलीबारी नहीं की. मैं दिल्ली पुलिस की महिला सिपाहियों की भी तारीफ करना चाहूंगा. अचानक शुरू हुए खतरनाक माहौल के बावजूद हथियारों से लैस प्रदर्शनकारियों के सामना किया.

यह भी पढ़ें: ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा का वीडियो या फोटो मोबाइल में हो तो दिल्ली पुलिस से करें संपर्क

अब आगे क्या
मेरा मानना है कि दिल्ली में हुई हिंसा के संबंध में 22 मामले दर्ज किए जा चुके हैं और मामला क्राइम ब्रांच को भेजा जा चुका है. जांच के लिए सभी तरह के साइंटिफिक टूल्स का उपयोग होना जरूरी है. मुख्य लोगों की पहचान के लिए फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर, बिग डेटा एनालिटिक्स और सॉफ्टवेयर से चलने वाले सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल करना होगा.

इन लोगों पर बड़े इनामों की घोषणा करनी होगी और मोस्ट वॉन्टेड लोगों की खोज के लिए टीमों का गठन करना होगा. उन्हें एक सबक देने की जरूरत है कि गणतंत्र दिवस और तिरंगे की गरिमा से समझौता बर्दाश्त नहीं होगा. लखा सिधाना और दीप सिद्धू ने भड़काऊ भाषण दिए हैं, जो रिकॉर्ड भी किए जा चुके हैं. मकोका यानि महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट के तहत इनकी पूरी चल-अचल संपत्ति को जब्त किया जाना चाहिए. किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबंध अपराधियों की मदद नहीं करेगा.

साथ ही प्रशासन को इस घटना से सबक लेना चाहिए. ऐसे प्रदर्शनों के लिए रैली में पुलिस की तैनाती पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. एक पुलिस पार्टी रैली के आगे, एक पीछे और सादे कपड़ों में एक टुकड़ी रैली के बीच में हो. इससे माहौल की समय पर जानकारी मिल सकेगी. अंत में मैं एक उन लोगों से एक सवाल पूछना चाहूंगा, जो मारे गए ट्रैक्टर ड्राइवर को शहीद कह रहे हैं. पूरे राष्ट्र ने लापरवाह ड्राइविंग, पुलिस बैरिकेड को तोड़ते और इस कारण से मरते देखा है. जो अपराध और देश विरोधी है उसपर गौरव न करें.

(लेखक यूपी पुलिस के पूर्व डीजीपी हैं और नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)
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